सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

9 May 2026 10:00 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (04 मई, 2026 से 08 मई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर, केवल उसके नाममात्र के मालिक (Ostensible Owner) द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की वसीयत संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' केतहत मौजूद कानूनी रोक को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को यह भी फैसला दिया कि किसी व्यावसायिक अनुबंध के तहत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए पैसों से खरीदी गई संपत्तियां, 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' (अधिनियम) के तहत छूट पाने के लिए 'विश्वसनीय कर्तव्य' (Fiduciary Duty) की श्रेणी में नहीं आतीं। इस वजह से, ऐसी संपत्तियां केंद्र सरकार द्वारा जब्त किए जाने के योग्य हो जाती हैं।

    Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

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    रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता', 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को फैसला सुनाया कि रेलवे, बिजली अधिनियम, 2003 के अर्थ के तहत एक 'उपभोक्ता' है। इस फैसले के साथ ही रेलवे का वह दावा खारिज हो गया, जिसमें वह 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा मांग रहा था, ताकि वह वितरण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान करने से बच सके।

    कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे एक बंद और आत्मनिर्भर बिजली नेटवर्क चलाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी अपनी आंतरिक परिचालन ज़रूरतों को पूरा करना है—जिसमें ट्रैक्शन, सिग्नलिंग और स्टेशन की सुविधाएं शामिल हैं। इसलिए इसे "वितरण लाइसेंसी" नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह अपने नेटवर्क के बाहर के बाहरी उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति नहीं करता है।

    Cause Title: INDIAN RAILWAYS VERSUS WEST BENGAL STATE ELECTRICITY DISTRIBUTION COMPANY LIMITED & ORS. (with connected matter)

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    उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट

    बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 मई) को यह टिप्पणी की कि बिजली उपभोक्ताओं पर उस पावर प्लांट के डेप्रिसिएशन की लागत चुकाने का बोझ नहीं डाला जा सकता, जिससे उन्हें अब बिजली की सप्लाई नहीं मिल रही है; भले ही उस एसेट (संपत्ति) की तकनीकी उपयोगिता अवधि अभी बाकी हो।

    जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने टिप्पणी की, "...यह स्वीकार्य है कि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई नहीं की गई। उपभोक्ताओं से ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जो उन्हें अब मिल ही नहीं रही है..."

    Cause Title: DELHI ELECTRICITY REGULATORY COMMISSION VERSUS TATA POWER DELHI DISTRIBUTION LIMITED

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    पैरा-टीचर्स का रेगुलराइज़ेशन का दावा राज्य द्वारा तय किए गए शैक्षिक मानकों के अधीन: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए टीचर सिर्फ़ अपनी लंबी सेवा के आधार पर किसी न्यायिक आदेश के ज़रिए रेगुलराइज़ेशन का दावा अपने अधिकार के तौर पर नहीं कर सकते; क्योंकि इससे वैधानिक नियमों के बाहर सार्वजनिक भर्ती का एक समानांतर तरीका बन जाता है।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस SVN भट्टी की बेंच ने कहा कि जहां एक तरफ़ एड-हॉक टीचर का सरकारी टीचर बनने की "इच्छा" रखना उचित है, वहीं दूसरी तरफ़ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों की "उपयुक्तता" का आकलन करना भी राज्य का कर्तव्य है।

    Cause Title: SUNIL KUMAR YADAV AND OTHERS VERSUS THE STATE OF JHARKHAND AND OTHERS (With connected matters)

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    'राजस्व रिकॉर्ड से मालिकाना हक साबित नहीं होता': सुप्रीम कोर्ट ने भूमि स्वामित्व पर कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को कहा कि राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Entries) केवल कब्जे का प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन वैध स्वामित्व दस्तावेजों के अभाव में उन्हें जमीन के मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि केवल जमाबंदी, पहानी या अन्य राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर भूमि पर मालिकाना दावा नहीं किया जा सकता, जब तक कि प्राथमिक शीर्षक दस्तावेज (Title Documents) पेश न किए जाएं।

