बाद में रोक को कुछ समय के लिए टालने से बोली लगाने वाला व्यक्ति बोली की तय तारीख पर योग्य नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • बाद में रोक को कुछ समय के लिए टालने से बोली लगाने वाला व्यक्ति बोली की तय तारीख पर योग्य नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर टेंडर डॉक्यूमेंट में यह कहा गया कि बोली की तय तारीख पर सरकारी रोक (Debarment) होने पर कोई कंपनी बोली लगाने के लिए अयोग्य होगी, तो बाद में उस रोक को कुछ समय के लिए टालने (Abeyance) का आदेश केवल उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन वह पास किया गया हो; यह आदेश पिछली तारीख से लागू होकर बोली लगाने वाले को तय तारीख पर योग्य नहीं बनाता।

    'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल' (RFP) के क्लॉज़ 2.1.18 में यह प्रावधान है कि अगर किसी कंपनी को केंद्र या राज्य सरकार, या उनके नियंत्रण वाली किसी संस्था ने किसी प्रोजेक्ट में भाग लेने से रोका (debar) है तो वह कंपनी बोली की तय तारीख पर रोक लागू रहने की स्थिति में बोली जमा करने के लिए योग्य नहीं होगी।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा,

    “14.09.2026 के उस पत्र ने केवल 14.09.2026 से (जो बोली की तय तारीख के सात दिन बाद थी) रोक को कुछ समय के लिए टाल दिया (Abeyance में रखा)। रोक को सस्पेंड करने वाला आदेश भविष्य के लिए लागू होता है। यह रोक को खत्म नहीं करता और न ही इसे आदेश पास होने से पहले की किसी अवधि के लिए गैर-मौजूद बनाता है।”

    उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (UPEIDA) ने 22.06.2026 को जेवर एयरपोर्ट से गंगा एक्सप्रेसवे तक बुलंदशहर लिंक एक्सप्रेसवे (पैकेज-I) के विकास के लिए ई-टेंडर आमंत्रित किए। बोली की तय तारीख 07.09.2026 थी, जिस दिन लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड ने 11 अन्य लोगों के साथ बोली लगाई थी। उस समय जल जीवन मिशन, यूपी का 13.04.2026 का आदेश लागू है, जिसके तहत कंपनी पर रोक लगाई गई। कंपनी ने इस बात का खुलासा नहीं किया और केवल क्लॉज़ 2.2.2.10 के तहत यह घोषणा की कि पिछले पांच वर्षों में निर्माण संबंधी खामियों के कारण संरचनाओं या राजमार्गों की कोई बड़ी विफलता (Catastrophic Failure) नहीं हुई। जब मूल्यांकन के दौरान UPEIDA के ध्यान में सार्वजनिक जानकारी आई तो स्पष्टीकरण मांगा गया। 22.09.2026 को जवाब देते हुए कंपनी ने पहली बार बताया कि मिशन ने 14.09.2026 के पत्र के ज़रिए डिबारमेंट (प्रतिबंध) को रोक दिया। मध्य प्रदेश राज्य द्वारा लगाए गए एक और डिबारमेंट को भी, जिसे जबलपुर में चुनौती दी जा रही थी। 25.09.2026 को बोली को 'नॉन-रिस्पॉन्सिव' (नियमों के अनुरूप न होने के कारण अयोग्य) घोषित कर दिया गया।

    सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और जे.एन. माथुर ने तर्क दिया कि टेंडर में डिबारमेंट से जुड़ी एकमात्र शर्त क्लॉज़ 2.2.2.10 थी और क्लॉज़ 2.1.18 में केवल यह बताया गया कि कौन आवेदन कर सकता है। क्लॉज़ 1.2.2 का हवाला देते हुए, जिसके तहत बोलियां 120 दिनों तक मान्य रहती हैं, उन्होंने आग्रह किया कि योग्यता की जांच मूल्यांकन की तारीख पर की जानी चाहिए थी, जिस समय तक डिबारमेंट पर रोक लग चुकी थी। यह भी कहा गया कि अन्य प्रतिभागियों को कमियों को दूर करने की अनुमति दी गई और कंपनी की कीमत L-1 कीमत से 252 करोड़ रुपये से भी कम थी।

