जानिए हमारा कानून
धारा 304 और 305 भारतीय न्याय संहिता, 2023 में चोरी, छीनाझपटी और विशेष परिस्थितियों में चोरी की व्याख्या
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) चोरी से जुड़े अपराधों के लिए विस्तृत प्रावधान प्रस्तुत करती है। इसके तहत धारा 304 और 305 में छीनाझपटी (Snatching) और विशेष परिस्थितियों में चोरी के मामलों को समझाया गया है। इन प्रावधानों का उद्देश्य व्यक्तिगत, सार्वजनिक संपत्ति और सामाजिक संस्थानों की सुरक्षा करना और कड़ी सजा देकर अपराधों को रोकना है।धारा 304: चोरी के रूप में छीनाझपटी (Snatching) परिभाषा और तत्व धारा 304(1) के अनुसार, छीनाझपटी वह अपराध है, जब कोई व्यक्ति चोरी करते समय...
कोर्ट कब आरोपी को डिस्चार्ज दे सकती है?
कोर्ट आरोपी को डिस्चार्ज के ज़रिए ट्रायल के पहले ही बरी कर सकती है।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 250 डिस्चार्ज का उल्लेख करती है। इस धारा के शब्दों के अनुसार यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ दिए गए दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर और इस निमित्त अभियुक्त और अभियोजन के निवेदन की सुनवायी कर लेने के पश्चात न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा।BNSS की इस...
प्रॉपर्टी डिस्प्यूट में एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के स्टे को जानिए
किसी भी प्रॉपर्टी डिस्प्यूट में एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट अपराध रोकने के उद्देश्य से प्रॉपर्टी को स्टे कर सकता है। BNSS की धारा 164 के अनुसार एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को इस संबंध में रिपोर्ट पर या किसी अन्य प्रकार से प्राप्त इत्तिला के आधार पर स्वयं का समाधान हो जाने पर की जा सकेगी।इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए यह आवश्यक होगा कि भूमि या जल से संबंधित कोई विवाद ऐसा हो जिससे लोग शांति भंग होने की संभावना है। एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट अपनी शक्ति का उपयोग उस समय ही कर सकता है जिस समय उस भूमि या...
वारंट मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा ट्रायल की प्रक्रिया: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 261- 263
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) वॉरंट मामलों (Warrant Cases) के ट्रायल की विस्तृत प्रक्रिया प्रदान करती है। वॉरंट मामले वे होते हैं जिनमें अपराध की सजा दो वर्षों से अधिक हो सकती है।अध्याय XX इस प्रक्रिया को नियंत्रित करता है और पुलिस रिपोर्ट पर आधारित मामलों (Police Report Based Cases) के लिए स्पष्ट नियम तय करता है। यहां धारा 261, 262 और 263 को सरल तरीके से समझाया गया है। धारा 261: प्रारंभिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित करना (Compliance with...
क्या पीड़ित बिना हाईकोर्ट की अनुमति के आरोपी के बरी होने के खिलाफ अपील कर सकते हैं?
सत्यपाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर दिया कि क्या पीड़ित (Victim) बिना हाईकोर्ट की अनुमति (Leave) के आरोपी के बरी होने के खिलाफ अपील कर सकते हैं।यह मामला आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 372 के प्रावधान और धारा 378(3) के प्रक्रियात्मक नियमों (Procedural Safeguards) के आपसी संबंध पर प्रकाश डालता है। यह फैसला बताता है कि पीड़ितों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। धारा 372 Cr.P.C. के तहत पीड़ितों के...
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 303 में चोरी की परिभाषा और इससे जुड़े प्रावधानों का उदाहरण भाग III
इस लेख के पिछले भागों में हमने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 303 में चोरी (Theft) की परिभाषा और इससे जुड़े प्रावधानों का विश्लेषण किया। इस भाग में हम चोरी के अतिरिक्त उदाहरणों का अध्ययन करेंगे, जो धारा 303 के तहत कानून के व्यावहारिक उपयोग को स्पष्ट करते हैं। प्रत्येक उदाहरण को चोरी के संबंधित स्पष्टीकरण (Explanation) से जोड़ा गया है।उदाहरण (h): वस्तु को छिपाना और बाद में गलत तरीके से लेना (Explanation 3) इस स्थिति में, A ने Z के घर में टेबल पर रखी एक अंगूठी देखी। तुरंत चोरी करने का साहस न...
धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्य: आदि सैव सिवाचार्यरगल मामले का विश्लेषण
आदि सैव सिवाचार्यरगल नाला संगम बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकारों (Constitutional Rights) और धार्मिक परंपराओं (Religious Practices) के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करता है और दिखाता है कि कैसे राज्य के कानून (State Law) धार्मिक व्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं।अनुच्छेद 25 और 26: धार्मिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion) अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, प्रचार करने और अभ्यास...