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    सुप्रीम कोर्ट ने ज़िला कलेक्टरों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 लागू करने का अधिकार दिया, जारी किए दिशा-निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वैधानिक शक्तियाँ सौंपकर, पूरे देश के ज़िला कलेक्टरों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 लागू करने का अधिकार दिया।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को निर्देश दिया कि वह पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 23 के तहत एक अधिसूचना जारी करे, जिसमें धारा 5 के तहत शक्तियाँ एक वर्ष की अवधि के लिए ज़िला कलेक्टरों को सौंपी जाएं।

    Cause Title: BHOPAL MUNICIPAL CORPORATION VERSUS DR SUBHASH C. PANDEY & ORS.

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    मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा, "सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।"

    Cause Title: KISHAN CHAND (DEAD) THROUGH LRS. VERSUS GAUTAM GAUR HITKARAK SABHA, KOTA & ORS.

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    राजस्थान APO परीक्षा 2024: आवेदन के समय लॉ डिग्री न होने पर उम्मीदवार अयोग्य—सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान असिस्टेंट प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर (APO) परीक्षा 2024 के उन उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया, जिनके पास आवेदन जमा करने की तिथि पर आवश्यक विधि (लॉ) डिग्री नहीं थी।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने Rajasthan Public Service Commission (राजस्थान लोक सेवा आयोग) की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अभ्यर्थियों को प्रारंभिक परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई थी।

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    'तटस्थ रहने वालों' को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को कहा कि 'तटस्थ रहने वालों' (fence-sitters)—यानी ऐसे लोग जो किसी मुकदमे को बिना दखल दिए किनारे से देखते रहते हैं—को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़े विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, "यह एक स्थापित कानून है कि तटस्थ रहने वालों को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़ा कोई विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोई भी पक्ष राहत को अपने अधिकार के तौर पर नहीं मांग सकता। साथ ही राहत देने से इनकार करने का एक जाना-माना आधार यह है कि कोर्ट आने वाला व्यक्ति देरी और लापरवाही (laches) का दोषी है। सार्वजनिक कानून के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाला कोई भी कोर्ट पुराने दावों को उठाने को बढ़ावा नहीं देता, खासकर वरिष्ठता और प्रमोशन के मामलों में, जहां इस बीच तीसरे पक्षों के अधिकार पक्के हो चुके होते हैं।"

    Cause Title: T. GNANAVEL VERSUS R. SASIPRIYA AND OTHERS

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    एसिड हमले के पीड़ितों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए कहा कि जबरन एसिड पिलाए गए लोग और वे पीड़ित जिनके शरीर पर बाहरी विकृति नहीं दिखती लेकिन आंतरिक चोटें हैं, उन्हें भी 'एसिड अटैक पीड़ित' माना जाएगा। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह व्याख्या वर्ष 2016 से प्रभावी मानी जाएगी।

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    उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मेडिकल लापरवाही के लिए डॉक्टर के कानूनी वारिस भी जवाबदेह: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को फैसला सुनाया कि किसी डॉक्टर की मृत्यु होने पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही में उसके कानूनी वारिसों को उसकी जगह शामिल किया जा सकता है। हालांकि, डॉक्टर की कथित लापरवाही से होने वाले नुकसान के लिए मुआवजे की उनकी जवाबदेही, मृतक से विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित होगी।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने कहा, "पिछली चर्चा और 1986 के अधिनियम के साथ-साथ 2019 के अधिनियम में दिए गए कानूनी ढांचे को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कथित तौर पर मेडिकल लापरवाही करने वाले डॉक्टर की मृत्यु होने पर उसके कानूनी वारिसों को कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता है और रिकॉर्ड में शामिल किया जा सकता है।"

    Cause Title: Kumud Lall VERSUS Suresh Chandra Roy (Dead) Through LRs and Others (with connected matter)

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