हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

  • हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (28 सिंतबर, 2026 से 02 अक्टूबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    बाद में रोक को कुछ समय के लिए टालने से बोली लगाने वाला व्यक्ति बोली की तय तारीख पर योग्य नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर टेंडर डॉक्यूमेंट में यह कहा गया कि बोली की तय तारीख पर सरकारी रोक (Debarment) होने पर कोई कंपनी बोली लगाने के लिए अयोग्य होगी, तो बाद में उस रोक को कुछ समय के लिए टालने (Abeyance) का आदेश केवल उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन वह पास किया गया हो; यह आदेश पिछली तारीख से लागू होकर बोली लगाने वाले को तय तारीख पर योग्य नहीं बनाता।

    'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल' (RFP) के क्लॉज़ 2.1.18 में यह प्रावधान है कि अगर किसी कंपनी को केंद्र या राज्य सरकार, या उनके नियंत्रण वाली किसी संस्था ने किसी प्रोजेक्ट में भाग लेने से रोका (debar) है तो वह कंपनी बोली की तय तारीख पर रोक लागू रहने की स्थिति में बोली जमा करने के लिए योग्य नहीं होगी।

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    ज़िला जज LARRA के अवॉर्ड को 'डिक्री' की तरह लागू कर सकते हैं, लेकिन मेरिट के आधार पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण' (LARRA) का अवॉर्ड एक 'डीम्ड डिक्री' (मान ली गई डिक्री) होता है, जिसे ज़िला अदालत लागू कर सकती है।

    जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि इसे लागू करने वाली ज़िला अदालत केवल इसे लागू करने वाली एजेंसी के तौर पर काम करती है और अवॉर्ड के मेरिट पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकती या उसके पीछे नहीं जा सकती, चाहे वह 'सिविल प्रक्रिया संहिता' (CPC) की धारा 47 के तहत हो या 'ऑर्डर XXI CPC' के न्यायिक प्रावधानों के तहत। कोर्ट ने यह भी कहा कि LARRA अवॉर्ड को लागू करने के मकसद से ज़िला अदालत पर अधिनियम की धारा 63 के तहत सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र की रोक लागू नहीं होती।

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    किसी महिला के शारीरिक रूप-रंग पर 'बॉडी शेमिंग' करना IPC की धारा 509 के तहत मर्यादा के अपमान का अपराध नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में शिकायतकर्ता के साथ बॉडी शेमिंग और मौखिक दुर्व्यवहार करने के आरोपी दो लोगों के खिलाफ महिला की मर्यादा भंग करने की आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि अकेले बॉडी शेमिंग करना IPC की धारा 509 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध नहीं बनता। [2026 LiveLaw (Kar) 399]

    धारा 509 के अनुसार, जो कोई भी किसी महिला की मर्यादा का अपमान करने के इरादे से कोई शब्द कहता है, कोई आवाज़ या इशारा करता है, या कोई वस्तु दिखाता है - इस इरादे से कि वह शब्द या आवाज़ उस महिला द्वारा सुनी जाए, या वह इशारा या वस्तु उसके द्वारा देखी जाए - या उस महिला की निजता में दखल देता है, तो उसे दंडित किया जाएगा।

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    ED द्वारा प्रॉपर्टी ज़ब्त करने के फ़ैसले को आर्टिकल 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने PMLA के तहत प्रॉपर्टी ज़ब्त करने के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया, जबकि मुख्य अपराध (Predicate Offence) रद्द कर दिया गया।

    कोर्ट ने कहा कि चूंकि PMLA एक "पूरा कोड" है, जिसमें अधिकारियों और उपायों की एक व्यवस्था है। हालांकि ज़ब्ती के आदेश के ख़िलाफ़ आर्टिकल 226 के तहत याचिका दायर की जा सकती है, लेकिन उस पर सुनवाई करना कोर्ट की न्यायिक मर्ज़ी पर निर्भर करता है।

