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आपराधिक मामले में कर्मचारी के बरी होने से उसे सस्पेंशन की अवधि के लिए पूरी सैलरी और बकाया वेतन का अपने-आप अधिकार नहीं मिल जाता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी आपराधिक मामले में कर्मचारी के बरी होने से उसे सस्पेंशन की अवधि के लिए पूरी सैलरी और बकाया वेतन का अपने-आप अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा कि पूरी सैलरी का अधिकार हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर, और लागू सर्विस नियमों के तहत सक्षम अधिकारी द्वारा इस्तेमाल किए गए विवेक पर निर्भर करता है।जस्टिस एस.एम. मोदक और जस्टिस संदीप वी. मार्ने की डिवीज़न बेंच एक नगर निगम कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अपनी सस्पेंशन अवधि को...
न्यूज़ कंटेंट पोस्ट करने वाले यूजर्स भी आएंगे IT Rules के दायरे में, केंद्र सरकार ने दिया प्रस्ताव
केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules) में संशोधनों का प्रस्ताव दिया। इन संशोधनों का उद्देश्य मध्यस्थों के लिए सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने की बाध्यताओं का विस्तार करना और ऑनलाइन सामग्री पर नियामक निगरानी के दायरे को बढ़ाना है - जिसमें ऐसे यूज़र्स द्वारा साझा की गई समाचार और समसामयिक मामलों की सामग्री भी शामिल है जो प्रकाशक के तौर पर पंजीकृत नहीं हैं।मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधनों पर हितधारकों से प्रतिक्रिया...
CJI ने नए कारगिल कोर्ट कॉम्प्लेक्स का किया उद्घाटन, दिया शांति का संदेश
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने रविवार को कारगिल में नए ज़िला कोर्ट कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस क्षेत्र को शांति के समय में न्याय की संस्थाओं के ज़रिए मज़बूत बनाया जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ युद्ध के समय दिए गए बलिदानों के लिए याद किया जाना चाहिए।उद्घाटन भाषण देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि 1999 के युद्ध के दौरान दिए गए बलिदानों की वजह से कारगिल का राष्ट्रीय चेतना में खास स्थान है, लेकिन उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि राष्ट्र की ज़िम्मेदारी...
शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना, अगर शुरू से कोई धोखा न हो तो रेप नहीं माना जाएगा: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना रेप नहीं माना जाएगा, जब तक कि पहली नज़र में यह साबित न हो जाए कि वह वादा शुरू से ही झूठा था और सिर्फ़ सहमति पाने के लिए किया गया। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 376 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि आरोपों से ज़्यादा से ज़्यादा यही पता चलता है कि दो बालिग लोगों के बीच आपसी सहमति से बना रिश्ता टूट गया।जस्टिस आशीष नैथानी ने CrPC की धारा 482 के तहत दायर याचिका को मंज़ूरी दी। इस याचिका में...
व्यक्ति होने का अटूट पहलू अब 'राज्य-मध्यस्थता वाला अधिकार' बनने के जोखिम में: ट्रांसजेंडर बिल 2026 पर राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026, जो ट्रांसजेंडर एक्ट 2019 में संशोधन करना चाहता है, ऐसा लगता है कि वह किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के आत्म-निर्धारण के अधिकार को छीन रहा है।जस्टिस अरुण मोंगा ने कहा कि अपनी खुद की लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार, जिसकी गारंटी 2019 के एक्ट के तहत दी गई, उसे हाल के संशोधन में छीन लिया गया और नया संशोधन यह प्रस्ताव करता है कि लैंगिक पहचान की मान्यता प्रमाणन और जांच के अधीन होगी। इस प्रकार कोर्ट ने टिप्पणी की कि...
ट्रांसजेंडर को OBC में शामिल करने पर राज्य को फटकार, कहा—संवैधानिक दायित्व से पीछे हटी सरकार: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को OBC श्रेणी में शामिल करने संबंधी राज्य सरकार की अधिसूचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह कदम उनके अधिकारों को वास्तविक लाभ देने के बजाय “खाली औपचारिकता” बनकर रह गया है।यह फैसला जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।मामला गंगा कुमारी नामक एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें 12 जनवरी 2023 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत राज्य सरकार ने ट्रांसजेंडर...
