मृत्युपूर्व बयान के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम होने का अलग प्रमाणपत्र जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

2 July 2026 5:00 PM IST

  • मृत्युपूर्व बयान के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम होने का अलग प्रमाणपत्र जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत्युपूर्व बयान पर भरोसा करने के लिए डॉक्टर द्वारा यह अलग से प्रमाणित करना अनिवार्य नहीं है कि पीड़ित बयान देने के समय मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम था। यदि डॉक्टर ने यह प्रमाणित किया कि पीड़ित होश में था और बोलने की स्थिति में था तो यह पर्याप्त है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा,

    "मृतक के बयान देने के लिए मानसिक रूप से सक्षम होने संबंधी डॉक्टर का अलग प्रमाणपत्र कानून की अनिवार्य शर्त नहीं, बल्कि केवल सावधानी का एक सिद्धांत है। वास्तविक कसौटी यह है कि मृत्युपूर्व बयान सत्य, स्वैच्छिक और किसी प्रकार के दबाव, सिखाए जाने या संदेहास्पद परिस्थितियों से मुक्त हो।"

    अदालत ने यह टिप्पणी पत्नी पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाने के आरोपी पति की अपील खारिज करते हुए उसकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए की।

    हालांकि, आरोपी के पिता को संदेह का लाभ देते हुए उनके खिलाफ धारा 498ए के तहत दर्ज दोषसिद्धि रद्द कर बरी कर दिया।

    पूरा मामला

    मामले में 16 नवंबर 2017 को पीड़िता की मां ने शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि दहेज में चार पहिया वाहन की मांग पूरी न होने और संतान न होने के ताने देकर पति और उसके परिजनों ने उनकी बेटी को आग के हवाले कर दिया।

    करीब 95 प्रतिशत तक झुलस चुकी पीड़िता की 30 नवंबर को अस्पताल में सेप्टीसीमिया के कारण मौत हो गई।

    सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता मां सहित कई प्रमुख गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। इसके बावजूद निचली अदालत ने मृत्युपूर्व बयान, बयान दर्ज करने वाले नायब तहसीलदार और डॉक्टर की गवाही के आधार पर पति और ससुर को दोषी ठहराया।

    अपील में पति ने दलील दी कि पीड़िता 95 प्रतिशत तक झुलसी हुई, इसलिए उसके लिए स्पष्ट और सुसंगत बयान देना संभव नहीं था।

    यह भी कहा गया कि बयान की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है। पति का यह भी दावा था कि खाना बनाते समय मिट्टी के तेल का दीया गिरने से यह हादसा हुआ।

    हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि यह वास्तव में दुर्घटना होती तो पति अपनी गंभीर रूप से झुलसी पत्नी को तत्काल अस्पताल ले जाता और पुलिस को सूचना देता। लेकिन रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह घटनास्थल से फरार हो गया और पीड़िता को अस्पताल उसके मायके वालों ने पहुंचाया।

    अदालत ने कहा कि आरोपी का यह व्यवहार अभियोजन के मामले की पुष्टि करता है और यह स्पष्ट करता है कि यह दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या का मामला था।

    खंडपीठ ने यह भी पाया कि मृत्युपूर्व बयान दर्ज करते समय पीड़िता के मायके पक्ष का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। इसलिए उसे किसी प्रकार सिखाने या प्रभावित करने की संभावना नहीं थी। ऐसे में मृत्युपूर्व बयान विश्वसनीय और भरोसेमंद माना जा सकता है।

    हालांकि ससुर के संबंध में अदालत ने कहा कि वह अलग मकान में रहता था और उपलब्ध साक्ष्यों से उसकी संलिप्तता संदेह से परे साबित नहीं होती। इसलिए उसे धारा 498ए के आरोप से बरी कर दिया गया। वहीं पति की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।

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