कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

  • कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य नियोक्ता और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध न हो तो कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) को कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि ग्रेच्युटी का भुगतान करने के लिए कौन ज़िम्मेदार है।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने ONGC की अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। यह सुनवाई इस मुख्य बिंदु पर थी कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी के पास इस विवाद पर विचार करने का अधिकार नहीं था। इस तरह बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और अपीलीय अथॉरिटी का आदेश बहाल किया, जो ONGC के पक्ष में था।

    ONGC की इस आपत्ति के बावजूद कि वह ग्रेच्युटी का भुगतान करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं है और कंट्रोलिंग अथॉरिटी के पास इस सवाल पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, अथॉरिटी ने ONGC को ज़िम्मेदार ठहराया। बाद में अपील पर इस आदेश को पलट दिया गया और फैसला ONGC के पक्ष में आया, लेकिन हाईकोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।

    सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ONGC की ओर से तर्क दिया कि ग्रेच्युटी एक्ट की धारा 4 के तहत, ग्रेच्युटी का भुगतान केवल कर्मचारी को ही किया जाता है। प्रतिवादी ONGC के कर्मचारी नहीं थे। इसलिए पक्षों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का कोई संबंध नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) एक्ट, 1970 (CLRA एक्ट) की धारा 21(4) के तहत मुख्य नियोक्ता की ज़िम्मेदारी केवल वेतन तक सीमित है, ग्रेच्युटी तक नहीं, जो पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ एक्ट, 1936 की धारा 2(vi) के तहत एक अलग घटक है।

    साथ ही ONGC और कॉन्ट्रैक्टर के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट के क्लॉज़ 12.4.1 की ओर भी इशारा किया गया, जिसमें कहा गया कि यह समझौता जॉब कॉन्ट्रैक्ट था। इससे ONGC और कॉन्ट्रैक्टर के कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध नहीं बनता; मेहता ने इसे 'आर्म्स लेंथ कॉन्ट्रैक्ट' (स्वतंत्र पक्षों के बीच अनुबंध) कहा।

    यह भी कहा गया कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल ग्रेच्युटी एक्ट के तहत देय ग्रेच्युटी की राशि से जुड़े विवादों तक ही सीमित है, और ONGC पर दायित्व तय करना या उसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

    सुप्रीम कोर्ट के 'म्युनिसिपल काउंसिल, नंड्याल म्युनिसिपैलिटी, कुरनूल डिस्ट्रिक्ट, एपी बनाम के जयराम और अन्य (2025)' मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि ठेकेदार के माध्यम से किसी संस्थान में भेजे गए व्यक्ति का मुख्य नियोक्ता (Principal Employer) के साथ नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध नहीं हो सकता।

    इसके विपरीत, प्रतिवादी (ठेकेदार) ने कहा कि दायित्व ठेकेदार पर नहीं था, और जो भी राशि देय थी, वह "आखिरकार मुख्य नियोक्ता से ही आनी थी।"

    अन्य प्रतिवादियों (निजी प्रतिवादी जिन्होंने ग्रेच्युटी के भुगतान का दावा किया) की ओर से कोई पेश नहीं हुआ। हालांकि, बेंच ने गौर किया कि उन्होंने जवाबी हलफनामा दायर किया, जिसमें "मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया था कि उन्होंने अपीलकर्ता के लिए लंबे समय तक काम किया। हालांकि, जिस मुद्दे पर ऊपर चर्चा की गई, उस पर सॉलिसिटर जनरल की दलीलों का खंडन करने के लिए कुछ भी नहीं है।"

    उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच सॉलिसिटर जनरल की इस दलील से सहमत हुई कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी के समक्ष कार्यवाही सुनवाई योग्य नहीं थी। इस प्रकार उसने माना कि "दायित्व के संबंध में कंट्रोलिंग अथॉरिटी द्वारा किया गया निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था, क्योंकि कानून के तहत कंट्रोलिंग अथॉरिटी को केवल संबंधित 'कर्मचारी' को देय राशि की गणना करने की शक्ति दी गई थी।"

    अदालत ने माना कि अपीलीय प्राधिकरण ने सही हस्तक्षेप किया और हाईकोर्ट द्वारा फैसले को पलटना उचित नहीं था। उसने पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट, 1936 और CLRA एक्ट के संबंध में सॉलिसिटर जनरल की दलीलों को भी सही पाया।

    यह देखते हुए कि ONGC ने पहले ही श्रमिकों को दावा की गई ग्रेच्युटी का भुगतान कर दिया था, बेंच ने निर्देश दिया कि उनसे कोई वसूली नहीं की जाएगी।

    Case: M/s Oil and Natural Gas Corporation Ltd v Suryakand D Lad & Ors (with connected appeals)

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