जानिए हमारा कानून

बिना तलाक लिए दूसरी शादी: हिन्दू विवाह अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार क्या है कानून?
बिना तलाक लिए दूसरी शादी: हिन्दू विवाह अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार क्या है कानून?

भारत में विवाह (Marriage) केवल एक सामाजिक संस्था नहीं बल्कि एक कानूनी संबंध (Legal Relationship) है, जिसे अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानूनों के तहत नियंत्रित किया गया है। हिन्दू कानून (Hindu Law) के तहत एक व्यक्ति एक समय में केवल एक विवाह कर सकता है, यानी एक पति या पत्नी के रहते दूसरी शादी करना कानूनन मना है। लेकिन आज भी कई लोग बिना पहले विवाह को खत्म किए (Divorce लिए बिना) दूसरी शादी कर लेते हैं।यह न सिर्फ कानून के खिलाफ है बल्कि इससे पहली पत्नी या पति के अधिकारों का उल्लंघन (Violation) होता...

राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 116 से 121 : ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के अभिलेखन, सीमांकन और स्वामित्व निर्धारण की प्रक्रिया
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 116 से 121 : ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के अभिलेखन, सीमांकन और स्वामित्व निर्धारण की प्रक्रिया

राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएँ 116 से 121 तक ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के अभिलेखन, सीमांकन और स्वामित्व निर्धारण की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से वर्णित करती हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्रामों की आम जरूरतों, निवास, कृषि कार्यों और स्वामित्व से जुड़ी सभी जानकारियाँ विधिसम्मत रूप से दर्ज और सुरक्षित की जाएँ। यह लेख इन धाराओं की सरल भाषा में व्याख्या प्रस्तुत करता है।धारा 116 - सामान्य प्रयोजनों के लिए उपयोग की जा रही बेनाम भूमि के संबंध में प्रक्रिया जब...

राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 103 से 110 : स्थानीय निकायों द्वारा राजस्व अधिकारियों की शक्तियों
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 103 से 110 : स्थानीय निकायों द्वारा राजस्व अधिकारियों की शक्तियों

धारा 103 – अध्याय VI के प्रयोजनों के लिए भूमि और आबादी की परिभाषाइस धारा के अंतर्गत "भूमि" और "आबादी" शब्दों की परिभाषा दी गई है जो इस अध्याय के लिए लागू होती है। भूमि में वे सभी प्रकार की जमीनें आती हैं जो राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 5(24) के अंतर्गत आती हैं, राज्य सरकार, स्थानीय निकाय या किसी शैक्षणिक संस्था के अधीन अधिग्रहित भूमि, सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भूमि जैसे रास्ते या श्मशान आदि, सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा प्राप्त अन्य भूमि, नजूल भूमि तथा आबादी क्षेत्र में...

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 14, 15 और 16 के अंतर्गत सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 14, 15 और 16 के अंतर्गत सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का उद्देश्य भारत में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स और डिजिटल हस्ताक्षरों को वैधानिक मान्यता प्रदान करना है। इस अधिनियम के अध्याय पाँच में सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख (Secure Electronic Record) और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (Secure Electronic Signature) की परिभाषा और उनकी वैधता से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान दिए गए हैं। इस अध्याय की धारा 14, 15 और 16, डिजिटल दुनिया में होने वाले लेन-देन, संविदाओं और दस्तावेजों की प्रामाणिकता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से अत्यंत...

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 14, 15 और 16 के अंतर्गत सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 14, 15 और 16 के अंतर्गत सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का उद्देश्य भारत में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स और डिजिटल हस्ताक्षरों को वैधानिक मान्यता प्रदान करना है। इस अधिनियम के अध्याय पाँच में सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख (Secure Electronic Record) और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (Secure Electronic Signature) की परिभाषा और उनकी वैधता से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान दिए गए हैं। इस अध्याय की धारा 14, 15 और 16, डिजिटल दुनिया में होने वाले लेन-देन, संविदाओं और दस्तावेजों की प्रामाणिकता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से अत्यंत...

हाईकोर्ट में लंबित मामलों और जजों की कमी का संकट: न्याय में देरी, अन्याय के बराबर
हाईकोर्ट में लंबित मामलों और जजों की कमी का संकट: न्याय में देरी, अन्याय के बराबर

भारत का संविधान न्याय को मौलिक अधिकार मानता है। हर नागरिक को त्वरित, सुलभ और निष्पक्ष न्याय मिलना चाहिए। लेकिन जब हम देश की न्याय प्रणाली की वास्तविक स्थिति को देखते हैं, खासकर हाईकोर्ट की स्थिति को, तो यह स्पष्ट होता है कि न्याय केवल कागज़ों पर तेज़ी से चलता है।न्यायालयों में मामलों की अत्यधिक संख्या और न्यायाधीशों की कमी के कारण न्याय की प्रक्रिया में बहुत अधिक देरी होती है। यह देरी न केवल न्याय को निरर्थक बनाती है, बल्कि लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी करती है। भारत में हाईकोर्ट की...

राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 99 से 102-A : गांवों में भवन निर्माण को नियंत्रित करने का अधिकार
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 99 से 102-A : गांवों में भवन निर्माण को नियंत्रित करने का अधिकार

प्रस्तावनाराजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 एक ऐसा महत्वपूर्ण कानून है जो भूमि के प्रबंधन, उपयोग और आवंटन से जुड़े नियमों को नियंत्रित करता है। इस अधिनियम के तहत कई धाराएं बनाई गई हैं जो विशेष रूप से ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में भूमि के निर्माण, बिक्री, आवंटन और उपयोग के विषय में सरकार को अधिकार प्रदान करती हैं। इस लेख में हम विशेष रूप से धाराएं 99, 100, 101, 102 और 102-A की व्याख्या सरल भाषा में करेंगे और इनके अंतर्गत दिए गए प्रावधानों को उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। धारा...