एसिड हमले के पीड़ितों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Praveen Mishra

4 May 2026 11:00 PM IST

  • एसिड हमले के पीड़ितों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए कहा कि जबरन एसिड पिलाए गए लोग और वे पीड़ित जिनके शरीर पर बाहरी विकृति नहीं दिखती लेकिन आंतरिक चोटें हैं, उन्हें भी 'एसिड अटैक पीड़ित' माना जाएगा।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह व्याख्या वर्ष 2016 से प्रभावी मानी जाएगी।

    कानून में कमी को किया दूर

    अदालत ने कहा कि Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 (दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016) में 'एसिड अटैक पीड़ित' की परिभाषा केवल उन लोगों तक सीमित थी जिनके शरीर पर एसिड फेंकने से बाहरी विकृति हुई हो। इस वजह से ऐसे पीड़ित, जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया या जिनके केवल आंतरिक अंग प्रभावित हुए, वे इस कानून के लाभ से वंचित रह जाते थे।

    इस कमी को दूर करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक कानून में औपचारिक संशोधन नहीं किया जाता, तब तक 'एसिड अटैक पीड़ित' की परिभाषा में ऐसे सभी पीड़ित शामिल माने जाएंगे।

    सरकार को संशोधन का निर्देश

    अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह अधिनियम की अनुसूची में उचित संशोधन करे और इस विस्तारित परिभाषा को औपचारिक रूप से अधिसूचित करे।

    सख्त सजा और जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एसिड हमलों के मामलों में कड़ी सजा की आवश्यकता पर जोर दिया और सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में सबूत का बोझ आरोपी पर डाला जाना चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए आरोपियों की संपत्ति—यहां तक कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदारी—को भी जब्त किया जा सकता है।

    एसिड की बिक्री पर चिंता

    सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने देश में एसिड की आसान उपलब्धता का मुद्दा उठाया, जिस पर कोर्ट ने चिंता जताई। चीफ़ जस्टिस ने कहा कि अवैध रूप से एसिड बेचने वालों को भी उपयुक्त मामलों में जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

    याचिका और पक्षकार

    यह आदेश एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक की याचिका पर पारित किया गया। मामले में सिद्धार्थ लूथरा भी उपस्थित थे।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि संबंधित मंत्रालय पहले ही संशोधन का प्रस्ताव तैयार कर चुका है।

    निष्कर्ष

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब उन पीड़ितों को भी कानूनी संरक्षण और लाभ मिल सकेगा, जो अब तक कानून की सीमित परिभाषा के कारण बाहर रह गए थे।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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