केंद्र सरकार किसी भी अधिकारी को कंपनीज़ एक्ट के तहत धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट

  • केंद्र सरकार किसी भी अधिकारी को कंपनीज़ एक्ट के तहत धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की वह समीक्षा याचिका खारिज की, जिसमें आर्थिक अपराधों के लिए बनी स्पेशल कोर्ट द्वारा कंपनीज़ एक्ट, 2013 के तहत धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों का संज्ञान निजी शिकायत के आधार पर न लेने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

    हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) के डायरेक्टर के अलावा, कंपनीज़ एक्ट की धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत किसी अधिकारी को ऐसी शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "चूंकि इस मामले में शिकायतें निजी व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई थीं, इसलिए हमारा मानना ​​है कि संबंधित फैसले पर पुनर्विचार की कोई आवश्यकता नहीं है। तदनुसार, समीक्षा याचिका खारिज की जाती है। हालांकि, भारत सरकार धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करने और SFIO डायरेक्टर के अलावा किसी अधिकारी को लिखित में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत करने के लिए स्वतंत्र होगी।"

    कंपनीज़ एक्ट की धारा 212 SFIO द्वारा किसी कंपनी के कामकाज की जांच से संबंधित है। धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान के तहत स्पेशल कोर्ट धारा 447 के अंतर्गत आने वाले अपराध का संज्ञान केवल SFIO डायरेक्टर या इस उद्देश्य के लिए अधिकृत केंद्र सरकार के किसी अधिकारी की लिखित शिकायत पर ही ले सकती है।

    यह समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के 9 जनवरी के उस फैसले से उत्पन्न हुई थी, जो कंपनीज़ एक्ट की धारा 448 और 451 के तहत अपराधों से संबंधित है।

    धारा 448 गलत बयानों से संबंधित है, जबकि धारा 451 बार-बार की गई चूक के लिए सजा से संबंधित है। कोर्ट ने कहा कि धारा 448 धारा 447 के तहत परिभाषित धोखाधड़ी के लिए सजा का प्रावधान करती है, इसलिए धारा 212(6) के उद्देश्य से यह धारा 447 के अंतर्गत आने वाला अपराध है।

    परिणामस्वरूप, कोर्ट ने माना कि एक स्पेशल कोर्ट केवल निजी शिकायत के आधार पर ऐसे अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकती। इसने हैदराबाद स्थित एक रियल एस्टेट कंपनी के पूर्व निदेशकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी कंपनी के कामकाज में धोखाधड़ी का आरोप लगाता है तो उसके पास उपाय मौजूद है; वह ज़रूरी योग्यताएं पूरी करने पर कंपनीज़ एक्ट की धारा 213 के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में जा सकता है।

    भारत सरकार ने इस फ़ैसले की समीक्षा (रिव्यू) की मांग की।

    सुनवाई के दौरान, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि प्राइवेट प्रतिवादियों (Respondents) की बात भी सुनी जानी चाहिए, क्योंकि प्राइवेट शिकायत के कारण ही उन पर मुक़दमा चलाया गया।

    जस्टिस चंद्रन ने पूछा कि प्रतिवादियों की बात क्यों सुनी जानी चाहिए, जबकि सरकार प्राइवेट शिकायतों के मुद्दे पर फ़ैसले की समीक्षा नहीं मांग रही थी, बल्कि रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ (ROC) को शिकायतें दर्ज करने की अनुमति मांग रही थी।

    जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि सरकार ROC विभाग के किसी सरकारी अधिकारी को शिकायतें दर्ज करने के लिए अधिकृत (Authorize) करते हुए एक नोटिफ़िकेशन जारी कर सकती है।

    ASG ने तर्क दिया कि धारा 212 SFIO द्वारा की जाने वाली जांच से संबंधित है, लेकिन ऐसी जांच भी होती हैं, जो SFIO द्वारा नहीं की जाती हैं।

    हालांकि, CJI कांत ने धारा 212(6) के दूसरे प्रावधान (Proviso) का ज़िक्र किया और बताया कि केंद्र सरकार किसी अधिकारी को शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत कर सकती है।

    जस्टिस बागची ने कहा कि जहां तक ​​ROC का सवाल है, एक अधिकार-पत्र (Authorization) से यह मुद्दा हल हो जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि प्राइवेट पार्टियां इस पहलू पर फ़ैसले से नाराज़ नहीं थीं और सवाल उठाया कि उनके ख़िलाफ़ समीक्षा क्यों की जानी चाहिए।

    उन्होंने आगे कहा कि एक बार जब कानूनी शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है और ROC को ज़रूरी अधिकार दे दिया जाता है, तो नोटिफ़ाइड अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज करने से गैर-SFIO जांच भी इसके दायरे में आ जाएंगी।

    आखिरकार, कोर्ट ने समीक्षा याचिका खारिज की, लेकिन सरकार को SFIO के डायरेक्टर के अलावा किसी भी अधिकारी को शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत करने की अनुमति दी।

    Case Title – Union of India v. State of Telangana and Ors.

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