सुप्रीम कोर्ट में सितंबर, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। सितंबर महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
राज्य की सलाह के बिना भी RBI मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के बोर्ड को छह महीने से ज़्यादा समय के लिए भी हटा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को कहा कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंकों पर लागू होता है। कोर्ट ने माना कि मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स को हटाने की रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) की शक्ति संविधान के आर्टिकल 243ZL(1) में बताई गई छह महीने की समय-सीमा से आगे भी जा सकती है।
Cause Title: SANDEEP S. GHANDAT & ORS. VERSUS RESERVE BANK OF INDIA & ORS.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
NALSAR के खिलाफ़ BCI चेयरमैन का निर्देश कानूनन गलत था, बार काउंसिल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिल के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है। बार काउंसिल को लॉ स्टूडेंट्स पर अनुशासनात्मक नियंत्रण तभी मिलता है जब वे वकील के तौर पर एनरोल हो जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्टूडेंट्स पर अनुशासनात्मक शक्ति केवल उनके मूल संस्थान, या ऐसे संस्थान को नियंत्रित करने वाले नियमों या उप-नियमों के तहत निर्धारित प्राधिकरण के पास होती है।
Case: MIHIRA SOOD Vs THE BAR COUNCIL OF INDIA | W.P.(C) No. 1040/2026
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम के तहत रिविज़न पर लिमिटेशन एक्ट लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम में दी गई समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) को खत्म करने के लिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें कर्नाटक सरकार के भूमि रिकॉर्ड प्राधिकरण ने अपनी रिविज़न शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बेंगलुरु के येदियुर झील इलाके में भूमि सर्वेक्षण नंबरों की नई जांच का आदेश दिया। यह आदेश कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 ("अधिनियम") के तहत तय तीन साल की समय-सीमा के बाद दिया गया।
Cause Title: M.R.R. Setty (Dead), by LRs Versus Government of Karnataka and others
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी देशभर की FIRs सुप्रीम कोर्ट ने की रद्द, नई FIR पर भी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के संबंध में देशभर के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज FIRs को आगे न बढ़ाने और उनकी जांच न करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इन मामलों को सभी उद्देश्यों के लिए बंद माना है।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
अगर POCSO Act के तहत उम्र साबित न हो पाए तो भी IPC की धारा 376 के तहत रेप का दोषी ठहराया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 सितंबर) को कहा कि अगर अभियोजन पक्ष (Prosecution) पीड़ित की उम्र साबित नहीं कर पाता है - जो POCSO Act के तहत दोषी ठहराने के लिए ज़रूरी है - तो भी आरोपी IPC की धारा 376 के तहत रेप के आरोप से अपने-आप बरी नहीं हो जाता।
कोर्ट ने कहा कि धारा 376 के तहत औपचारिक आरोप न होने पर भी आरोपी को उस प्रावधान के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि यह POCSO Act की धारा 3 जैसा ही अपराध है और दोनों में 'एक्टस रियस' (आपराधिक कृत्य) एक ही है।
Cause Title: PYNCHEMALANGAKI BAREH VERSUS STATE OF MEGHALAYA
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
NH Act के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए 2015 से पहले के अवॉर्ड्स पर ब्याज की गणना 1894 के एक्ट के अनुसार होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (08.09.2026) को कहा कि जब नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (NH Act) के तहत सक्षम अधिकारी 01.01.2015 से पहले मुआवज़ा तय करते हैं तो ज़मीन मालिक को दिए जाने वाले सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज की गणना 'ज़मीन अधिग्रहण एक्ट, 1894' के तहत की जानी चाहिए, न कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार एक्ट, 2013' के तहत। बता दें, 01.01.2015 वह तारीख है, जब NH Act के तहत किए गए अधिग्रहण के लिए 2013 का एक्ट लागू किया गया।
Case: Manav Bhanot v National Highway Authority of India
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बिना किसी अधिकारी का नाम लिए भी कंपनियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को कहा कि किसी कंपनी पर ऐसे अपराध के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसके लिए 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) ज़रूरी है, भले ही उस कर्मचारी या अधिकारी की पहचान न हुई हो या उसे आरोपी न बनाया गया हो जिसके ज़रिए कथित अपराध किया गया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि किसी असली व्यक्ति (Natural Person) की पहचान न होने या उसे आरोपी न बनाने के आधार पर ही सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) की धारा 482 के तहत शुरुआती चरण में ही किसी कॉर्पोरेशन के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।
Cause Title: SANOFI INDIA LTD. VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
आर्टिकल 220 के तहत पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने पर कोई रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि संविधान का आर्टिकल 220, जो भारत में अदालतों और अधिकारियों के सामने प्रैक्टिस करने से पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों और जजों को रोकता है, उन्हें संबंधित राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने से नहीं रोकता।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह स्पष्टीकरण तब दिया, जब वह राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्यों को शामिल करने के बारे में कोर्ट के पहले के निर्देशों में बदलाव की मांग करने वाली अलग-अलग अर्जियों पर सुनवाई कर रहे थे।
Case Details: SWATI SINHA & ORS. v UNION OF INDIA & ORS in YOGAMAYA M.G. Vs UNION OF INDIA|MISCELLANEOUS APPLICATION NO. OF 2026 [DIARY NO(S).51143/2026]
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर कर्मचारी को जूनियर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि इस अंतर के पीछे कोई ठोस और साबित करने लायक कारण न हों।
