जानिए हमारा कानून
क्रिमिनल कोर्ट की इर्रेगुलर प्रोसिडिंग क्या है?
क्रिमिनल कोर्ट में इर्रेगुलर प्रोसिडिंग जैसी व्यवस्था है। यह प्रावधान BNSS में किये गए हैं। साधारण अर्थों में ऐसी कार्यवाही जिसे करने के लिए कोई दंड न्यायालय सशक्त नहीं है उसके बाद भी उन कार्यवाहियों को कर देता है।यह अनियमित कार्यवाहियां कब शून्य होती हैं तथा कब इन अनियमित कार्यवाहियों को अनदेखा किया जा सकता है अर्थात वह कौन सी परिस्थितियां है जिनमें कोई अनियमित कार्यवाही होने के बाद भी दंड प्रक्रिया अवैध नहीं होती है तथा वह कौन सी परिस्थितियां हैं जिनमें अनियमित कार्यवाही के परिणामस्वरूप न्याय...
क्रिमिनल केस में जमानत कितनी तरह की होती हैं?
क्रिमिनल केस में अदालत आरोपी पर ट्रायल चलती है ऐसे ट्रायल के बीच आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है क्योंकि किसी भी क्रिमिनल केस में ट्रायल लंबे समय तक चलता है और किसी आरोपी को इतने समय तक जेल में रखा जाना ठीक नहीं माना जाता है। जब भी किसी अभियुक्त को जेल में रखा जाता है तब उस पर अन्वेषण, जांच और विचारण या अपील की कार्यवाही लंबित रहती है ऐसी स्थिति में यह तय नहीं होता है कि किसी प्रकरण में यदि किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाया है तो वह अभियुक्त दोषमुक्त होगा या दोषसिद्ध होगा। यदि अभियुक्त किसी...
क्या निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की फीस का नियमन होना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने Indian School, Jodhpur & Anr. बनाम State of Rajasthan & Ors. (2021) के मामले में राजस्थान स्कूल (फीस का नियमन) अधिनियम, 2016 की संवैधानिकता पर विचार किया। इस कानून का उद्देश्य निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों द्वारा ली जाने वाली फीस को नियंत्रित करना था।इस मामले का मुख्य सवाल था कि क्या यह नियमन (Regulation) संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार (Fundamental Right) का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने यह विचार किया कि राज्य (State) निजी शैक्षणिक...
शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति या मृत्यु: BNSS, 2023 का सेक्शन 279
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) के सेक्शन 279 में यह प्रावधान किया गया है कि समन मामले (Summons-Case) में अगर शिकायतकर्ता (Complainant) अदालत में उपस्थित नहीं होता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में न्यायिक प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा।यह प्रावधान न्याय प्रक्रिया में देरी रोकने के लिए बनाया गया है और इसे समन मामले के पहले के प्रावधानों (274-278) से जोड़ा गया है। शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में आरोपी की बरी (Acquittal in Absence of...
विरोधाभास के सिद्धांत की संवैधानिक प्रासंगिकता
भारतीय संविधान संघीय ढांचे (Federal Structure) पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि, समवर्ती सूची (Concurrent List) के तहत कानून बनाने की स्वतंत्रता के बावजूद, यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव (Conflict) न हो।विरोधाभास के सिद्धांत (Doctrine of Repugnancy) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक साथ लागू होने वाले कानूनों में समरसता (Harmony) बनी रहे। यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 254 में निहित है, जो यह निर्धारित करता है कि यदि...
डकैती की तैयारी, हत्या और अपराधियों का गिरोह: धारा 310 भारतीय न्याय संहिता, 2023 भाग 2
धारा 310, भाग 2 - भारतीय न्याय संहिता, 2023भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 310 डकैती (Dacoity) के मुख्य प्रावधानों को विस्तार देती है। पहले भाग में यह बताया गया था कि डकैती कब होती है और इसके लिए दंड का प्रावधान क्या है। इस भाग में डकैती से जुड़े अन्य अपराधों जैसे हत्या (Murder), तैयारी (Preparation), डकैती के लिए एकत्र होना (Assembly), और आदतन अपराधी (Habitual Offender) होने के लिए सजा का उल्लेख है। डकैती के दौरान हत्या (Murder During Dacoity)धारा 310(3) के अनुसार, अगर पांच या अधिक...
आरोपी के पास जमानतदार नहीं होने पर कब रिहा किया जाता है?
किसी आरोपी को जेल से जमानत पर रिहा होने के लिए जमानतदार देना होता है। ऐसा जमानतदार आरोपी की जमानत लेता है और यह वचन देता है कि वह आरोपी को अदालत के सामने पेश करेगा। जमानत नियम है तथा जेल अपवाद है। किसी भी व्यक्ति को जब किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है तो कोर्ट का प्रयास होता है कि उस व्यक्ति को विचाराधीन (Under trial) रहने तक जमानत पर छोड़ा जाए।कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों का जन्म होता है की अभियुक्त के पास कोई जमानतदार नहीं होता है। कोई जमानतदार नहीं होता है तथा अभियुक्त अकेला पड़ जाता है।...