    UPEIDA की ओर से सीनियर एडवोकेट गौरव मेहरोत्रा ​​ने तर्क दिया कि योग्यता की जांच बोली जमा करने की अंतिम तारीख पर की जानी चाहिए, जिस तारीख को कंपनी स्पष्ट रूप से डिबार (प्रतिबंधित) थी।

    एडिशनल एडवोकेट जनरल प्रीतिश कुमार ने कहा कि राहत देने से उन संस्थाओं के लिए समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) खत्म हो जाएगा, जिन्होंने क्लॉज़ 2.1.18 को पढ़ा, खुद को अयोग्य पाया और दूर रहीं।

    कोर्ट ने माना कि जो क्लॉज़ यह बताता है कि कौन बोली जमा करने के लिए योग्य नहीं होगा, वह अपनी प्रकृति में योग्यता की शर्त है, चाहे वह किसी भी हेडिंग के तहत क्यों न हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "एक पात्रता पट्टी अपने स्वयं के बल से संचालित होती है। एक बोली लगाने वाले को पता होना चाहिए कि क्या वह वर्जित है और उसे केवल तभी बोली लगानी चाहिए यदि वह पात्र है। वर्जित घोषित करने के लिए एक निर्धारित प्रारूप की अनुपस्थिति एक वर्जित इकाई को भाग लेने के लिए लाइसेंस नहीं देती। यदि ऐसा होता है तो एक अयोग्य बोली लगाने वाला केवल चुप रहकर बार को दरकिनार कर सकता है।"

    न्यायालय ने कहा कि खंड 2.2.2.10, बोली लगाने वाले के निर्माण रिकॉर्ड का परीक्षण करता है और तकनीकी क्षमता का एक गुण है, जबकि खंड 2.1.18 बोली लगाने के अधिकार पर जाता है। बेदाग रिकॉर्ड वाले बोलीदाता को अभी भी पूरी तरह से अलग-अलग कारणों से प्रतिबंधित किया जा सकता है और कंपनी की रीडिंग खंड 2.1.18 को समाप्त कर देगी।

    न्यायालय ने कहा,

    "..ये दोनों अलग-अलग गोलार्धों में कार्य करते हैं और एक दूसरे से स्वतंत्र हैं.."

    न्यायालय ने माना कि खंड 1.2.2 केवल यह तय करता है कि एक बोली लगाने वाले को उसके प्रस्ताव पर कितने समय तक रोक लगानी है। एक वैधता खंड उस स्पष्ट प्रावधान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है, जो उस तारीख को तय करता है जिस पर पात्रता का परीक्षण किया जाता है।

    खंड 2.1.18 को एक आवश्यक शर्त माना गया कि कोई भी प्राधिकारी छूट नहीं दे सकता है और कोई भी बोली लगाने वाला नियत तारीख के बाद ठीक नहीं हो सकता है। यह माना गया कि कंपनी एक अहस्ताक्षरित पृष्ठ जैसी खामियों को सुधारने के लिए बोली लगाने वालों के साथ किसी समानता का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि उसने बाद की घटना के संदर्भ में, अपनी स्थिति में वर्जित से गैर वर्जित में बदलाव की मांग की।

    मूल्य अंतर पर न्यायालय ने माना कि वित्तीय प्रतिस्पर्धात्मकता की जांच केवल उन बोलीदाताओं के लिए की जाती है, जो पात्रता चरण को पूरा करते हैं और एक अयोग्य बोलीदाता द्वारा कम बोली पर विचार करने का कोई अधिकार नहीं मिलता है।

    मौजूदा प्रतिबंध का गैर-प्रकटीकरण, कंपनी के सामने आने तक अस्पष्ट था, इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत के खिलाफ माना गया। हालांकि न्यायालय ने धोखाधड़ी का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया। इसने मध्य प्रदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो कि विवादित आदेश का आधार नहीं था।

    तदनुसार, न्यायालय ने यह स्पष्ट करते हुए रिट याचिका खारिज की कि कंपनी को सक्षम फोरम के समक्ष रोक के आदेशों के खिलाफ अपने उपाय अपनाने से नहीं रोका गया।

    Case Title : Larsen And Toubro Limited Thru. Authorized Representative Arghya Chattopadhyay vs. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Deptt. Of Infrastructure/Industrial Development Lko. And 5 Others 2026 LiveLaw (AB) 790

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