चोरी की समझ: भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत उदाहरण भाग II
इस लेख के पहले भाग में, हमने भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 303 के तहत चोरी की कानूनी परिभाषा को समझा। चोरी को उस कार्य के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें कोई व्यक्ति किसी की "चल संपत्ति" (Movable Property) को उसकी सहमति के बिना बेईमानी से लेता है।इस धारा में कुछ स्पष्टीकरण (Explanation) भी दिए गए हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि हिलाने, अलग करने, या किसी वस्तु को अप्रत्यक्ष रूप से हिलाने को भी चोरी माना जा सकता है। इस दूसरे भाग में, हम धारा 303 के अंतर्गत दिए गए कुछ व्यावहारिक उदाहरणों पर...
आपराधिक शिकायतों में संशोधन पर न्यायिक दृष्टिकोण: S.R. सुकुमार बनाम S. सुनाद रघुराम
S.R. सुकुमार बनाम S. सुनाद रघुराम (2015) के इस मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code या CrPC) के तहत शिकायतों में संशोधन (Amendment) के अधिकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित किया।इस मामले ने यह समझाया कि शिकायतों में संशोधन कब किया जा सकता है, विशेषकर तब जब ऐसे संशोधन की आवश्यकता हो और मजिस्ट्रेट ने अभी अपराध (Offense) का संज्ञान (Cognizance) न लिया हो। यह निर्णय समझने में अहम है कि न्यायालय की संशोधन की शक्ति (Power)...
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अश्लीलता की सीमाएं: महाराष्ट्र राज्य बनाम देविदास रामचंद्र तुलजापुरकर में न्यायिक दृष्टिकोण
देविदास रामचंद्र तुलजापुरकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015) के इस मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) के अधिकार और इसके अश्लीलता (Obscenity) के आरोपों के संदर्भ में सीमाओं पर महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान किया।इस मामले में अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 292 द्वारा अश्लील प्रकाशनों पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया। इस निर्णय में "काव्यात्मक...
सेशन कोर्ट में झूठे आरोप और अभियुक्त के मुआवजे का अधिकार : धारा 260, BNSS, 2023 के अंतर्गत सेशन कोर्ट में मुकदमे का अंतिम चरण भाग 5
यह लेख सेशन कोर्ट में मुकदमे की प्रक्रिया पर आधारित हमारी श्रृंखला का अंतिम भाग है, जिसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत सेशन कोर्ट की कार्यवाही को समझाया गया है। पिछले भागों में, हमने आरोप तय करने, अभियुक्त का जवाब (Plea) लेने, गवाहों की जांच (Witness Examination), बरी (Acquittal) और न्यायालय के निर्णय (Judgment) की प्रक्रिया पर चर्चा की। इस अंतिम भाग में, हम धारा 260 पर चर्चा करेंगे, जिसमें विशेष मामलों में गलत आरोपों के लिए अभियुक्त को मुआवजा देने का प्रावधान है। यह धारा...
ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को कंप्लेंट कैसे करें?
जब किसी व्यक्ति के साथ अपराध घटित होने पर पुलिस द्वारा FIR दर्ज़ नहीं की जाती है तब अदालत ऐसे व्यक्ति का मुकदमा सुनती है। पीड़ित को मजिस्ट्रेट के अपने साथ घटे अपराध की शिकायत करनी होती है। किसी भी संज्ञेय अपराध के मामले में धारा 173 BNSS के अंतर्गत पुलिस को सूचना देकर एफआईआर दर्ज करवाने का अधिकार पीड़ित पक्षकार को प्राप्त है। हालांकि अपराध की रिपोर्ट पक्षकार ही दर्ज करवाए आवश्यक नहीं है।जब FIR BNSS की धारा 173 के अंतर्गत दर्ज नहीं की जाती है तब व्यथित पक्षकार के पास मजिस्ट्रेट को निजी परिवाद के...
क्रिमिनल केस की सुनवाई के लिए कौन-सी कोर्ट होगी?
क्रिमिनल केस की शुरुआत FIR से होती है। उसके बाद पुलिस जब अपनी फाइनल रिपोर्ट अदालत में पेश कर देती है तब चार्ज फ्रेम होते हैं, चार्ज के बाद यह तय होता है कि किसी क्रिमिनल केस में ट्रायल किस अदालत द्वारा चलाया जाएगा। विचारण किस कोर्ट द्वारा किया जाएगा यह महत्वपूर्ण और बुनियादी प्रश्न है क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर आगे की प्रक्रिया को तय करता है तथा जब इस प्रश्न का उत्तर मिलता है जब यह तय कर लिया जाता है कि विचारण किस कोर्ट द्वारा किया जाएगा।BNSS की धारा 197 जांच और विचारण के मामूली स्थान का वर्णन...
भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 303 के तहत चोरी का अपराध और दंड
भारतीय न्याय संहिता 2023, जो हाल ही में भारतीय दंड संहिता का स्थान ले चुकी है, ने विभिन्न आपराधिक अपराधों के लिए परिभाषाएँ और दंडों में सुधार किए हैं।इसमें चोरी का अपराध, जिसे धारा 303 में विस्तार से बताया गया है, प्रमुख है। इस लेख में हम यह समझेंगे कि कानून में चोरी को कैसे परिभाषित किया गया है, उसके नियम क्या हैं, और इसके तहत दिए गए दंडों की जानकारी प्राप्त करेंगे, जिसमें पुनरावृत्ति (repeat) करने वाले अपराधियों और पहली बार कम मूल्य की चोरी के मामलों के लिए प्रावधान भी शामिल हैं। चोरी की...
