व्हाट्सऐप पर आपत्तिजनक तस्वीरें फैलाना 'सार्वजनिक दृश्य' में माना जा सकता है, SC/ST Act लागू होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट

  • व्हाट्सऐप पर आपत्तिजनक तस्वीरें फैलाना सार्वजनिक दृश्य में माना जा सकता है, SC/ST Act लागू होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला के आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीरें व्हाट्सऐप जैसे सामाजिक माध्यम के जरिए प्रसारित करना 'सार्वजनिक दृश्य' में किया गया कृत्य माना जा सकता है और ऐसी स्थिति में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

    जस्टिस यंशिवराज खोबरागड़े ने यह टिप्पणी निखिल थेपाले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 और 78 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66(ई) और 67 के तहत मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा उस पर SC/ST Act की धारा 3(1)(आर), 3(1)(डब्ल्यू)(ii) और 3(2)(वीए) के तहत भी आरोप हैं।

    मामले के अनुसार, पीड़िता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित है। आरोप है कि आरोपी ने उससे यौन संबंध बनाने और यौन इच्छा पूरी करने की मांग की थी। पीड़िता के इनकार करने के बाद आरोपी ने उसके आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें बनाए और बाद में उन्हें अलग नंबर से उसके पति, ननद तथा अन्य रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप पर भेज दिया।

    आरोपी की ओर से दलील दी गई कि व्हाट्सऐप जैसे सामाजिक माध्यम पर किसी व्यक्ति का आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीर प्रसारित करना अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत 'सार्वजनिक दृश्य' में किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अग्रिम जमानत की मांग की गई।

    हाईकोर्ट ने हालांकि उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में SC/ST Act की संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्व मौजूद दिखाई देते हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरों को व्हाट्सऐप के माध्यम से प्रसारित किए जाने का उल्लेख किया।

    जस्टिस खोबरागड़े ने कहा,

    “रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री को ध्यान में रखते हुए प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि SC/ST Act की धारा 3(1)(डब्ल्यू)(ii) और 3(2)(वीए) के अपराध के लिए आवश्यक तत्व मौजूद हैं, क्योंकि पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें उसके मोबाइल से व्हाट्सऐप जैसे सामाजिक माध्यम पर प्रसारित की गईं, जो सार्वजनिक दृश्य में है।”

    गौरतलब है कि इसी मामले में जस्टिस खोबरागड़े ने मार्च में आरोपी को अंतरिम राहत दी और उस समय FIR में SC/ST Act की धाराएं लागू होने पर सवाल उठाया। हालांकि बाद में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का विस्तृत अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने माना कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मजबूत मामला बनता है और अग्रिम जमानत देने से इनकार किया।

    अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले की FIR 5 नवंबर 2025 को दर्ज की गई और उसके बाद से आरोपी फरार है। विशेष अदालत द्वारा उसकी अग्रिम जमानत की अर्जियां दो बार खारिज की जा चुकी थीं।

    कोर्ट ने कहा कि मामले में आरोपी अपराध दर्ज होने की तारीख से फरार है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।

    हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ निखिल थेपाले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।

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