अंतरिम आदेश से प्रभावित कोई बाहरी व्यक्ति रिट कार्यवाही में पक्षकार बनने का हकदार: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
9 April 2026 8:05 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कार्यवाही में शामिल न होने वाले किसी बाहरी व्यक्ति को, जो मूल रिट कार्यवाही का पक्षकार नहीं है, पक्षकार बनने से मना नहीं किया जा सकता, यदि उस कार्यवाही में पारित आदेश का उस बाहरी व्यक्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता हो।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने टिप्पणी की,
"रिट कार्यवाही में जहां कोर्ट से पहले से पारित किसी अंतरिम आदेश के दायरे और प्रभाव की व्याख्या करने के लिए कहा जाता है, वहां किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उस आदेश से सीधे और स्पष्ट रूप से प्रभावित होता दिख रहा हो, केवल इस आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति मूल चुनौती का प्रारंभिक पक्षकार नहीं था।"
यह मामला तब सामने आया, जब अपीलकर्ता, जो पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश से सीधे तौर पर प्रभावित था, जिसमें 'पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स, 2025' के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी गई, उसके संशोधित बिल्डिंग प्लान को नगर निगम अधिकारियों द्वारा खारिज कर दिया गया।
संशोधित बिल्डिंग प्लान खारिज होने के कारण—भले ही वे 'पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स, 2025' के पूरी तरह अनुरूप थे—अपीलकर्ता को ध्वस्तीकरण (तोड़ने का) आदेश थमा दिया गया। यह आदेश बिल्डिंग रूल्स के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाए जाने के बाद जारी किया गया।
हाईकोर्ट के समक्ष लंबित रिट कार्यवाही में पक्षकार बनने के अपीलकर्ता के बार-बार किए गए अनुरोध को हाईकोर्ट द्वारा ठुकराए जाने से व्यथित होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस नाथ द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को रिट कार्यवाही में पक्षकार न बनने देकर गलती की। ऐसा करने से हाई कोर्ट अपने ही अंतरिम आदेश के परिणामों से अधिक पूर्ण और निष्पक्ष तरीके से निपट पाता। कोर्ट ने कहा कि जब अपीलकर्ता अंतरिम आदेश के प्रभाव को प्रदर्शित करने में सफल रहा तो हाईकोर्ट का यह दायित्व बनता था कि वह उसे पक्षकार बनने की अनुमति दे।
न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“जब अपीलकर्ता ने यह दिखाया कि उक्त रिट याचिका में पारित अंतरिम आदेश का उपयोग उसके नुकसान के लिए किया जा रहा था और अधिकारियों द्वारा उसकी संपत्ति के साथ किए जा रहे व्यवहार पर इसका काफी असर पड़ रहा था, तो अपीलकर्ता को इस विवाद से अजनबी नहीं माना जा सकता। कम-से-कम अपीलकर्ता एक 'उचित पक्ष' (Proper Party) था, जिसकी उपस्थिति से हाईकोर्ट अपने ही अंतरिम आदेश के परिणामों से अधिक पूर्ण और निष्पक्ष तरीके से निपट पाता।”
कोर्ट ने यह भी बताया कि अपीलकर्ता उचित पक्ष था “जिसकी उपस्थिति से हाईकोर्ट अपने ही अंतरिम आदेश के परिणामों से अधिक पूर्ण और निष्पक्ष तरीके से निपट पाता।”
तदनुसार, न्यायालय ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट के समक्ष लंबित रिट कार्यवाही में अपीलकर्ता को भी एक पक्ष के रूप में शामिल किया जाए।
न्यायालय ने निर्णय दिया,
“इसलिए हमारा यह मत है कि सही संतुलन इसी में है कि इन कार्यवाहियों के आपसी जुड़ाव को तो मान्यता दी जाए, लेकिन उन्हें आपस में मिलाकर एक न कर दिया जाए। अपीलकर्ता को CWP नंबर 38742/2025 में भाग लेने से वंचित नहीं किया जा सकता, जबकि उसमें पारित आदेश के परिणामस्वरूप उसके लिए पहले ही स्पष्ट रूप से कुछ 'सिविल परिणाम' (Civil Consequences) उत्पन्न हो चुके हैं।”
Cause Title: M/S CHOPRA HOTELS PRIVATE LIMITED VERSUS HARBINDER SINGH SEKHON & ORS.

