S. 27 Evidence Act | अपराध से जोड़ने वाले सबूत के बिना हथियार की बरामदगी बेमानी: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

8 April 2026 5:46 PM IST

  • S. 27 Evidence Act | अपराध से जोड़ने वाले सबूत के बिना हथियार की बरामदगी बेमानी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 27 के तहत आरोपी के खुलासे वाले बयानों के आधार पर की गई सबूतों की बरामदगी में कई विसंगतियां थीं, गवाह मुकर गए और फोरेंसिक रूप से कोई जुड़ाव साबित नहीं हो पाया।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की कि किसी अपराध को अंजाम देने से जुड़े सबूतों की केवल बरामदगी, जो कि आरोपी के खुलासे वाले बयानों पर आधारित हो, सज़ा देने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। ऐसा तभी हो सकता है, जब बरामदगी की प्रक्रिया कानूनी रूप से विश्वसनीय हो और वह धारा 27 के तहत निर्धारित मानकों को पूरा करती हो।

    यह मामला एक कथित हत्या से जुड़ा था, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया थऔर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी उसकी सज़ा बरकरार रखी।

    अभियोजन पक्ष का पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था; अपराध का कोई भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं था। इस मामले का एक अहम हिस्सा धारा 27 के तहत कथित तौर पर बरामद की गई वे आपत्तिकारक वस्तुएं थीं—यानी, खून से सनी एक कुल्हाड़ी और कपड़े, जो अपीलकर्ता के घर से उसके खुलासे वाले बयानों के आधार पर बरामद किए गए; और एक ड्राइविंग लाइसेंस, जो कथित तौर पर अपराध स्थल से बरामद हुआ।

    खास बात यह है कि एक सह-आरोपी को तो निचली अदालत ने ही बरी कर दिया, जबकि उसके खिलाफ भी इसी तरह के बरामदगी वाले सबूत मौजूद थे।

    अपनी सज़ा के खिलाफ अपील करते हुए अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई विसंगतियां थीं और गवाहों के बयान भी विरोधाभासी थे।

    अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में यह माना गया कि अभियोजन पक्ष कुल्हाड़ी पर मिले खून और मृतक के बीच कोई भी विश्वसनीय जुड़ाव स्थापित करने में विफल रहा। कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि इस बात को साबित करने के लिए कोई भी निर्णायक सबूत मौजूद नहीं था कि कुल्हाड़ी पर मिले बाल मृतक के ही थे।

    कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,

    "(i) न तो मृतक के खून का ग्रुप (Blood Group) निर्धारित किया गया, और न ही हथियारों या कपड़ों पर लगे खून का; (ii) हालांकि यह पाया गया था कि कुल्हाड़ियों पर मिले बालों की रूपात्मक (Morphological) और सूक्ष्मदर्शीय (Microscopical) विशेषताएं अपराध स्थल से बरामद बालों से मिलती-जुलती थीं, लेकिन इस बारे में कोई भी निर्णायक राय नहीं दी गई कि वे बाल मृतक के ही थे; और (iii) बरामद की गई कुल्हाड़ियों और मृतक की चोटों के बीच कोई भी निश्चित जुड़ाव स्थापित नहीं हो पाया था।"

    इसके अलावा, कोर्ट ने 'ज़ब्ती मेमो' (Seizure Memos) तैयार करने की प्रक्रिया में भी गंभीर खामियां पाईं, क्योंकि गवाहों के हस्ताक्षर बरामदगी के स्थान और समय पर नहीं लिए गए। इसके बजाय, उन्हें बाद में लिया गया, तब भी जब गवाह कहीं और यात्रा कर रहा था।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “यह स्पष्ट है कि गवाह या तो मुकर गए हैं या उन्होंने बरामदगी से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण विवरण पर अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि नहीं की, सिवाय इसके कि उन्होंने अपने हस्ताक्षरों को स्वीकार किया। यह देखते हुए कि दोनों आरोपी पूरे मुकदमे के दौरान लगातार न्यायिक हिरासत में रहे, उक्त विरोध और पुष्टि न होने का कारण उनकी ओर से किसी भी प्रभाव या छेड़छाड़ को नहीं माना जा सकता। इसलिए बरामदगी की परिस्थितियाँ कानूनी रूप से कमज़ोर बनी हुई है।”

    उपरोक्त के आलोक में अदालत ने दोषसिद्धि को गलत पाया, क्योंकि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

    Cause Title: GAUTAM SATNAMI VERSUS STATE OF CHHATTISGARH

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