सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (21 सितंबर, 2026 से 25 सितंबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
सिर्फ़ ट्रेन टिकट न होने से रेलवे मुआवज़े का दावा खारिज नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 सितंबर) को कहा कि दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के पास रेलवे टिकट न होने से ही मुआवज़े का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब पीड़ित की मौत से पहले उसे एक महीने से ज़्यादा समय तक अस्पताल में रहना पड़ा हो, जिससे टिकट के सुरक्षित बचे रहने की संभावना "बहुत कम" हो जाती है।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने मृतक यात्री के माता-पिता की अपील पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। बेंच ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए मुआवज़े को बहाल किया, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।
Case: Sukhabhai Nanjibhai Makwana & Anr v Union of India
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एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर कर्मचारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि इस अंतर के पीछे कोई ठोस और साबित करने लायक कारण न हों।
कोर्ट ने कहा, "यह एक बुनियादी बात है कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर अधिकारी से कम वेतन नहीं दिया जा सकता... अगर किसी जूनियर को सीनियर से ज़्यादा वेतन मिल रहा है तो इसके लिए ठोस कारण होने चाहिए।"
Cause Title: JAI PRAKASH SINGH VERSUS THE STATE OF UTTAR PRADESH & ORS.
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सुप्रीम कोर्ट का कमर्शियल एक्टिविटी के लिए इस्तेमाल हो रही रिहायशी जगहों को सील करने का आदेश
एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे खास तौर पर रिहायशी इस्तेमाल के लिए तय इलाकों में कमर्शियल एक्टिविटी को रोकने को प्राथमिकता दें। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर कोई जगह मंज़ूरशुदा ज़मीन-इस्तेमाल की इजाज़त के खिलाफ कमर्शियल मकसद से इस्तेमाल होती पाई जाती है तो उसे सबसे पहले सील किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जहां कोई इलाका खास तौर पर रिहायशी घोषित किया गया और सिर्फ़ रिहायशी इस्तेमाल की इजाज़त दी गई, वहां पाई जाने वाली किसी भी कमर्शियल एक्टिविटी के मामले में, "सबसे पहले उस जगह को सील किया जाना चाहिए।"
Cause Title: Loganathan v. The State of Tamil Nadu & Ors.
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S.413 BNSS | मजिस्ट्रेट के बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में की जानी चाहिए, न कि हाई कोर्ट में। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "...जब फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया जाता है तो अपील सेशंस कोर्ट में होती है। BNSS की धारा 413 के प्रावधान के अनुसार, बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर अपील भी उसी कोर्ट में होनी चाहिए, जहां ऐसे कोर्ट के दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ आम तौर पर अपील की जाती है। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी कोर्ट में अपील की जानी चाहिए जहां मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह सेशंस कोर्ट है।"
Cause Title: Subhas Chandra Sarkar Versus The State of West Bengal & Ors.
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को 2026 की ICU गाइडलाइंस लागू करने का निर्देश दिया, इंफ्रास्ट्रक्चर और भर्ती के लिए समय-सीमा तय की
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 'इंटेंसिव केयर सर्विसेज़ के ऑर्गनाइज़ेशन और डिलीवरी' के लिए 2026 की गाइडलाइंस लागू करने का निर्देश दिया। इसमें ICU इंफ्रास्ट्रक्चर की खास ज़रूरतों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा नौ महीने और क्रिटिकल-केयर स्टाफ़ की भर्ती के लिए छह महीने का समय तय किया गया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह निर्देश ऐसे मामले में दिए, जिसमें कोर्ट ICU और क्रिटिकल-केयर सर्विसेज़ के लिए एक जैसे स्टैंडर्ड्स न होने की स्थिति पर नज़र रख रहा है।
Cause Title: ASIT BARAN MONDAL & ANR. VERSUS DR. RITA SINHA MBBS MS (OBST. GYNAE) & ORS.
