S.413 BNSS | मजिस्ट्रेट के बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में होगी: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
25 Sept 2026 1:59 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में की जानी चाहिए, न कि हाई कोर्ट में।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,
"...जब फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया जाता है तो अपील सेशंस कोर्ट में होती है। BNSS की धारा 413 के प्रावधान के अनुसार, बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर अपील भी उसी कोर्ट में होनी चाहिए, जहां ऐसे कोर्ट के दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ आम तौर पर अपील की जाती है। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी कोर्ट में अपील की जानी चाहिए जहां मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह सेशंस कोर्ट है।"
उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता-पीड़ित की बरी करने के खिलाफ अपील पर विचार करने से इनकार कर दिया गया था, लेकिन उन्हें सेशंस कोर्ट में अपील दायर करने की इजाज़त दी गई थी।
याचिकाकर्ता का बेटा डिप्रेशन (अवसाद) से पीड़ित था। उसने अस्पताल में भर्ती होने के बाद आत्महत्या कर ली। याचिकाकर्ता का आरोप है कि डॉक्टर और नर्स की लापरवाही के कारण उसकी मौत हुई। IPC की धारा 304A और धारा 34 के तहत FIR दर्ज की गई।
जुडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने अपील करने का अधिकार नहीं है और सेशंस कोर्ट जाने की छूट दी। इससे असंतुष्ट होकर पीड़ित सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
विवादित निष्कर्षों में दखल देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने BNSS की धाराओं 413, 415(3) और 419 के बीच संबंध की जांच की।
कोर्ट ने कहा कि धारा 419, जो आम तौर पर बरी करने के खिलाफ अपील से संबंधित है, पीड़ित द्वारा दायर अपील पर लागू नहीं होती है, क्योंकि धारा 413 का प्रावधान विशेष रूप से लागू होने वाला उपाय बताता है। धारा 413 का प्रावधान पीड़ित को उस आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार देता है, जिसके तहत आरोपी को बरी कर दिया गया हो; आरोपी को कम गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो; या अपर्याप्त मुआवज़ा तय किया गया हो।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी अपील उस अदालत में की जाती है "जिसमें आम तौर पर उस अदालत के दोषसिद्धि के आदेश के खिलाफ अपील की जाती है।"
BNSS की धारा 415(3) के तहत फर्स्ट या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया गया आरोपी सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है।
इसलिए अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील भी सेशन कोर्ट में ही दायर की जानी चाहिए, चाहे अपराध की प्रकृति कुछ भी हो।
अदालत ने कहा,
"इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी अदालत में अपील की जानी चाहिए, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराए जाने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह अदालत सेशन कोर्ट है।"
इसके अनुसार, SLP खारिज की गई, लेकिन पीड़ित को सेशन कोर्ट में जाने की छूट दी गई।
साथ ही यह भी कहा गया,
"अगर इस आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर अपील दायर की जाती है तो उसे स्वीकार किया जाएगा और मेरिट के आधार पर सुना जाएगा; इसमें उस देरी पर विचार नहीं किया जाएगा, जो याचिकाकर्ता द्वारा नेक नीयत से की गई कार्यवाही के कारण हुई।"
Cause Title: Subhas Chandra Sarkar Versus The State of West Bengal & Ors.

