कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम के तहत रिविज़न पर लिमिटेशन एक्ट लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

3 Sept 2026 10:48 AM IST

  • कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम के तहत रिविज़न पर लिमिटेशन एक्ट लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम में दी गई समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) को खत्म करने के लिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें कर्नाटक सरकार के भूमि रिकॉर्ड प्राधिकरण ने अपनी रिविज़न शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बेंगलुरु के येदियुर झील इलाके में भूमि सर्वेक्षण नंबरों की नई जांच का आदेश दिया। यह आदेश कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 ("अधिनियम") के तहत तय तीन साल की समय-सीमा के बाद दिया गया।

    राज्य सरकार ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि अधिनियम के तहत दायर अपीलों पर लिमिटेशन एक्ट का 'देरी को माफ़ करने' (Delay Condonation) वाला प्रावधान लागू होता है। इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सवाल अधिनियम के तहत अपील दायर करने का नहीं, बल्कि अधिनियम के तहत रिविज़न शक्तियों का इस्तेमाल करने का है। अधिनियम की धारा 56(3) का प्रावधान (Proviso) प्राधिकरण द्वारा रिविज़न अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए केवल तीन साल की समय-सीमा तय करता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमें यह समझ नहीं आ रहा है कि यह प्रावधान [लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के अनुसार देरी को माफ़ करने के लिए] सरकार के मामले में कैसे मदद करता है। मौजूदा स्थिति में इसका कोई इस्तेमाल नहीं है, क्योंकि हम 1964 के [लिमिटेशन] एक्ट के तहत अपीलों से नहीं, बल्कि उसकी धारा 56 के तहत रिविज़न शक्ति के इस्तेमाल से निपट रहे हैं... एक बार जब धारा 56(3) के प्रावधान में साफ तौर पर यह कहा गया कि धारा 56(1) के तहत रिविज़न की शक्ति का इस्तेमाल किसी ऐसे आदेश के संबंध में किया जा सकता है, जिसके खिलाफ कोई अपील नहीं की गई, और वह भी आदेश की तारीख से तीन साल के भीतर, तो लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों को ऊपर बताए गए प्रावधान में तय समय-सीमा को खत्म करने या विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।"

    मृत अपीलकर्ता (जिसका प्रतिनिधित्व उसके कानूनी उत्तराधिकारी कर रहे थे) ने बेंगलुरु में 28 गुंटा ज़मीन पर मालिकाना हक का दावा किया, जिसे 1929 में आठ बिक्री विलेखों (sale deeds) के माध्यम से खरीदा गया। 1974 के सिटी टाइटल सर्वे के दौरान, ज़मीन को अलग-अलग CTS नंबर दिए गए। कई दशकों बाद अपीलकर्ता ने BBMP से डेवलपमेंट की मंज़ूरी ली और एक रिहायशी अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स बनाया, जिसके लिए 2006 में ऑक्यूपेंसी सर्टिफ़िकेट जारी किया गया।

    2014 में CTS नंबर दिए जाने के लगभग 40 साल बाद जॉइंट डायरेक्टर/रजिस्ट्रार ऑफ़ लैंड रिकॉर्ड्स ने कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 56 के तहत एक नोटिस जारी किया। इसमें येदियुर झील पर कब्ज़े की शिकायत के बाद CTS एंट्रीज़ की नई जांच का प्रस्ताव दिया गया।

    अपीलकर्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट में इस नोटिस को चुनौती दी। एक सिंगल जज ने नोटिस रद्द करते हुए कहा कि धारा 56 के तहत रिविज़नल पावर (पुनरीक्षण की शक्ति) का इस्तेमाल कानून में तय तीन साल की समय-सीमा के बाद नहीं किया जा सकता।

    डिविज़न बेंच ने जनवरी 2020 में सिंगल जज का फ़ैसला पलट दिया और अधिकारियों को नई जांच करने की मंज़ूरी दी। इसके बाद जून 2023 में अपीलकर्ता की रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) खारिज कर दी गई, जिसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट गए। कार्यवाही के दौरान, दिसंबर 2024 में अपीलकर्ता की मौत हो गई और उनके कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लाया गया।

    अपील मंज़ूरी देते हुए जस्टिस संजय कुमार के फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट की डिविज़न बेंच ने सिंगल बेंच के उस फ़ैसले को पलटकर गलती की, जिसमें सर्वे नंबरों की दोबारा जांच के नोटिस रद्द कर दिया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "ऐसे आदेश के संबंध में, जिसके खिलाफ़ अपील नहीं की गई, तीन साल की समय-सीमा के बाद ऐसी रिविज़नल पावर के इस्तेमाल पर स्पष्ट रोक है। इसलिए जॉइंट डायरेक्टर/रजिस्ट्रार ऑफ़ लैंड रिकॉर्ड्स द्वारा ऐसी पावर का इस्तेमाल कानून के किसी आधार के बिना किया गया। चूंकि यह प्रक्रिया शुरू से ही गलत थी, इसलिए डिविज़न बेंच का यह कहना सही नहीं था कि चूंकि अभी तक कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया गया, इसलिए संबंधित जज को दखल नहीं देना चाहिए। तय समय-सीमा के बहुत बाद पावर का इस्तेमाल करके एम.आर.आर. सेट्टी या उनके उत्तराधिकारियों को ऐसी जांच में शामिल होने के लिए कहना सही नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए संबंधित जज का नोटिस में दखल देना और रिट याचिकाओं को मंज़ूरी देना पूरी तरह सही था। डिविज़न बेंच ने इसके विपरीत राय देकर गलती की और दूसरी बेंच ने रिव्यू पिटीशन को खारिज करके उस गलती को और बढ़ा दिया।"

    नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई और उस नोटिस को रद्द कर दिया गया, जहां तक वह अपीलकर्ताओं की ज़मीन से संबंधित है।

    Cause Title: M.R.R. Setty (Dead), by LRs Versus Government of Karnataka and others

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