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कर्मचारी को हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी के बराबर पद का है तो आर्टिकल 311 के तहत रोक लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 311(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा तभी लागू होती है, जब हटाने वाला अधिकारी, नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानूनी नियमों के तहत किसी निचले अधिकारी को अनुशासनात्मक शक्तियां सौंपने (डेलिगेशन) से संवैधानिक रोक लागू नहीं होती। बता दें, आर्टिकल 311(1) किसी सिविल सेवक को उस अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाने से रोकता है, जो उसकी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो।
Case: Union of India & Ors v Ramdhani Prasad
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CrPC की धारा 156(3) के तहत आदेश संज्ञान लेने से पहले का कदम, इस स्टेज पर CrPC की धारा 197 के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973 (CrPC, अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(3)) की धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट का FIR दर्ज करने और जांच का आदेश देना संज्ञान लेने से पहले का कदम है। सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए CrPC की धारा 197 (अब BNSS की धारा 218) के तहत पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत सिर्फ़ संज्ञान लेने के स्टेज पर होती है, न कि FIR दर्ज करने या जांच के स्टेज पर।
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चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को चुनौती: जस्टिस दीपांकर दत्ता ने नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ इस बात पर अलग-अलग राय पर पहुंची कि मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। हालांकि, दोनों जजों ने अंततः मामले को Chief Justice of India के समक्ष रखने का निर्देश दिया, ताकि उचित संख्या वाली Constitution Bench का गठन किया जा सके। पीठ ने कहा कि पहले इस रेफरेंस के सवाल पर तीन जजों की पीठ गठित करना मामले की सुनवाई में और देरी करेगा।
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स्टूडेंट की NSA हिरासत रद्द करने और नोएडा DM की आलोचना वाले हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें गौतम बुद्ध नगर जिले (नोएडा) की मजिस्ट्रेट मेधा रूपम को नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में छात्रा आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में रखने के लिए अपनी सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने उस फ़ैसले के अमल पर भी रोक लगाई, जिसमें छात्रा की हिरासत रद्द की गई थी।
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Hindu Succession Act | बिना बंटवारे के भी S14(1) के तहत विधवा का सीमित अधिकार पूर्ण अधिकार बन जाता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू विधवा, जिसे 'हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937' के तहत अपने मृत पति की संपत्ति में अधिकार मिला है, वह 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 14(1) के तहत उस अधिकार की पूर्ण मालिक बन सकती है, भले ही संपत्ति का कोई बंटवारा न हुआ हो।
कोर्ट ने कहा कि भले ही संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो, लेकिन 1956 से पहले पति की मृत्यु पर विरासत में मिली संपत्ति में विधवा का सीमित अधिकार सिर्फ़ इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसने औपचारिक बंटवारे की मांग नहीं की या उसे हासिल नहीं किया।
Cause Title: GANAPATI (DEAD) BY HIS LRS VERSUS PRABHAKAR & OTHERS
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केंद्र सरकार किसी भी अधिकारी को कंपनीज़ एक्ट के तहत धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की वह समीक्षा याचिका खारिज की, जिसमें आर्थिक अपराधों के लिए बनी स्पेशल कोर्ट द्वारा कंपनीज़ एक्ट, 2013 के तहत धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों का संज्ञान निजी शिकायत के आधार पर न लेने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) के डायरेक्टर के अलावा, कंपनीज़ एक्ट की धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत किसी अधिकारी को ऐसी शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है।
Case Title – Union of India v. State of Telangana and Ors.
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गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए हैं तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में देना अनिवार्य है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी।
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गिरफ्तारी का कारण न बताने पर पहली गिरफ्तारी रद्द होने के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया। इसमें आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया साफ़ की गई—खासकर तब, जब संविधान के आर्टिकल 22(1) के तहत गिरफ्तारी का कारण न बताने की वजह से पिछली गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया हो।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने तय किया कि जिस व्यक्ति को आर्टिकल 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया था, उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने अर्ज़ी देनी होगी और मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी लेनी होगी। यह अर्ज़ी तभी दी जा सकती है, जब आरोपी को गिरफ्तारी का कारण लिखित रूप में बता दिया गया हो। साथ ही अर्ज़ी पर उस पुलिस अधिकारी के तुरंत ऊपर के अधिकारी की मंज़ूरी भी होनी चाहिए जिसने पहली गिरफ्तारी की थी।
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कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य नियोक्ता और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध न हो तो कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) को कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि ग्रेच्युटी का भुगतान करने के लिए कौन ज़िम्मेदार है।
Case: M/s Oil and Natural Gas Corporation Ltd v Suryakand D Lad & Ors (with connected appeals)
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Income Tax | CBDT का सर्कुलर कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि CBDT के सर्कुलर कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं होते। कोर्ट ने हाल ही में उन टैक्सपेयर्स की अपीलों को खारिज किया, जिन्होंने अपने एक्सपोर्ट कोटा की बिक्री से मिले प्रीमियम पर सेक्शन 80HHC के तहत डिडक्शन (कटौती) का दावा किया था। धारा 80HHC भारतीय कंपनियों और रेजिडेंट टैक्सपेयर्स को एक्सपोर्ट से होने वाले मुनाफे पर टैक्स डिडक्शन की सुविधा देता था, लेकिन 1 अप्रैल 2005 से यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।
Cause Title: ORIENT CRAFTS LIMITED VERSUS COMMISSIONER OF INCOME TAX, NEW DELHI. (with connected appeals)