'प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट' सिर्फ़ धार्मिक स्वरूप बदलने पर रोक लगाता है, जनहित में सरकारी अधिग्रहण पर कोई रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

2 July 2026 7:41 PM IST

  • प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट सिर्फ़ धार्मिक स्वरूप बदलने पर रोक लगाता है, जनहित में सरकारी अधिग्रहण पर कोई रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि 'प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 1991' के तहत किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को एक धार्मिक संप्रदाय से दूसरे धार्मिक संप्रदाय में बदलने पर ही रोक है, लेकिन यह कानून सरकार को 'धर्मनिरपेक्ष' और 'जनहित' के कामों के लिए ऐसी संपत्तियों का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।

    इसके साथ ही, जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने वाराणसी के दालमंडी इलाके को चौड़ा करने और उसे सुंदर बनाने के काम को रोकने की मांग वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया। यह प्रोजेक्ट यूपी सरकार के 'श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर' विकास योजना का हिस्सा है।

    बेंच ने आज जारी अपने 32 पन्नों के आदेश में कहा,

    "...1991 का एक्ट एक धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल को दूसरे धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल में बदलने पर रोक लगाता है। यह सरकार को सड़क बनाने, बुनियादी ढांचा बेहतर करने या ऐसी ही किसी गतिविधि जैसे धर्मनिरपेक्ष और जनहित के कामों के लिए किसी भी धार्मिक पूजा स्थल का अधिग्रहण करने के अधिकार से वंचित नहीं करता है।"

    संक्षेप में मामला

    दालमंडी इलाके में काम करने वाले 6 किरायेदारों और दुकानदारों ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करके इलाके से बेदखल किए जाने से रोकने की मांग की थी। उन्होंने इलाके की 6 प्राचीन मस्जिदों के लिए भी सुरक्षा की मांग की थी, जिन्हें प्रोजेक्ट के तहत अपने कब्जे में लेने और गिराने का प्रस्ताव था।

    बता दें, यह इलाका मुख्य काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 800 मीटर दूर है और प्रशासन द्वारा गिराने के लिए प्रस्तावित छह प्राचीन मस्जिदें ये हैं: अंजुमन इंतजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रज़ा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारन और मस्जिद संगमरमर।

    याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इलाके में मौजूद 6 प्राचीन मस्जिदों को गिराकर हज़ारों नागरिकों को उनकी आजीविका और रहने की जगह के अधिकार के साथ-साथ पूजा करने के अधिकार से वंचित करने से कोई जनहित का काम पूरा नहीं होगा, जबकि प्रतिवादी (सरकार/प्रशासन) का कहना है कि इसमें जनहित शामिल है। उन्होंने तर्क दिया कि ये मस्जिदें 15 अगस्त 1947 से पहले से मौजूद थीं, इसलिए 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' के तहत सुरक्षित थीं और इन्हें गिराना 1991 के अधिनियम का उल्लंघन होगा।

    आखिर में, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रोजेक्ट रूट के विस्तार के लिए प्रस्तावित ज़मीन का अधिग्रहण मनमाना, गैर-कानूनी और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था, और इसे "एक खास समुदाय को निशाना बनाने" के लिए डिज़ाइन किया गया।

    हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को दर्ज करते हुए अपने आदेश में ऐसी बातों को "अजीब दलीलें" बताया।

    दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि 1991 का अधिनियम सरकार को बड़े सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए पूजा स्थल की ज़मीन का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।

    यह कहा गया कि RFCTLARR अधिनियम, 2013 के तहत, सरकार के पास सार्वजनिक उद्देश्य, जैसे कि सड़कें, हाईवे या सार्वजनिक बुनियादी ढांचा बनाने के लिए किसी भी संपत्ति - जिसमें धार्मिक संपत्ति भी शामिल है - का अधिग्रहण करने का अधिकार है।

