सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

12 April 2026 9:00 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (06 अप्रैल, 2026 से 10 अप्रैल, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    स्वतंत्र सहकारी समितियां अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' नहीं हैं; उनकी चुनाव प्रक्रिया रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    राजस्थान में जिला दुग्ध संघों की प्रबंधन समिति के चुनाव से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि जिला दुग्ध संघ स्वतंत्र सहकारी समितियां हैं, जो हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं हैं।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राजस्थान हाईकोर्ट ने जिला दुग्ध संघों द्वारा बनाए गए उप-नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करके गलती की, क्योंकि जिला दुग्ध संघों को संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ के भीतर "राज्य के उपकरण" के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

    Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

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    वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर दोहराया कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन है, जैसे कि योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतों के मामले में।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने राजस्थान में ज़िला दुग्ध संघों से जुड़े एक चुनावी विवाद पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

    Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

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    मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV के तहत वर्जित होगा: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 अप्रैल) को यह स्पष्ट किया कि मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV (रचनात्मक रेस ज्यूडिकाटा) के तहत वर्जित होगा, यदि वादी ने स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर पहले के मुकदमे में, जहां मालिकाना हक विवादित था, मालिकाना हक की घोषणा की मांग करना छोड़ दिया था।

    कोर्ट ने यह माना कि चूंकि मालिकाना हक का दावा प्राथमिक मुकदमे में उठाया जा सकता था और उठाया जाना भी चाहिए था, इसलिए संबंधित पक्ष को नए मुकदमे में उस मुद्दे पर दोबारा मुकदमा चलाने से रोक दिया गया।

    Cause Title: CHANNAPPA (D) THR. LRS. VS. PARVATEWWA (D) THR. LRS.

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    अंतरिम आदेश से प्रभावित कोई बाहरी व्यक्ति रिट कार्यवाही में पक्षकार बनने का हकदार: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कार्यवाही में शामिल न होने वाले किसी बाहरी व्यक्ति को, जो मूल रिट कार्यवाही का पक्षकार नहीं है, पक्षकार बनने से मना नहीं किया जा सकता, यदि उस कार्यवाही में पारित आदेश का उस बाहरी व्यक्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता हो।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने टिप्पणी की, "रिट कार्यवाही में जहां कोर्ट से पहले से पारित किसी अंतरिम आदेश के दायरे और प्रभाव की व्याख्या करने के लिए कहा जाता है, वहां किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उस आदेश से सीधे और स्पष्ट रूप से प्रभावित होता दिख रहा हो, केवल इस आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति मूल चुनौती का प्रारंभिक पक्षकार नहीं था।"

    Cause Title: M/S CHOPRA HOTELS PRIVATE LIMITED VERSUS HARBINDER SINGH SEKHON & ORS.

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    'सर्विस छोड़ना स्वैच्छिक रिटायरमेंट नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने SBI क्लर्क को पेंशन के फ़ायदे देने से मना किया

    सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि कोई कर्मचारी जो रिटायरमेंट से कुछ समय पहले ही सेवा छोड़ देता है, वह इसे स्वैच्छिक रिटायरमेंट बताकर पेंशन के फ़ायदे नहीं मांग सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने टिप्पणी की, "...हमने पाया कि यह मामला स्वैच्छिक रिटायरमेंट का नहीं है, बल्कि सेवाओं को अपनी मर्ज़ी से छोड़ने का है, जिसमें 24.01.1998 से 11.12.1998 तक, अपीलकर्ता ने बिना किसी को बताए और बिना छुट्टी लिए, लंबे समय तक अनुपस्थित रहना शुरू कर दिया था..."

    Cause Title: K.G. SESHADRI VERSUS THE TRUSTEES OF STATE BANK OF INDIA AND ANOTHER

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    सुप्रीम कोर्ट का आदेश- मेरठ में गिराए जाएं 859 प्रॉपर्टीज़ में बने अवैध सेटबैक, कंपाउंडिंग पर भी लगाई रोक

    उत्तर प्रदेश के मेरठ में बिना इजाज़त और बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माणों पर अपनी सख़्ती जारी रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 अप्रैल) को 859 प्रॉपर्टीज़ में सभी बिना इजाज़त वाले सेटबैक को दो महीने के अंदर गिराने का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को भी फटकार लगाई कि उन्होंने स्कूलों, अस्पतालों और यहाँ तक कि सरकारी बैंकों को भी ऐसी इमारतों से चलाने की इजाज़त कैसे दी, जो "पूरी तरह से अवैध और बिना इजाज़त" हैं।

    Cause Title: LOKESH KUMAR KHURANA VS. RAJENDRA KUMAR BARJATYA, CONMT.PET.(C) No. 877/2025 in C.A. No. 14604/2024, BIMALENDU PRADHAN v. STATE OF ODISHA and connected cases.