ट्रायल के पहले और ट्रायल के बाद जेल के पीरियड को कैसे एडजस्ट किया जाता है?
क्रिमिनल केस में किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को उसके दोषसिद्ध होते होते संज्ञेय अपराध के मामले में लंबे समय तक कारावास में रहना होता है। न्यायालय द्वारा अभियुक्त को जमानत पर छोड़ दिए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। विचारण की समाप्ति के पश्चात अभियुक्त को दंडादेश दिया जाता है। अपील के निपटारे तक भी अभियुक्त को जमानत पर छोड़ा जाता है तथा उसके दंड का निलंबन अपील के निपटारे तक किया जाता है।BNSS की धारा 468 ऐसी व्यवस्था का उल्लेख करती है जिसके अंतर्गत कोई अभियुक्त जांच ,अन्वेषण और विचारण तथा अपील के...
क्या अदालतें धारा 138 NI Act के मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित कर सकती हैं?
धारा 138 एन.आई. एक्टधारा 138 एन.आई. एक्ट, 1881, उन मामलों से संबंधित है जहां चेक dishonour (अस्वीकृत) हो जाता है, चाहे वह धन की कमी हो या अन्य कारणों से। यह प्रावधान व्यापारिक लेन-देन की विश्वसनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से बनाया गया है और इसमें सजा का प्रावधान है, जिसमें दो साल तक की कैद या चेक की राशि का दोगुना जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, वर्षों से इन मामलों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि अदालतें इनके शीघ्र निपटारे में असमर्थ हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने suo motu (स्वतः संज्ञान)...
समन मामलों में आरोपी को बरी करने या दोषी ठहराने और सजा की प्रक्रिया : सेक्शन 278, BNSS 2023
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) के सेक्शन 278 में समन मामलों (Summons-Cases) के अंतिम चरण की प्रक्रिया को समझाया गया है।इस प्रावधान में आरोपी को दोषी (Guilty) या निर्दोष (Not Guilty) ठहराने और उसके आधार पर उसे बरी (Acquittal) करने या सजा देने का निर्देश दिया गया है। यह प्रावधान पिछले सेक्शन 274 से 277 पर आधारित है और समन मामलों में न्याय प्रक्रिया को तेज और निष्पक्ष (Fair) बनाने का उद्देश्य रखता है। आरोपी को बरी करने की प्रक्रिया (Acquittal of the...
डकैती की परिभाषा और दंड : धारा 310, भारतीय न्याय संहिता, 2023
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 310 (Section 310) डकैती (Dacoity) को संगठित और गंभीर अपराध के रूप में परिभाषित करती है। यह अपराध तब होता है जब पांच या अधिक लोग मिलकर चोरी (Theft) या जबरन वसूली (Extortion) को अंजाम देने का प्रयास करते हैं। यह अपराध न केवल अपराध में शामिल मुख्य लोगों बल्कि सहायता करने वाले सभी व्यक्तियों को भी दोषी मानता है।डकैती (Dacoity) क्या है?धारा 310(1) के अनुसार, जब पांच या अधिक लोग मिलकर चोरी या जबरन वसूली करते हैं या इसका प्रयास करते हैं, तो इसे डकैती माना जाता है।...
क्या न्यायिक नियुक्तियों के लिए समय-सीमा न्यायपालिका की दक्षता सुनिश्चित कर सकती है?
न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया का परिचयभारत में हाईकोर्ट (High Courts) और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में न्यायाधीशों की नियुक्ति एक संवैधानिक प्रक्रिया (Constitutional Process) है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को सुनिश्चित करना है। यह प्रक्रिया कई चरणों में होती है, जिसमें हाई कोर्ट कोलेजियम (High Court Collegium) की सिफारिश, सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की स्वीकृति, और अंततः कार्यपालिका (Executive) द्वारा नियुक्ति शामिल है। हालांकि, इस प्रक्रिया में देरी के कारण बड़ी संख्या...
किसी भी सजा का एक्जीक्यूशन कैसे करवाया जाता है?
भारतीय न्याय संहिता में मौत की सज़ा, जेल की सज़ा, जुर्माना और सामुदायिक सेवा जैसी सज़ा के प्रावधान हैं। यह भारत में किए गए किसी भी अपराध के संबंध में दी जा रही है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी भी व्यक्ति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता देता है तथा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से ही किसी व्यक्ति से प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को छीना जा सकता है।जब कोई व्यक्ति भारत की सीमा में अपराध करता है तो उस अपराध के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 या फिर कोई विशेष निहित की गयी प्रक्रिया विधि...
क्रिमिनल केस में कब सुनी जाती है रिवीजन?
