Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

LiveLaw News Network
20 Nov 2021 4:45 AM GMT
हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
x

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (15 नवंबर, 2021 से 19 नवंबर, 2021) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप।

पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

"पूरी तरह से अस्वीकार्य": दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्चुअल सुनवाई के दौरान अभद्र पोशाक में पेश होने के कारण पक्षकार पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में वर्चुअल सुनवाई के दौरान अभद्र पोशाक (बनियान) पहनकर पेश होने पर एक पक्षकार के खिलाफ 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। हाईकोर्ट ने जुर्माना लगाते हुए कहा कि ऐसा आचरण पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने आदेश दिया, "वर्चुअल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता नंबर पांच अपनी पहचान के लिए आईओ द्वारा अपने निहित में पेश हुआ। याचिकाकर्ता नंबर पांच का अपने निहित में अदालत के समक्ष पेश होने का आचरण पूरी तरह से अस्वीकार्य है। भले ही कार्यवाही वर्चुअल माध्यम से आयोजित की जा रही थी, उन्हें उचित कपड़ों में अदालत के सामने पेश होना चाहिए था।"

केस शीर्षक: सौरभ गोगिया और अन्य बनाम राज्य और अन्य।

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट- "समय का विशेष महत्व; प्रक्रिया में शामिल भारी दायित्वों की कमी के कारण पीड़िता को पीड़ित नहीं होने देना चाहिए": उड़ीसा हाईकोर्ट

उड़ीसा हाईकोर्ट ने सामूहिक बलात्कार पीड़िता को 26 सप्ताह से अधिक के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार करते हुए कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के प्रावधानों से जुड़े मामलों में समय का महत्व है और किसी भी पीड़िता को प्रक्रिया में शामिल भारी दायित्वों की कमी के कारण पीड़ित नहीं होना चाहिए।

न्यायमूर्ति एस.के. पाणिग्रही एक सामूहिक बलात्कार पीड़िता की याचिका पर विचार कर रही थी, जो 26 सप्ताह से अधिक का गर्भ धारण कर रही है, जिसे अधिकार क्षेत्र की कमी के आधार पर एसडीजेएम, बांकी की अदालत ने अपने बच्चे को गर्भपात करने की अनुमति से वंचित कर दिया था।

केस का शीर्षक - 'X' बनाम ओडिशा राज्य एंड अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"वकीलों के अनियंत्रित व्यवहार को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते": इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय हिंसा की घटना की जांच के आदेश दिए

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 30 अक्टूबर को लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के बाहर वकीलों के हिंसक व्यवहार की जांच के आदेश दिए और कहा कि अदालत मूकदर्शक के रूप में वकीलों के गैर-पेशेवर और अनियंत्रित व्यवहार को नहीं देख सकती है।

न्यायमूर्ति शमीम अहमद और न्यायमूर्ति राकेश श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह भी कहा कि न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि नागरिकों को न्याय प्राप्त करने में किसी भी कठिनाई का सामना न करना पड़े।

केस का शीर्षक - पीयूष श्रीवास्तव (व्यक्तिगत रूप से) एंड अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के माध्यम से प्रधान सचिव एंड अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"न्याय सभी नैतिक कर्तव्यों का जोड़ है": उड़ीसा हाईकोर्ट ने 26 सप्ताह की गर्भावस्था में गैंगरेप सर्वाइवर को ₹10 लाख मुआवजे देने का आदेश दिया

उड़ीसा हाईकोर्ट ने राजनीतिक दार्शनिक विलियम गॉडविन का हवाला देते हुए जोर देकर कहा कि न्याय सभी नैतिक कर्तव्यों का जोड़ है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक 20 वर्षीय गैंगरेप सर्वाइवर के मामले पर सुनवाई के दौरान दी। इस मामले में हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ किए गए अपराध के लिए राज्य सरकार को 20 वर्षीय गैंगरेप सर्वाइवर को मुआवजे के रूप में 10 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया।

जस्टिस एस.के. पाणिग्रही ने 26 सप्ताह से अधिक समय के गर्भ को समाप्त करने के लिए सर्वाइवर द्वारा मांगी गई अनुमति को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के प्रावधान याचिकाकर्ता के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति नहीं देते हैं।