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    आवेदन की आखिरी तारीख से पहले एक्सपायर हो चुके पिछड़े वर्ग सर्टिफिकेट को अमान्य माना जाएगा: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जिस उम्मीदवार ने टीचिंग पोस्ट के लिए अपने आवेदन के साथ एक्सपायर हो चुका 'बैकवर्ड क्लास-A' (BCA) सर्टिफिकेट लगाया, उसे आवेदन की आखिरी तारीख के बाद मिले नए सर्टिफिकेट के आधार पर योग्य नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश के खिलाफ 'लेटर्स पेटेंट अपील' को खारिज किया। सिंगल जज ने BCA कैटेगरी में मेवात कैडर के प्राइमरी टीचर (PRT) पद के लिए अपीलकर्ता की उम्मीदवारी रद्द करने के फैसले को सही ठहराया था।

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    अनुशासनात्मक जांच के दौरान अंतरिम स्तर पर वकीलों को सस्पेंड नहीं कर सकती बार काउंसिल: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान अंतरिम स्तर पर वकीलों को सस्पेंड करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(c) (दुर्व्यवहार के लिए वकीलों को सज़ा) के तहत सस्पेंशन अंतिम आदेश है, जिसे अनुशासनात्मक कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान पारित नहीं किया जा सकता।

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    Motor Accident Claims | मृत्यु के बाद भरे गए इनकम टैक्स रिटर्न का इस्तेमाल मृतक की आय का आकलन करने के लिए किया जा सकता है: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है कि दुर्घटना के मुआवज़े को तय करने के लिए मृतक की आय की गणना करते समय मृत्यु के बाद भरे गए इनकम टैक्स रिटर्न पर विचार नहीं किया जा सकता। [2026 LiveLaw (Guj) 269]

    ऐसा करते हुए कोर्ट ने मृतक के परिवार को दिए जाने वाले दुर्घटना मुआवज़े में ₹6,16,342 की बढ़ोतरी की। कोर्ट मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के उस आदेश के खिलाफ दावेदारों की अपील पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें 9% सालाना ब्याज दर के साथ ₹6,01,400 का मुआवज़ा दिया गया।

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    चुने हुए पंचायत सदस्य को कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत के चुने हुए सदस्य के पास किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश की रिट) की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। [2026 LiveLaw (MP) 400]

    इस बात पर ज़ोर देते हुए कि 'रिट ऑफ़ मैंडमस' का इस्तेमाल कानूनी अधिकार और उससे जुड़े कानूनी/सार्वजनिक कर्तव्य को लागू करने के लिए किया जाता है, जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने कहा: "यह तथ्य कि याचिकाकर्ता जनपद पंचायत का चुना हुआ सदस्य है और उसने किसी कर्मचारी के कामकाज के बारे में शिकायतें/आवेदन दिए, उसे उस कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' की मांग करने का अधिकार नहीं देता है।"

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    बिना भरण-पोषण मांगे भी बहू से घर खाली करा सकता है बुजुर्ग: दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़े एक अहम फैसले में कहा कि किसी सीनियर सिटीजन को अपनी बहू के खिलाफ घर खाली कराने की कार्रवाई शुरू करने के लिए पहले भरण-पोषण की मांग करना जरूरी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और उनकी संपत्ति से बेटे, बेटी या कानूनी उत्तराधिकारी को बेदखल करने की कार्यवाही अलग-अलग हैं।

    चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि दिल्ली माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण एवं कल्याण नियम, 2009 के नियम 22(3)(1) के तहत बेदखली की कार्रवाई स्वतंत्र रूप से की जा सकती है। इसके लिए वरिष्ठ नागरिक को वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत भरण-पोषण का दावा करना अनिवार्य नहीं है।

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    व्हाट्सऐप पर आपत्तिजनक तस्वीरें फैलाना 'सार्वजनिक दृश्य' में माना जा सकता है, SC/ST Act लागू होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला के आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीरें व्हाट्सऐप जैसे सामाजिक माध्यम के जरिए प्रसारित करना 'सार्वजनिक दृश्य' में किया गया कृत्य माना जा सकता है और ऐसी स्थिति में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

    जस्टिस यंशिवराज खोबरागड़े ने यह टिप्पणी निखिल थेपाले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 और 78 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66(ई) और 67 के तहत मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा उस पर SC/ST Act की धारा 3(1)(आर), 3(1)(डब्ल्यू)(ii) और 3(2)(वीए) के तहत भी आरोप हैं।

