'तटस्थ रहने वालों' को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

5 May 2026 12:34 PM IST

  • तटस्थ रहने वालों को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को कहा कि 'तटस्थ रहने वालों' (fence-sitters)—यानी ऐसे लोग जो किसी मुकदमे को बिना दखल दिए किनारे से देखते रहते हैं—को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़े विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,

    "यह एक स्थापित कानून है कि तटस्थ रहने वालों को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़ा कोई विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोई भी पक्ष राहत को अपने अधिकार के तौर पर नहीं मांग सकता। साथ ही राहत देने से इनकार करने का एक जाना-माना आधार यह है कि कोर्ट आने वाला व्यक्ति देरी और लापरवाही (laches) का दोषी है। सार्वजनिक कानून के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाला कोई भी कोर्ट पुराने दावों को उठाने को बढ़ावा नहीं देता, खासकर वरिष्ठता और प्रमोशन के मामलों में, जहां इस बीच तीसरे पक्षों के अधिकार पक्के हो चुके होते हैं।"

    मुख्य विवाद अपीलकर्ता से जुड़ा था, जिसे 2005 में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोट किया गया। इस प्रमोशन को प्रतिवादी नंबर 1 ने 2005 में चुनौती दी थी। यह मामला लगभग दो दशकों तक हाईकोर्ट में चलता रहा, जिस दौरान अपीलकर्ता और प्रतिवादी नंबर 1 दोनों को बाद में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (2007) और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (2016) के पदों पर प्रमोशन मिले।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के चरण में ही दो व्यक्तियों ने—जो हाईकोर्ट में इस मामले के पक्षकार नहीं थे—इस मुकदमे में शामिल होने (Impleadment) की मांग की। उन्होंने दावा किया कि वे अपीलकर्ता से वरिष्ठ हैं और उन्हें दिए गए प्रमोशन के हकदार हैं।

    उनकी इस मांग को खारिज करते हुए जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि वे और कुछ नहीं, बल्कि केवल 'तटस्थ रहने वाले' थे; वे मुकदमे की कार्यवाही को किनारे से देख रहे थे और विवाद के नतीजे का इंतज़ार कर रहे थे ताकि उसके आधार पर वे इस मुकदमे में शामिल होकर प्रमोशन के लाभों पर अपना दावा ठोक सकें।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “जहां तक शामिल होने के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति का सवाल है... वह हाई कोर्ट के सामने किसी भी कार्यवाही में पक्षकार नहीं था, न ही उसने अपीलकर्ता और प्रतिवादी नंबर 1 के बीच चल रहे विवाद में दखल देने या खुद को शामिल करवाने की कोशिश की। उसने खुद को शामिल करवाने की गुज़ारिश सिर्फ़ इसी कोर्ट के सामने की... ऐसा दावा किसी भी लागू होने लायक कानूनी अधिकार को ज़ाहिर नहीं करता और यह दिखाता है कि वह मौजूदा कार्यवाही से पूरी तरह से बाहर का व्यक्ति है... अगर ऐसा होता तो वह किनारे पर नहीं बैठा रहता और खुद को शामिल करवाने की गुज़ारिश सिर्फ़ आखिरी चरण में नहीं करता।”

    यह मामला तमिलनाडु राज्य द्वारा 18 जनवरी, 2005 को जारी G.O. (D) No. 19 को चुनौती देने से जुड़ा था। इस आदेश के तहत टी. ज्ञानवेल को 14 अप्रैल, 1997 से असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर काल्पनिक पदोन्नति दी गई। साथ ही 26 अक्टूबर, 1998 से वित्तीय लाभ भी दिए गए। इस आदेश में उन्हें उन टाउन प्लानिंग इंस्पेक्टर्स से ऊपर रखा गया, जिन्हें विभागों के विलय के बाद नया पदनाम दिया गया।

    आर. शशिप्रिया, जो एक टाउन प्लानिंग इंस्पेक्टर थीं और विभागों के विलय के बाद जिन्हें जूनियर इंजीनियर के तौर पर नया पदनाम दिया गया, उन्होंने इस सरकारी आदेश को चुनौती दी। उन्होंने मुख्य रूप से वरिष्ठता क्रम पर आपत्ति जताई और पदोन्नति में 3:1 के अनुपात को लागू करने की मांग की।

    हालांकि, हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 2012 में उनकी रिट याचिका खारिज की थी, लेकिन 2024 में खंडपीठ ने उनकी अपील स्वीकार की, सरकारी आदेश रद्द किया और पदोन्नति प्रक्रिया की जाँच के निर्देश दिए। इस फ़ैसले को राज्य सरकार और ज्ञानवेल दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

    अपीलों को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक लंबे समय से स्थापित स्थिति में दखल देकर गलती की।

    कोर्ट ने कहा कि इतने विलंबित चरण पर—सरकारी आदेश जारी होने के लगभग दो दशक बाद—दखल देने से सेवा से जुड़ी स्थापित स्थितियां अस्थिर हो जाएंगी और प्रशासनिक अनिश्चितता पैदा होगी।

    Cause Title: T. GNANAVEL VERSUS R. SASIPRIYA AND OTHERS

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