केस का शीर्षक - 'एक्स' बनाम ओडिशा राज्य और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सड़क दुर्घटना- न्यायालय को अनुचित सहानुभूति दिखाते हुए धारा 304-ए आईपीसी के तहत अपराध के लिए मामूली सजा नहीं देनी चाहिए: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक एक अपराधी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया, जिसने मोटर साइकिल से दो लोगों को टक्कर मार दी थी ओर उनकी मौत हो गई थी। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अनुचित सहानुभूति दिखाते हुए आईपीसी की धारा 304-ए के तहत अपराध के लिए मामूली सजा नहीं देनी चाहिए।

धारा 304-ए आईपीसी लापरवाही के कारण हुई मौत से संबंध‌ित है। (जो कोई भी लापरवाही भरा काम करके किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है, जो गैर इरादतन मानव हत्या की श्रेण‌ि में नहीं आता, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास, जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा।)

केस शीर्षक - देवेंद्र वाल्मीकि बनाम मध्य प्रदेश राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कैदी के परिवार को अपने रिश्तेदार-कैदी से मिलने के लिए पहाड़ों से मैदानी इलाकों में आने के लिए मजबूर करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि एक कैदी के परिवार को रिश्तेदार-कैदी से मिलने और बातचीत करने के लिए पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों में आने के लिए मजबूर करना, प्रथम दृष्टया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत कैदियों और उनके परिवार के सदस्यों के गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह बयान देते हुए कहा कि उत्तराखंड सरकार जेलों में भीड़ के कारण कई कैदियों को पहाड़ी जिलों में स्थित जेलों से मैदानी जिलों में स्थानांतरित कर रही है।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

केरल हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत फैमिली कोर्ट को तलाक का समर्थन करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए

केरल हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अतिरिक्त न्यायिक तलाक का समर्थन करने के लिए दायर एक याचिका में फैमिली कोर्ट द्वारा पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देश जारी किए।

न्यायमूर्ति ए. मोहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ की खंडपीठ ऐसे मामलों में फैमिली कोर्ट द्वारा की जाने वाली जांच के दायरे और प्रकृति पर विचार कर रही थी।

केस का शीर्षक: अस्बी के.एन. बनाम हाशिम एम.यू

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"हम लिव-इन रिलेशनशिप के खिलाफ नहीं हैं": इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समलैंगिक कपल को पुलिस सुरक्षा प्रदान की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक समलैंगिक जोड़े को यह कहते हुए पुलिस सुरक्षा प्रदान की कि अदालत लिव-इन रिलेशनशिप के खिलाफ नहीं है।

न्यायमूर्ति डॉ कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति अजय त्यागी की खंडपीठ अंजू सिंह और उसके लिव-इन पार्टनर की सुरक्षा याचिका पर विचार कर रही थी, जिसने दावा किया कि उन्हें परेशान किया जा रहा है और यदि उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं की जाती है तो निजी उत्तरदाताओं द्वारा उन्हें शांति से नहीं रहने दिया जाएगा।

केस का शीर्षक - अंजू सिंह @ अंजू एंड अन्य बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और 6 अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार, उसके अधिकारियों और समितियों को विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम लागू करने का निर्देश दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश सरकार और उसके सभी संबंधित अधिकारियों/समितियों को विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम, 2018 को तत्काल लागू करने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति विकास बुधवार की खंडपीठ ने यह निर्देश दिया। खंडपीठ एक याचिकाकर्ता मिथलेश नारायण तिवारी की याचिका पर सुनवाई कर रहा थी, जो 2018 की हत्या के मामले में गवाह है। प्रोटेक्शन के लिए उसका आवेदन समिति/पुलिस अधीक्षक, प्रयागराज जिला स्तर द्वारा दो बार खारिज कर दिया गया।

केस का शीर्षक - मिथलेश नारायण तिवारी बनाम यू.पी. राज्य और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कर्मचारी के इंटर कैडर ट्रांसफर के अनुरोध से राज्य का अनुचित इनकार उसके पारिवारिक जीवन के लिए सम्मान की मांग के अधिकार को प्रभावित करता है: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को कहा कि इंटर कैडर ट्रांसफर की मांग कर रहे कर्मचारी के अनुरोध को राज्य द्वारा अनुचित रूप से अस्वीकार करना, ऐसे व्यक्ति के अपने या अपने पारिवारिक जीवन के लिए सम्मान की मांग करने के अधिकार को प्रभावित करता है।