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    पत्नी के पिता के पैसों से खरीदी गई संयुक्त संपत्ति पर केवल उसका ही अधिकार: केरल हाईकोर्ट का फैसला

    केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर खरीदी गई संपत्ति की पूरी रकम पत्नी के पिता ने उसकी भलाई के लिए दी थी और पति अपने योगदान का प्रमाण पेश नहीं कर पाया तो परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पत्नी को संपत्ति का विशेष स्वामित्व दिया जा सकता है। कोर्ट ने महिला को 2.8 एर भूमि और उस पर बने मकान का विशेष मालिक घोषित करते हुए पति को तीन महीने के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया।

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    गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना ही काफी नहीं, आरोपी को नज़दीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (29 सितंबर) को कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति को 'सबसे पास वाले' मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। इसलिए जस्टिस सारंग कोटवाल और जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले की डिवीज़न बेंच ने कलीम शेख को ज़मानत दी, जिसे सोलापुर ज़िले के बरशी से गिरफ्तार करके मुंबई के पास मीरा रोड लाया गया और वहां पेश किया गया।

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    Hookah Bars | फ़ूड सेफ़्टी डिपार्टमेंट और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन लाइसेंस जारी नहीं कर सकते, पुलिस COTPA लागू कर सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार के लिए लाइसेंस जारी करने या उन्हें रेगुलेट करने का अधिकार न तो फ़ूड सेफ़्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के पास है और न ही म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के पास। हालांकि, बेंच ने साफ़ किया कि 'सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन पर रोक और व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का नियमन) अधिनियम, 2003' (COTPA) के तहत पुलिस को उन प्रतिष्ठानों की तलाशी लेने, उन्हें ज़ब्त करने और जुर्माना लगाने का अधिकार है जो इस कानून का उल्लंघन करते हैं।

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    NRI कोटा सीटों पर SC, ST, OBC आरक्षण लागू नहीं हो सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच ने कहा कि NEET-UG काउंसलिंग प्रोसेस में NRI (नॉन-रेसिडेंट इंडियन) कोटा सीटों पर SC (अनुसूचित जाति), ST (अनुसूचित जनजाति) या OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) का आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस एम नागप्रसन्ना और जस्टिस हेमा कुलकर्णी की डिवीजन बेंच ने 18 साल की एक NEET-UG कैंडिडेट की याचिका खारिज की। कैंडिडेट ने NRI (स्पॉन्सर्ड) कैंडिडेट के तौर पर अप्लाई करने के बावजूद, चल रही NEET-UG काउंसलिंग प्रोसेस के दौरान अपना OBC स्टेटस बनाए रखने की इजाज़त मांगी थी।

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    UP में हुक्का बार पर रोक, निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र में भी नहीं दे सकते हुक्का सर्विस: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार संचालित नहीं किए जा सकते और रेस्टोरेंट के निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र में भी हुक्का सर्विस नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थान को धूम्रपान के लिए निर्धारित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वहां रेस्टोरेंट ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध कराने की सेवा दे सकता है। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने हुक्का बार और रेस्टोरेंट में हुक्का सर्विस से संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

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    गिरफ्तारी के आधार नहीं बताने पर पहली गिरफ्तारी गलत ठहरी तो मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना दोबारा गिरफ्तारी अवैध: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी को संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार बताए बिना हिरासत में रखने के कारण रिहा किया गया तो जांच एजेंसी अपनी मर्जी से उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। दोबारा गिरफ्तारी के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना जरूरी है।

    जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई दोबारा गिरफ्तारी अवैध होगी और आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानी जाएगी।

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    घरेलू संबंध के बिना PWDV Act के तहत कार्यवाही नहीं: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने कहा कि Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 (PWDV Act) के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही के लिए उसके और पीड़िता के बीच घरेलू संबंध (Domestic Relationship) का होना जरूरी है। जस्टिस जॉबिन सेबेस्टियन ने यह टिप्पणी PWDV Act की कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका पर की। कोर्ट ने पति के भाई और बहन (देवर-ननद) के खिलाफ लंबित कार्यवाही रद्द कर दी।

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