रिवीजन एक तरह से अपर कोर्ट को प्राप्त अपील की तरह ही एक शक्ति है। BNSS की धारा 438 के अंतर्गत हाई कोर्ट और सेशन कोर्ट को रिवीजन की शक्तियां दी गयी हैं। इस शक्ति के अधीन हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट अपने अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा की गयी कार्यवाही के अभिलेखों को मंगवा सकता है तथा उसका परीक्षण कर सकता है। इस तरह के अभिलेखों को मंगवाने के बाद अधीनस्थ न्यायालय के आदेश के निष्पादन को निलंबित भी रख सकता है। रिवीजन की शक्ति हाई कोर्ट तथा सेशन कोर्ट दोनों को प्राप्त है लेकिन दोनों में से किसी एक को रिवीजन के...
धारा 309 भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत रॉबरी की व्याख्या और उदाहरण
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 309 (Section 309) में रॉबरी (Robbery) को एक गंभीर अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है।यह चोरी (Theft) या जबरन वसूली (Extortion) को हिंसा (Violence), डर (Fear), या शारीरिक चोट (Physical Harm) के साथ जोड़ती है। इस धारा में रॉबरी को समझाने के लिए कई उदाहरण दिए गए हैं, जो बताते हैं कि चोरी या जबरन वसूली किन स्थितियों में रॉबरी बन जाती है। रॉबरी के उदाहरण (Illustrations of Robbery)(a) चोरी और अनुचित प्रतिबंध का मेल (Theft Combined with Wrongful Restraint) उदाहरण...
अभिव्यक्ति की आज़ादी और सार्वजनिक व्यवस्था: प्रासंगिक कानूनी प्रावधान
इस फ़ैसले में अभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Speech) और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के बीच संतुलन की आवश्यकता को समझाया गया है। यह मामला भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 153A, 505(1)(c), और 500 के तहत दर्ज आरोपों और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों का विश्लेषण करता है।कोर्ट ने न केवल विधायी प्रावधानों (Legislative Provisions) की व्याख्या की, बल्कि कुछ महत्वपूर्ण फैसलों (Landmark Judgments) के जरिए स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे और नफरत भरे...
समन मामलों में दोष स्वीकार करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सेक्शन 276 और 277
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) में समन मामलों (Summons Cases) के लिए सरल और प्रभावी प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई हैं। सेक्शन 276 और 277 में यह बताया गया है कि अगर कोई आरोपी अदालत में उपस्थित हुए बिना दोषी (Guilty) मानने की इच्छा जताए या अगर मुकदमा पूरी तरह से सुना जाए, तो न्याय प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है।यह प्रावधान पहले के सेक्शन 274 और 275 पर आधारित हैं और न्याय को तेज और सुलभ (Accessible) बनाने का प्रयास करते हैं। अदालत में उपस्थित हुए बिना दोष...
क्या भारत में शरणार्थियों के अधिकार और राज्य की संप्रभुता के बीच संतुलन संभव है?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में शरणार्थियों (Refugees) के अधिकार और राज्य की संप्रभुता (State Sovereignty) के बीच संबंध को समझाया गया है।खासतौर पर, रोहिंग्या शरणार्थियों की भारत से निर्वासन (Deportation) की स्थिति को लेकर संवैधानिक प्रावधानों (Constitutional Provisions), अंतरराष्ट्रीय समझौतों (International Agreements), और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं (National Security Concerns) का विश्लेषण किया गया है। कोर्ट ने यह भी तय किया कि गैर-नागरिकों (Non-Citizens) को भारतीय नागरिकों के समान संरक्षण मिलना...
किसी फैसले को पलटने की अपील और कोर्ट की शक्ति
अपील कोर्ट के पास यह पॉवर होती है कि वह ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट सकती है। परिवादी, अभियोजन पक्ष और अभियुक्त यह तीनों ही अपील कर सकते हैं। परिवाद द्वारा संस्थित मामलों में परिवादी को भी अपील करने का अधिकार उपलब्ध होता है।ऐसी परिस्थिति में BNSS के अंतर्गत अपीलीय कोर्ट की शक्तियों का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। BNSS की धारा 427 अपील कोर्ट की शक्तियों के संदर्भ में विस्तार पूर्वक प्रावधान करती है। अपील कोर्ट को अपनी यह शक्तियां तीन प्रकार से प्राप्त होती है-दोषसिद्धि के आदेश से की गयी अपील की...
सजा होने पर अपील कब होती है?
क्रिमिनल ट्रॉयल के बाद आए फैसले पर अपील कोर्ट में जाने की व्यवस्था होती है। अपील का मतलब है ट्रॉयल कोर्ट से असंतुष्ट होने पर उससे ऊपर की अदालत में अपना पक्ष रखना। अपील का अधिकार कोई मूल अधिकार या नैसर्गिक अधिकार नहीं है अपितु यह अधिकार एक सांविधिक अधिकार है। यह ऐसा अधिकार जो किसी कानून के अंतर्गत पक्षकारों को उपलब्ध कराया जाता है। यदि किसी विधि में अपील संबंधी किसी प्रावधान का उल्लेख नहीं किया गया है तो ऐसी परिस्थिति में अपील का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। किसी भी पक्षकार को अपील का अधिकार...


