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    Motor Accident Claim | केस पार्टी बनाई गई बीमा कंपनी सभी आधार उठा सकती है और मुआवज़े की रकम को चुनौती दे सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बीमा कंपनी की उस अपील को मंज़ूरी दी, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को मोटर दुर्घटना मुआवज़े की रकम के बारे में अपनी दलीलें रखने से रोक दिया था।

    कोर्ट ने कहा कि जब किसी मोटर दुर्घटना मुआवज़े के केस में बीमा कंपनी को एक पार्टी-प्रतिवादी (Respondent) के तौर पर शामिल किया जाता है तो उसे सभी उपलब्ध आधारों पर दावे को चुनौती देने का अधिकार होता है। यानी, उसे सिर्फ़ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 149(2) में बताए गए आधारों (जैसे, पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन, ज़रूरी तथ्यों को छिपाना, वगैरह) तक ही सीमित रहने की कोई पाबंदी नहीं है।

    Case Title: NATIONAL INSURANCE COMPANY LTD. v. GAURI GURUDAS GAONKAR, SLP (C) No. 11439 of 2023

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    कई अपराधों के लिए जब जेल की सज़ाएं एक साथ चलती हैं तो जुर्माना भी एक साथ ही चलता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (8 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जहां अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई सज़ाओं को एक साथ (Concurrently) चलाने का निर्देश दिया गया हो, वहां हर अपराध के लिए अलग से जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि दो अपराधों की सज़ा के हिस्से के तौर पर अलग से लगाया गया जुर्माना भी, जेल की सज़ाओं के साथ-साथ ही माना जाएगा।

    Cause Title: HEM RAJ VERSUS THE STATE OF HIMACHAL PRADESH

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    S. 27 Evidence Act | अपराध से जोड़ने वाले सबूत के बिना हथियार की बरामदगी बेमानी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 27 के तहत आरोपी के खुलासे वाले बयानों के आधार पर की गई सबूतों की बरामदगी में कई विसंगतियां थीं, गवाह मुकर गए और फोरेंसिक रूप से कोई जुड़ाव साबित नहीं हो पाया।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की कि किसी अपराध को अंजाम देने से जुड़े सबूतों की केवल बरामदगी, जो कि आरोपी के खुलासे वाले बयानों पर आधारित हो, सज़ा देने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। ऐसा तभी हो सकता है, जब बरामदगी की प्रक्रिया कानूनी रूप से विश्वसनीय हो और वह धारा 27 के तहत निर्धारित मानकों को पूरा करती हो।

    Cause Title: GAUTAM SATNAMI VERSUS STATE OF CHHATTISGARH

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    अपील खारिज होने पर डिक्री के क्रियान्वयन के लिए नई लिमिटेशन अवधि शुरू होगी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अपील को गैर-हाजिरी (default) के कारण खारिज किया जाता है, तो उससे एक नया लिमिटेशन पीरियड शुरू होता है, और ऐसे में 12 साल के भीतर दायर की गई एग्जीक्यूशन पिटीशन (डिक्री के क्रियान्वयन की अर्जी) मान्य होगी।

    जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि यह तर्क सही नहीं है कि एग्जीक्यूशन पिटीशन की 12 साल की अवधि केवल डिक्री पास होने की तारीख से ही गिनी जाए, खासकर तब जब उस डिक्री के खिलाफ अपील लंबित रही हो।