लंबित आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट के NOC बिना पासपोर्ट री-इश्यू नहीं होगा: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, वे पासपोर्ट के नवीनीकरण या पुनः जारी करने के लिए सीधे आवेदन नहीं कर सकते। ऐसे मामलों में पहले संबंधित ट्रायल कोर्ट से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) प्राप्त करना अनिवार्य है।यह निर्णय जस्टिस नागेश भीमपाका ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें एक शोध वैज्ञानिक ने पासपोर्ट पुनः जारी न किए जाने को चुनौती दी थी।मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता अमेरिका में कार्यरत है और उसके खिलाफ उसकी पत्नी द्वारा IPC की धारा...
सहमति से बने किशोर रिश्तों में POCSO केस जरूरत पड़ने पर रद्द हो सकते हैं: मेघालय हाईकोर्ट
मेघालय हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यद्यपि सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष है, फिर भी अदालतों को किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों में “ग्राउंड रियलिटी” को ध्यान में रखना चाहिए और उपयुक्त मामलों में POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों को रद्द किया जा सकता है।यह टिप्पणी चीफ़ जस्टिस रेवती मोहिटे डेरे और जस्टिस एच.एस. थांगखिएव की खंडपीठ ने एक संदर्भ का उत्तर देते हुए की। प्रश्न यह था कि क्या BNSS की धारा 528 के तहत सहमति के आधार पर POCSO मामलों को समाप्त किया जा सकता है।अदालत ने कहा कि...
जांच के आदेश के बाद उसी सामग्री पर समन जारी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होकर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत जांच का आदेश देता है तो वह बाद में उसी सामग्री के आधार पर आरोपियों को समन जारी नहीं कर सकता।जस्टिस संजय धर ने कहा,“जब मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होता और जांच का आदेश देता है तो यह स्पष्ट है कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त नहीं है। ऐसे में बिना किसी नए साक्ष्य के उसी आधार पर समन जारी करना उचित नहीं है।” मामला सुंदरबनी के...
सोशल मीडिया पोस्ट फॉरवर्ड करना BNS के तहत अपराध नहीं, मंशा जरूरी: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि केवल सोशल मीडिया पर किसी सामग्री को आगे बढ़ा देना (फॉरवर्ड करना) अपने आप में अपराध नहीं है, जब तक उसमें गलत मंशा या दुष्प्रेरणा (इरादा) साबित न हो। अदालत ने इसी आधार पर फेक न्यूज फैलाने के आरोप में दर्ज FIR रद्द की।जस्टिस के. सुजना की सिंगल बेंच ने कहा,“मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ताओं ने सामग्री प्रसारित या फॉरवर्ड की तब भी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते। ऐसे में कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का...
रिमिशन याचिकाओं पर देरी पर गुजरात सरकार को चेतावनी, अवमानना कार्रवाई की चेतावनी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि दोषियों की समयपूर्व रिहाई (premature release) से जुड़े मामलों में तय समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाए, अन्यथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है।यह टिप्पणी जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक उम्रकैद कैदी की रिहाई पर निर्णय, आवश्यक अवधि पूरी होने के बावजूद लंबित था।अदालत ने पाया कि...
आतंक गतिविधियों में इस्तेमाल वाहन का कब्जा छोड़ने वाला पंजीकृत मालिक उसकी रिहाई नहीं मांग सकता: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट:
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी वाहन के पंजीकृत मालिक ने पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए वाहन का कब्जा किसी आरोपी को सौंप दिया है, तो वह बाद में उस वाहन की रिहाई के लिए दावा नहीं कर सकता, खासकर तब जब वाहन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में हुआ हो।यह फैसला जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने एक अपील खारिज करते हुए सुनाया। यह अपील राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21 के तहत दायर की गई थी, जिसमें विशेष NIA अदालत, कुपवाड़ा के उस आदेश को...
माता-पिता से मिली पत्नी की संपत्ति पर पति का कोई अधिकार नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू महिला को उसके माता-पिता से संपत्ति विरासत में मिलती है और उसकी मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है तो उस संपत्ति पर उसके पति या उसके ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होगा।जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(क) का हवाला देते हुए कहा,“यदि किसी महिला को संपत्ति उसके पिता या माता से मिली है और उसकी मृत्यु बिना संतान के होती है तो ऐसी संपत्ति उसके पिता के उत्तराधिकारियों को जाएगी न कि पति...
संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में नाबालिग के लिए अलग अभिभावक जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू नाबालिग का हित अविभाजित संयुक्त परिवार की संपत्ति में है तो उसके लिए अलग से अभिभावक नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे मामलों में परिवार का वयस्क सदस्य ही संपत्ति का प्रबंधन करता है।जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,“यदि नाबालिग का हित संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में है तो परिवार का वयस्क सदस्य चाहे पुरुष हो या महिला उस संपत्ति की देखभाल करेगा और अलग से अभिभावक नियुक्त करने की जरूरत नहीं है।” मामला एक विधवा मां से जुड़ा था जिसने अपनी नाबालिग...
जनजाति से होने मात्र से तलाक पर रोक नहीं, ठोस परंपरा साबित करना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अनुसूचित जनजाति से संबंध होने के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत तलाक की कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित समुदाय में विवाह और तलाक के लिए अलग मान्य परंपराएं मौजूद हैं।जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पत्नी की अपील खारिज की। पत्नी ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसका आवेदन खारिज कर दिया गया था। उसने यह दलील दी थी कि दोनों पक्ष मीणा...
अपनी पसंद से शादी करना सम्मान का मुद्दा नहीं, वयस्कों की सुरक्षा करना राज्य का कर्तव्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति बालिगों द्वारा अपनी पसंद से की गई शादी को सम्मान का मुद्दा नहीं बना सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में राज्य का दायित्व है कि वह दंपति के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करे, भले ही खतरा उनके अपने परिवार से ही क्यों न हो।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक दंपति ने अपनी सुरक्षा की मांग की। दोनों ने अपनी मर्जी से आर्य समाज मंदिर में विवाह...
क्या बिना नोटिस मस्जिद सील कर सकती है सरकार? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि वह किस कानून के तहत किसी मस्जिद को सील कर सकती है और क्या बिना पूर्व नोटिस दिए ऐसा करना वैध है। अदालत ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ यह सवाल याचिका की सुनवाई के दौरान उठा रही थी, जिसे एहसान अली ने दाखिल किया।याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने सितंबर, 2019 में मुजफ्फरनगर जिले के जानसठ तहसील के भोपा गांव में ज़मीन विधिवत रजिस्ट्री के जरिए खरीदी थी। वह इस...
भरण-पोषण मामलों में आय बढ़ा-चढ़ाकर बताना आम, हर बार झूठे हलफनामे पर केस जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी में कहा कि भरण-पोषण के मामलों में पत्नी द्वारा पति की आय को बढ़ाकर बताना सामान्य बात है, लेकिन ऐसे हर मामले में उसे झूठा बयान मानकर कार्रवाई शुरू करना जरूरी नहीं है।जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब पति की अपील खारिज की। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी पत्नी के खिलाफ झूठा हलफनामा देने के आरोप में कार्रवाई शुरू करने से इनकार किया गया था।पति का कहना था कि उसकी पत्नी ने भरण-पोषण के मामले में उसकी मासिक आय अलग-अलग...
CrPC की धारा 41A के तहत व्हाट्सऐप नोटिस मान्य नहीं, अर्नेश कुमार गाइडलाइन्स के उल्लंघन पर पुलिसकर्मी दोषी: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में एक पुलिस अधिकारी को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया है। मामला उस गिरफ्तारी से जुड़ा था, जो केवल व्हाट्सऐप के जरिए दी गई सूचना के आधार पर की गई थी, बिना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41-A के तहत विधिवत नोटिस जारी किए।यह आदेश जस्टिस प्रवीर भटनागर की पीठ ने पारित किया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि व्हाट्सऐप के माध्यम से भेजा गया संदेश कानूनन मान्य नोटिस की श्रेणी में नहीं आता और इसे वैध सेवा (valid service) नहीं माना जा सकता।मामले के तथ्य:याचिकाकर्ता के...
मरते समय न कोई बयान, न क्रूरता का सबूत: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में 24 साल बाद पति को किया बरी
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अहम फैसले में 24 साल पुराने मामले में पति को धारा 498ए के आरोप से बरी किया। अदालत ने कहा कि न तो क्रूरता का ठोस सबूत पेश किया गया और न ही कोई वैध मरते समय का बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) मौजूद था जिससे दोष सिद्ध किया जा सके।जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोप अस्पष्ट, विरोधाभासी और भावनात्मक दावों पर आधारित थे, जिनमें कानूनी रूप से दोष साबित करने के लिए जरूरी ठोस आधार का अभाव था।मामला बोरेन मंडल की अपील से जुड़ा था जिन्हें 2002 में मालदा सेशन...




