    राज्य ने यह भी तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 51 और 91 भी उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए ऐसे अधिग्रहण की अनुमति देती हैं।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    इन दलीलों के आधार पर जस्टिस मुनीर की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता, संबंधित संपत्तियों के मालिक नहीं बल्कि सिर्फ़ किराएदार हैं, इसलिए अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देने का उनका अधिकार सीमित है।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमें लगता है कि याचिकाकर्ता यहां मालिकाना हक के बजाय अपने कारोबार और आजीविका के साधन की रक्षा के लिए आए हैं।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि संपत्ति के असली मालिक (टाइटल होल्डर) प्रोजेक्ट को चुनौती देने के लिए आगे नहीं आए। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि 2013 के अधिनियम के तहत ज़मीन अधिग्रहण के मामलों में, मुख्य रूप से मालिक को ही आपत्ति करने, बिक्री पर बातचीत करने या अधिग्रहण का सामना करने का अधिकार होता है।

    कोर्ट इस बात से भी सहमत नहीं था कि मुस्लिम होने के नाते याचिकाकर्ताओं को संबंधित मस्जिदों की रक्षा करने का अधिकार था।

    कोर्ट ने कहा:

    "ये मस्जिदें रजिस्टर्ड वक्फ हैं और हर मामले में इनका अपना मुतवल्ली (प्रबंधक) है। बेशक, कुछ मामलों में मुस्लिम समुदाय के सदस्य आगे आ सकते हैं, लेकिन असल में मुतवल्ली और वक्फ बोर्ड को ही ऐसी संपत्तियों की रक्षा करनी होती है।"

    अब, अगर राज्य सरकार मस्जिदों का अधिग्रहण करती है तो 1991 के कानून का उल्लंघन होने की दलील पर, बेंच ने कानून की धारा 3 और 4 का ज़िक्र किया और उनका सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकाला।

    इसमें कहा गया कि इस कानून का मकसद किसी पूजा स्थल (चर्च, मंदिर, मस्जिद) को एक धार्मिक समुदाय से दूसरे धार्मिक समुदाय में बदलने पर रोक लगाना है, और 15 अगस्त 1947 की स्थिति को बनाए रखना है।

    बेंच ने साफ़ किया कि इसका मकसद कभी भी राज्य के उस अधिकार के खिलाफ ढाल बनना नहीं था, जिसके तहत वह जनहित (जैसे सड़कें या ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना) के लिए ज़मीन का अधिग्रहण कर सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "1991 के कानून का मकसद राज्य के उस अधिकार को सीमित करना नहीं है, जिसके तहत वह भारत के इलाके में मौजूद सभी ज़मीनों का सर्वोच्च मालिक है और किसी भी सार्वजनिक मकसद के लिए उनका अधिग्रहण और इस्तेमाल कर सकता है - बेशक, इसमें मालिक को उचित और सही मुआवज़ा पाने का अधिकार शामिल है। 'एमिनेंट डोमेन' (eminent domain) के सिद्धांत का असल में यही मतलब है। 1991 का कानून राज्य के इस अधिकार को कम करने के लिए नहीं बनाया गया।"

    कोर्ट ने डॉ. एम. इस्माइल फारूकी और अन्य बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया कि मस्जिद इस्लाम धर्म के पालन का ज़रूरी हिस्सा नहीं है और मुसलमान कहीं भी, यहाँ तक कि खुली जगह में भी नमाज़ पढ़ सकते हैं; इसलिए, भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत मस्जिद का अधिग्रहण प्रतिबंधित नहीं है।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि उसकी ये बातें "राज्य, वक्फ बोर्ड और संबंधित मस्जिदों के मुतवल्ली (प्रबंधक) के अधिकारों पर असर डाले बिना" कही गई हैं, ताकि वे ज़रूरत पड़ने पर उचित कानूनी कार्यवाही में अपने अधिकारों का दावा कर सकें।

    इस पृष्ठभूमि में यह पाते हुए कि याचिकाकर्ताओं के पास कोई राहत पाने का अधिकार या कानूनी आधार नहीं है, बेंच ने याचिका खारिज की।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मोहम्मद अकरम पेश हुए।

    राज्य-प्रतिवादियों की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरलमहेश चंद्र चतुर्वेदी पेश हुए, जिनकी सहायता अतिरिक्त मुख्य सरकारी वकील सुरेश सिंह ने की।

    नगर निगम, वाराणसी की ओर से वकील विनीत संकल्प पेश हुए।

    वाराणसी विकास प्राधिकरण, वाराणसी की ओर से वकील रवि प्रकाश पांडे पेश हुए।

    Case title - Syed Rashid Ali and others vs State of UP and others 2026 LiveLaw (AB) 344

    Next Story