जस्टिस राजीव शकधर और ज‌स्टिस तलवंत सिंह की पीठ ने कहा, "हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि सार्थक पारिवारिक जीवन का अधिकार, जो एक व्यक्ति को एक पूर्ण जीवन जीने की अनुमति देता है और उसकी शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक एकता को बनाए रखने में मदद करता है, उसे संविधान के अनुच्छेद 21 में जगह मिलेगी। इसलिए, जब राज्य अनुचित रूप से एक कर्मचारी के इंटर कैडर ट्रांसफर के अनुरोध को अस्वीकार करता है (इस मामले में याचिकाकर्ता) तो यह ऐसे व्यक्ति के अपने पारिवारिक जीवन के लिए सम्मान की मांग करने के अधिकार को प्रभाव‌ित करता है।"

शीर्षक: लक्ष्मी भव्य तन्नेरु बनाम यून‌ियन ऑफ इंडिया और अन्‍य।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

फुल कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, जिला अदालतें पक्षकारों के अनुरोध पर हाइब्रिड/वीसी सुनवाई की सुविधा के लिए बाध्य: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को टिप्पणी की कि एक बार जब उसके फुल कोर्ट ने शहर की जिला अदालतों को पक्षकारों के अनुरोध पर हाइब्रिड या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा की अनुमति देने की अनुमति दे दी है तो अदालतें उक्त निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने फुल कोर्ट के निर्देशों के बावजूद जिला अदालतों को हाइब्रिड सुनवाई की अनुमति नहीं देने के मुद्दे पर एक याचिका पर नोटिस जारी किया।

केस का शीर्षक: अनिल कुमार हजले और अन्य बनाम दिल्ली हाईकोर्ट

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

निर्णयों/आदेशों में यूनिक QR कोड, अधिवक्ता सूचना प्रबंधन प्रणाली: मद्रास हाईकोर्ट में नई पहल

मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति में कई उल्लेखनीय पहलों का उल्लेख किया गया है। इनमें कार्यान्वित और 15 नवंबर से लागू होने वाली एक नई पहल भी शामिल हैं। नए सुधारों में एडवोकेट इंफॉर्मेशन एंड मैनेजमेंट सिस्टम (AIMS), डॉक्यूमेंट पेजिनेशन मॉड्यूल, नेत्रहीनों के लिए ब्रेल प्रिंटर, प्रत्येक निर्णय और आदेशों के लिए यूनिक QR कोड और कोर्ट केस के साथ मद्रास हाईकोर्ट के केस इंफॉर्मेशन निगरानी प्रणाली (सीसीएमएस) सिस्टम (HC-CIS) का एकीकरण शामिल हैं।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

दिल्ली हाईकोर्ट ने COVID-19 प्रोटोकॉल के पालन की शर्त पर रेस्तरां और बार में हर्बल हुक्का की अनुमति दी

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में रेस्तरां और बार में एक अंतरिम उपाय के रूप में हर्बल हुक्का की सेवा और बिक्री की COVID-19 प्रोटोकॉल का पालन करने, डिस्पोजेबल पाइप का उपयोग करने और केवल सार्वजनिक स्थानों पर हुक्का परोसने की शर्त पर अनुमति दी।

न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने कहा कि रेस्तरां और पब व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करेंगे कि वे COVID-19 प्रोटोकॉल के तहत केवल हर्बल हुक्का परोसेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार और अन्य अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं द्वारा उनके रेस्तरां में हर्बल हुक्का की सेवा में हस्तक्षेप करने से रोका जाएगा।

केस शीर्षक: ब्रीद फाइन लाउंज और बार बनाम जीएनसीटीडी

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फारेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को रद्द किया, असम‌ की महिला को भारतीय घोषित किया

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह फारेनर्स ट्रिब्यूनल के एक फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें उसने असम की महिला को विदेशी करार दिया था। असम के बोंगाईगांव में ट्र‌िब्यूनल ने पुष्प रानी धर नाम की महिला को विदेश घोष‌ित किया था।

जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह और जस्टिस मलाश्री नंदी की खंडपीठ ने अपने फैसले में यह भी कहा कि याचिकाकर्ता पंजीकरण का प्रश्न नहीं उठता, जो कि अन्यथा भारतीय है। वह किसी भी समय विदेशी नहीं रही।

केस शीर्षक - स्मृति पुष्पा रानी धर बनाम यूनियन ऑफ इंड‌िया और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 3 को साझा परिवार में महिलाओं के अधिकार अमान्य करने या उनका उल्लंघन करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता : दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 3 को कानून के तहत मिली अन्य सुरक्षा विशेष रूप से डीवी अधिनियम की धारा 17 के तहत महिलाओं के ''साझा परिवार के अधिकार'' को ओवरराइड करने(उल्लंघन करने) और अमान्य करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति आशा मेनन ने कहा कि बहू को उसके 'साझा घर' से बेदखल करने का निर्देश देने से पहले तथ्यात्मक स्थिति का आकलन कम से कम प्रथम दृष्टया मूल्यांकन पर किया जाना चाहिए।