कोर्ट ने कहा, "यह एक बुनियादी बात है कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर अधिकारी को जूनियर अधिकारी से कम वेतन नहीं दिया जा सकता... अगर किसी जूनियर को सीनियर से ज़्यादा वेतन मिल रहा है तो इसके लिए ठोस कारण होने चाहिए।"
Cause Title: JAI PRAKASH SINGH VERSUS THE STATE OF UTTAR PRADESH & ORS.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
S.413 BNSS | मजिस्ट्रेट के बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में की जानी चाहिए, न कि हाई कोर्ट में। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "...जब फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया जाता है तो अपील सेशंस कोर्ट में होती है। BNSS की धारा 413 के प्रावधान के अनुसार, बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर अपील भी उसी कोर्ट में होनी चाहिए, जहां ऐसे कोर्ट के दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ आम तौर पर अपील की जाती है। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी कोर्ट में अपील की जानी चाहिए जहां मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह सेशंस कोर्ट है।"
Cause Title: Subhas Chandra Sarkar Versus The State of West Bengal & Ors.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
कर्मचारी को हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी के बराबर पद का है तो आर्टिकल 311 के तहत रोक लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 311(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा तभी लागू होती है, जब हटाने वाला अधिकारी, नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानूनी नियमों के तहत किसी निचले अधिकारी को अनुशासनात्मक शक्तियां सौंपने (डेलिगेशन) से संवैधानिक रोक लागू नहीं होती। बता दें, आर्टिकल 311(1) किसी सिविल सेवक को उस अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाने से रोकता है, जो उसकी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो।
Case: Union of India & Ors v Ramdhani Prasad
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
Hindu Succession Act | बिना बंटवारे के भी S14(1) के तहत विधवा का सीमित अधिकार पूर्ण अधिकार बन जाता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू विधवा, जिसे 'हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937' के तहत अपने मृत पति की संपत्ति में अधिकार मिला है, वह 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 14(1) के तहत उस अधिकार की पूर्ण मालिक बन सकती है, भले ही संपत्ति का कोई बंटवारा न हुआ हो।
कोर्ट ने कहा कि भले ही संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो, लेकिन 1956 से पहले पति की मृत्यु पर विरासत में मिली संपत्ति में विधवा का सीमित अधिकार सिर्फ़ इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसने औपचारिक बंटवारे की मांग नहीं की या उसे हासिल नहीं किया।
Cause Title: GANAPATI (DEAD) BY HIS LRS VERSUS PRABHAKAR & OTHERS
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए हैं तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में देना अनिवार्य है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य नियोक्ता और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध न हो तो कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए मुख्य नियोक्ता को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) को कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए रखे गए कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि कंट्रोलिंग अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि ग्रेच्युटी का भुगतान करने के लिए कौन ज़िम्मेदार है।
Case: M/s Oil and Natural Gas Corporation Ltd v Suryakand D Lad & Ors (with connected appeals)
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
S. 138 NI Act | चेक बाउंस होने पर ड्रॉअर के पते पर भेजा गया नोटिस, परिवार के सदस्य को मिलने पर भी वैध माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ़ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता कि वह ड्रॉअर के परिवार के किसी सदस्य को मिला था, जबकि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का वह फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ड्रॉअर की सज़ा को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि कानूनी डिमांड नोटिस उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उसकी माँ को मिला था, जो ड्रॉअर द्वारा दिए गए पते पर रहती हैं।
Case Title : SAINABA VERSUS STATE OF KERALA & ANR.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह पटाखों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाएगा और न ही उनके बेरोकटोक इस्तेमाल की इजाज़त देगा। कोर्ट ने धार्मिक भावनाओं और बच्चों, बुज़ुर्गों व बीमार लोगों पर वायु प्रदूषण के बुरे असर के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा, "हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं। न तो हम पूरी तरह रोक लगाने की आपकी बात मानेंगे और न ही हम उन्हें 24 घंटे पटाखे फोड़ने की इजाज़त देंगे। इसके दो कारण हैं। पहला, पूरी तरह रोक लगाने से लोगों की भावनाओं पर असर पड़ सकता है। दूसरा, पूरे दिन पटाखे फोड़ने की इजाज़त देने से बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों समेत सभी जीवित प्राणियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। हमें कोई ऐसा समाधान निकालना होगा, जिसमें हम पटाखे फोड़ने का एक तय समय बता सकें और यह भी तय कर सकें कि किस तरह के पटाखे इस्तेमाल किए जा सकते हैं।"
Case Title : Arjun Gopal v. Union of India
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: मेरठ में गिराये जाएं 16,726 अवैध निर्माण
सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ अधिकारियों को ज़ोन A में पहचाने गए 16,726 अवैध निर्माणों को गिराने के लिए तुरंत कदम उठाने और शहर के बाकी हिस्सों में बचे अवैध निर्माणों को भी गिराने का आदेश दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने निर्देश दिया कि पहचाने गए अवैध निर्माणों में रहने वालों से पहले जगह खाली करने को कहा जाए और उसके बाद उन निर्माणों को सील करके गिरा दिया जाए।
Cause Title: LOKESH KUMAR KHURANA VS. RAJENDRA KUMAR BARJATYA, CONMT.PET.(C) No. 877/2025 in C.A. No. 14604/2024, BIMALENDU PRADHAN v. STATE OF ODISHA and connected cases.