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    अनारक्षित श्रेणी में PwD के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित पद SC/ST/OBC दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए भी खुले हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जब किसी अनारक्षित सीट पर क्षैतिज आरक्षण लागू होता है तो उस अनारक्षित सीट के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अधिकार उन सभी उम्मीदवारों को होता है जिनके पास वह क्षैतिज विशेषता (Horizontal Attribute) मौजूद है, चाहे वे SC, ST, OBC या सामान्य श्रेणी के हों।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड में जूनियर सिविल इंजीनियर के एक पद को यूआर (PWD-LV) के तहत अधिसूचित किया गया। यह एक अनारक्षित पद है, जिसे दिव्यांग व्यक्तियों (कम दृष्टि/दृष्टिहीनता) के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित किया गया। प्रतिवादी नंबर 3 OBC-A (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) श्रेणी से संबंधित है, जिसमें PWD-LV की विशेषताएं मौजूद हैं। उसे कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा इस पद के लिए चयनित होने से वंचित कर दिया गया, जबकि उसने UR (PWD-LV) श्रेणी के उम्मीदवार की तुलना में अधिक अंक प्राप्त किए।

    Cause Title: THE WEST BENGAL STATE ELECTRICITY TRANSMISSION CO.LTD & ORS. VERSUS DIPENDU BISWAS & ORS.

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    NI Act की धारा 138 की शर्तें पूरी होने पर चेक बाउंस की शिकायत को ट्रायल से पहले के स्टेज पर रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब Negotiable Instruments Act, 1881 (NI Act) की धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी हो जाती हैं तो चेक बाउंस के मामले को ट्रायल से पहले के स्टेज पर इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी नहीं किया गया।

    कोर्ट ने कहा कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी किया गया या नहीं, यह ट्रायल का मामला है, और इसे ट्रायल से पहले के स्टेज पर तय नहीं किया जा सकता।

    Cause Title: RENUKA VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA & ANR.

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    दरगाह के सज्जादानशीन और वक्फ के मुतवल्ली एक जैसे नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि दरगाह के सज्जादानशीन का पद वक्फ के मुतवल्ली के पद से मूल रूप से अलग है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सज्जादानशीन का पद मुख्य रूप से एक आध्यात्मिक पद है, जबकि मुतवल्ली का पद एक धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक भूमिका है।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक की दरगाह के सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़े एक विवाद पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की।

    Case Title: SYED MOHAMMED GHOUSE PASHA KHADRI versus SYED MOHAMMED ADIL PASHA KHADRI & ORS. ETC., CIVIL APPEAL NOS. 13345 - 13346 OF 2015

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    गलत तरीके से सार्वजनिक काम देने का एक भी मामला अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को एक शुरुआती जांच करने का आदेश दिया। यह जांच अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पर लगे पक्षपात के आरोपों और उनके रिश्तेदारों व करीबी सहयोगियों को काम के ठेके देने में खुली और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया से बार-बार हटने के तरीकों से जुड़े आरोपों पर आधारित है।

    कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक ठेके देने के फैसले संविधान के अनुच्छेद 14 के दायरे में आते हैं। राज्य से यह उम्मीद की जाती है कि वह जनहित को सुरक्षित रखने के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और मनमानी से मुक्त तरीके से काम करे। ऐसा करने का सबसे सुरक्षित तरीका निविदाओं (टेंडरों) के ज़रिए प्रतिस्पर्धा को आमंत्रित करना है। जिन मामलों में हितों के टकराव या संबंधित पक्ष को लाभ पहुंचाने का आरोप हो, वहां राज्य यह तर्क नहीं दे सकता कि दिए गए काम का कुल प्रतिशत संख्या के लिहाज़ से बहुत कम है।

    Case Title: Save Mon Region Federation And Anr v. The State Of Arunachal Pradesh And Ors., W.P.(C) No. 54/2024

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    किसी को 'बास्टर्ड' कहना IPC की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को कहा कि सिर्फ़ गाली-गलौज या अश्लील भाषा का इस्तेमाल करना, जिसमें कोई यौन या कामुक तत्व न हो, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं माना जाएगा।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने IPC की धारा 294(b) के तहत दो आरोपियों की सज़ा रद्द की। इन आरोपियों पर आरोप था कि उन्होंने पारिवारिक संपत्ति विवाद को लेकर हुई तीखी बहस के दौरान "बास्टर्ड" (हरामखोर) शब्द का इस्तेमाल किया था।

    Cause Title: SIVAKUMAR VERSUS STATE REP. BY THE INSPECTOR OF POLICE (with connected case)

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