केस का शीर्षक- स्नेहा आहूजा बनाम सतीश चंदर आहूजा व अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

किसी विशेष परियोजना के लिए नियोजित कर्मचारी परियोजना समाप्त होने के बाद 'स्थायी कर्मचारी' का दावा नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि जब एक कर्मचारी को किसी विशेष परियोजना के लिए नियोजित किया जाता है, तो जब परियोजना समाप्त हो जाती है, उस कर्मचारी की सेवाएं भी समाप्त हो जाती हैं और इसलिए ऐसे कामगार को स्थायी दर्जा नहीं दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने लाल मोहम्मद एंड अन्य बनाम इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड एंड अन्य एआईआर 2007 एससी 2230 मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा करते हुए यह टिप्पणी की। इसमें यह माना गया था कि ऐसे कामगार को कंपनी का कर्मचारी नहीं माना जा सकता है जिसके तहत कई अन्य परियोजनाएं चलती हैं।

केस का शीर्षक - बिपिन बनाम भारत संघ एंड तीन अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत संक्षिप्त कार्यवाही के आधार पर महिला को वैवाहिक घर से नहीं निकाला जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम (Senior Citizens Act) , 2007 के तहत संक्षिप्त कार्यवाही के आधार पर एक पत्नी को उसके वैवाहिक घर से बाहर नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की खंडपीठ ने एक विधवा और उसके बेटे का बचाव करते हुए उस आदेश को रद्द कर दिया है,जिसके तहत इस महिला व उसके बेटे को ससुराल से बेदखल करने का निर्देश दिया गया था।

केस का शीर्षक - श्रीमती खुशबू शुक्ला बनाम जिलाधिकारी, लखनऊ व अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

निजी स्थान पर बिना उपद्रव के शराब पीना अपराध नहीं: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि निजी स्थान पर शराब का सेवन तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि पीने वाले कोई उपद्रव नहीं करते हैं। याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करते हुए जस्टिस सोफी थॉमस ने कहा, "किसी को भी चिढ़ाए या परेशान किए बिना निजी स्थान पर शराब का सेवन करना अपराध नहीं होगा। केवल शराब की गंध का मतलब यह नहीं लगाया जा सकता है कि वह व्यक्ति नशे में था या किसी शराब के प्रभाव में था।"

केस शीर्षक: सलीम कुमार बीएस बनाम केरल राज्य और अन्य।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'आरबीआई के सर्कुलर्स की गलत व्याख्या नहीं कर सकता एसबीआई', मद्रास हाईकोर्ट ने स्टांप विक्रेताओं से कैश हैंडलिंग चार्ज लेने को अवैध माना

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा कि सरकारी खाते में ट्रेजरी चालान के जरिए पैसा जमा करने वाले स्टांप विक्रेताओं से कैश हैंडलिंग चार्ज लेने की प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस संबंध में भारतीय स्टेट बैंक को सख्त निर्देश भी जारी किए।

जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम ने स्पष्ट किया कि 2014 और 2021 में दो आरबीआई मास्टर सर्कूलर, जिन पर भारतीय स्टेट बैंक ने पूरी तरह से भरोसा किया था, वे सरकारी लेनदेन पर कैश हैंडलिंग चार्ज लेने की अनुमति नहीं देते हैं।

केस शीर्षक: पीएस शनमुगा सुंदरम बनाम निदेशक, कोषागार और लेखा विभाग और अन्य, केए विजयकुमार बनाम निदेशक, कोषागार और लेखा, विभाग और अन्य, सी. थिरुमोहन बनाम निदेशक, कोषागार और लेखा विभाग और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

आयुर्वेदिक उपचार का विज्ञापन करने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहींः केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि किसी संस्थान के आयुर्वेदिक उपचार और सुविधाओं का विज्ञापन करने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि वे किसी भी दवा का विज्ञापन नहीं कर रहे हैं। हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को इलाज के बारे में विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए एक कवर आदेश के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन ने राज्य को इस तरह के विज्ञापनों की निगरानी के लिए कुछ अधिकृत अधिकारियों को एक सर्कुलर जारी करने और ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स नियमों या अधिनियम के किसी भी उल्लंघन के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया।

केस का शीर्षक: डॉ. सिद्धार्थ के. बनाम केरल राज्य और अन्य।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story