सेक्शन 256 से 259, BNSS 2023 के अंतर्गत सेशन कोर्ट में ट्रायल: अभियुक्त का बचाव, केस का सारांश और जवाबी दलीलें, और निर्णय भाग 4
यह लेख भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) के अंतर्गत सेशन कोर्ट (Court of Session) में ट्रायल के चरणों की श्रृंखला का चौथा भाग है। इस श्रृंखला के पिछले भागों में अभियोजन पक्ष की भूमिका, आरोप का निर्धारण, गवाहों की जाँच और बरी करने के निर्णय पर चर्चा की गई थी। इन शुरुआती चरणों की विस्तृत जानकारी के लिए, कृपया Live Law Hindi के पूर्व लेखों का संदर्भ लें।इस लेख में सेक्शन 256 से 259 तक के चरणों को शामिल किया गया है, जिनमें अभियुक्त (Accused) का बचाव...
सरकारी विज्ञापनों में निष्पक्षता और पारदर्शिता : सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश
भारत के सुप्रीम कोर्ट के कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2015) निर्णय ने सरकारी विज्ञापनों (advertisements) को नियंत्रित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसका उद्देश्य सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रोकना और इसे राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग होने से बचाना था।इस ऐतिहासिक (landmark) मामले में न्यायालय ने सरकारी विज्ञापन को जनहित में बनाए रखने और राजनीतिक हितों से दूर रखने पर जोर दिया। यह दिशानिर्देश (guidelines) सार्वजनिक धन के उचित उपयोग को सुनिश्चित करने और सरकारी संचार में पारदर्शिता और तटस्थता...
JJ Act के तहत आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की उम्र कैसे तय की जानी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय स्टेट ऑफ एम.पी. बनाम अनुप सिंह (2015) में अभियोजन पक्ष की उम्र (Age of Prosecutrix) को आपराधिक मामलों में सही तरीके से निर्धारण के मुद्दे पर प्रमुखता दी गई है।विशेष रूप से भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code - IPC) की धारा 363, 366 और 376 के अंतर्गत मामलों में, अभियोजन पक्ष की उम्र बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह फैसला उम्र के निर्धारण में प्राथमिकता से डॉक्यूमेंट्री (Documentary) साक्ष्य पर निर्भरता की बात करता है, जब तक कि मेडिकल टेस्ट की अनिवार्यता न हो। आपराधिक...
फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट FIR कब दर्ज होती है?
FIR काफी जाना माना शब्द है। जब भी किसी व्यक्ति के साथ कोई क्रिमिनल घटना घटित होती है तब उसके द्वारा सबसे पहले एफआईआर दर्ज करवायी जाती है।FIR शब्द नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 से निकल कर आता है, जिसका पूरा नाम फर्स्ट इनफॉरमेशन रिपोर्ट है। हिंदी में इसे प्राथमिकी भी कहा जाता है।BNSS की धारा 173 के अंतर्गत इसे संज्ञेय मामलों की इत्तिला कहा गया है।बीएनएसएस के अंतर्गत अपराधों को दो प्रकार में बांटा गया है, संज्ञेय और असंज्ञेय। इसके आधार पर ही संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट के लिए दंड प्रक्रिया...
आरोपी के कोर्ट में हाजिर नहीं होने पर जमानतदार की लीगल लाइबिलिटी
किसी भी अपराध में कोर्ट द्वारा आरोपी को जमानत पर छोड़ा जाता है। ऐसी जमानत आरोपी की ओर से अन्य व्यक्ति लेता है। जब आरोपी कोर्ट में हाज़िर नहीं होता है तब एक जमानतदार की लाइबिलिटी होती है कि आरोपी को कोर्ट में प्रस्तुत करे। आमतौर पर जमानत का अर्थ विस्तृत है परंतु आपराधिक विधि में जमानत से तात्पर्य है- 'किसी अपराध में किसी व्यक्ति को न्यायालय में पेश कराने की जिम्मेदारी लेना'इससे सरल शब्दों में जमानत को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। अदालत में अभियुक्त को समय-समय पर पेश कराने एवं जब भी न्यायालय...
धार्मिक पूजा या धार्मिक समारोह में बाधा का अपराध : BNS, 2023 की धारा 300, 301 और 302 का धार्मिक सद्भावना में महत्व
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) में धार्मिक सभाओं, पवित्र स्थलों, और व्यक्तिगत धार्मिक भावनाओं की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।इन प्रावधानों का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं और स्थलों का सम्मान बनाए रखना है ताकि लोग अपनी आस्था के अनुसार पूजा या धर्म का पालन बिना किसी बाधा के कर सकें। धारा 300, 301 और 302 विशेष रूप से धार्मिक कार्यों में बाधा डालने, पवित्र स्थलों का अपमान करने, और धार्मिक भावनाओं को आहत करने से जुड़े अपराधों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। इस लेख...