पत्नी के पिता के पैसों से खरीदी गई संयुक्त संपत्ति पर केवल उसका ही अधिकार: केरल हाईकोर्ट का फैसला

  • पत्नी के पिता के पैसों से खरीदी गई संयुक्त संपत्ति पर केवल उसका ही अधिकार: केरल हाईकोर्ट का फैसला

    केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर खरीदी गई संपत्ति की पूरी रकम पत्नी के पिता ने उसकी भलाई के लिए दी थी और पति अपने योगदान का प्रमाण पेश नहीं कर पाया तो परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पत्नी को संपत्ति का विशेष स्वामित्व दिया जा सकता है। कोर्ट ने महिला को 2.8 एर भूमि और उस पर बने मकान का विशेष मालिक घोषित करते हुए पति को तीन महीने के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया।

    जस्टिस सतीश निनान और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार की डिवीजन बेंच ने यह फैसला महिला की अपील पर सुनाया। महिला ने अपने पति के साथ संयुक्त नाम पर खरीदी गई आवासीय संपत्ति पर अपने अधिकार को लेकर फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। फैमिली कोर्ट ने माना कि संपत्ति खरीदने के लिए पूरी रकम महिला के पिता ने दी थी और उसे पति से 15 लाख रुपये की राशि वसूलने का अधिकार दिया।

    मामले में पति की ओर से दलील दी गई कि बिक्री विलेख में संपत्ति की कीमत 7.58 लाख रुपये दर्ज है, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के आधे हिस्से के लिए 15 लाख रुपये निर्धारित करना उचित नहीं है। इसके लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 का हवाला दिया गया। इस प्रावधान के तहत किसी लिखित दस्तावेज में दर्ज शर्तों को मौखिक या अन्य साक्ष्य के जरिए बदलने या उससे अलग साबित करने पर सामान्य तौर पर रोक रहती है।

    हाईकोर्ट ने हालांकि कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14 फैमिली कोर्ट को साक्ष्य स्वीकार करने की विशेष शक्ति देती है। इस धारा के तहत कोर्ट ऐसे रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, सूचना या अन्य सामग्री को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो सामान्य परिस्थितियों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य नहीं होती, यदि उससे विवाद का प्रभावी तरीके से निपटारा करने में मदद मिलती हो।

    कोर्ट ने कहा कि इस विशेष प्रावधान के कारण फैमिली कोर्ट, साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 के बावजूद, मामले से जुड़े अन्य साक्ष्यों पर विचार कर सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि फैमिली कोर्ट सामान्य साक्ष्य संबंधी सावधानियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर सकता है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 14 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए और सामग्री की विश्वसनीयता तथा उसके प्रमाणिक महत्व को मामले की परिस्थितियों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

    इस मामले में पत्नी और उसके पिता के मौखिक बयानों को पिता के बैंक खाते के विवरण से भी समर्थन मिला। बैंक विवरण के अनुसार बिक्री विलेख के निष्पादन वाले दिन पिता के खाते से 25 लाख रुपये की राशि निकली थी। दूसरी ओर, पति ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि उसने संपत्ति खरीदने के लिए रकम दी।

    पति ने दावा किया कि रकम उसे उसके बहनोई ने दी थी, जो उसके साथ विदेश में काम कर चुका था। हालांकि, बहनोई को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और न ही ऐसा कोई दस्तावेज पेश किया गया, जिससे रकम के स्रोत या भारत में उसके आने का तरीका साबित हो सके।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने पत्नी की इस दलील को स्वीकार किया कि संपत्ति उसके पिता द्वारा उसके लाभ के लिए उपलब्ध कराई गई रकम से खरीदी गई, भले ही सेल डीड पति और पत्नी दोनों के संयुक्त नाम पर बनाया गया।

    कोर्ट ने संपत्ति के संयुक्त नाम पर होने के कानूनी प्रभाव पर भी विचार किया। इस संबंध में कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति के वास्तविक अधिकार का निर्धारण केवल दस्तावेज में दर्ज नामों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि लेन-देन के पीछे की मंशा और परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। इसमें पक्षकारों के बीच संबंध, उनका आचरण, खरीद की रकम का स्रोत, संपत्ति पर कब्जा और मूल दस्तावेजों की अभिरक्षा जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    हाईकोर्ट ने संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 45 का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि सामान्य स्थिति में, जब कोई संपत्ति दो या अधिक व्यक्तियों के पक्ष में हस्तांतरित होती है तो उनके हित उस रकम के अनुपात में निर्धारित हो सकते हैं जो उन्होंने संपत्ति खरीदने के लिए दी हो। मौजूदा मामले में पूरी रकम पत्नी के पिता ने उसकी भलाई के लिए उपलब्ध कराई।

    कोर्ट ने कहा कि मामले की दलीलों और साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि महिला का दावा केवल पति के हिस्से की रकम वापस पाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संपत्ति पर विशेष स्वामित्व का दावा कर रही है।

    हाईकोर्ट ने आदेश 7 नियम 7 दीवानी प्रक्रिया संहिता और पारिवारिक विवादों की विशेष प्रकृति का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पूर्ण न्याय करने के लिए राहत का स्वरूप तय कर सकती है, भले ही याचिका में विशेष स्वामित्व की घोषणा ठीक उसी रूप में नहीं मांगी गई हो।

    कोर्ट ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 10(3) का भी उल्लेख किया, जो फैमिली कोर्ट को पक्षकारों के बीच विवाद में सच्चाई तक पहुंचने के लिए अपनी प्रक्रिया अपनाने की अनुमति देती है।

    कोर्ट ने कहा,

    “इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि फैमिली कोर्ट द्वारा पारित डिक्री में संशोधन किया जाना चाहिए और उक्त संपत्ति पर याचिकाकर्ता के विशेष अधिकार की घोषणा करते हुए उसे प्रतिवादी से संपत्ति का खाली कब्जा प्राप्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए।”

    इस फैसले के बाद महिला को 2.8 एर भूमि और उस पर बने मकान का विशेष मालिक घोषित किया गया। पति को तीन महीने के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया गया। फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के पक्ष में दिए गए 15 लाख रुपये के मौद्रिक आदेश को भी इसी आधार पर संशोधित किया गया।

    हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की, जबकि महिला की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसे संपत्ति पर विशेष अधिकार प्रदान किया।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story