जानिए हमारा कानून
अनुच्छेद 12 और रिट क्षेत्राधिकार पर प्रमुख न्यायिक फैसले : रिट क्षेत्राधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायालयीन निर्णय
1. अनुच्छेद 12 और इसकी परिभाषा का परिचय (Introduction to Article 12 and Its Definition) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 "राज्य" (State) की परिभाषा देता है, जिसमें भारत सरकार और संसद, हर राज्य की सरकार और विधानमंडल, और भारत सरकार के नियंत्रण में आने वाले सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण शामिल हैं।यह परिभाषा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यह तय करती है कि नागरिक किन संस्थाओं के खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए और अनुच्छेद 226 के तहत व्यापक रिट क्षेत्राधिकार के लिए न्यायालय में जा...
BNSS, 2023 के अंतर्गत सेशन कोर्ट में सुनवाई: धारा 252 से 255 के अनुसार आरोप, गवाही और बरी करना भाग 3
इस लेख में सेशन कोर्ट (Court of Session) में सुनवाई की प्रक्रिया के अगले चरणों पर चर्चा की गई है। पिछले दो लेखों में हमने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 - BNSS) के अंतर्गत कोर्ट में सुनवाई के प्रारंभिक चरणों पर बात की थी।पहले भाग में अभियोजन पक्ष (Public Prosecutor) की भूमिका और मामले की शुरुआत के बारे में बताया गया। दूसरे भाग में, यह समझाया गया कि किस प्रकार जज आरोप तय करते हैं, जो अपराध की प्रकृति पर निर्भर करता है। इन पिछले लेखों का पूरा विवरण...
क्या उच्च शिक्षा संस्थान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत न्यायिक पुनर्विचार के दायरे में आते हैं?
Dr. Janet Jeyapaul बनाम SRM University और अन्य के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने इस अहम संवैधानिक सवाल पर विचार किया कि क्या University Grants Commission (UGC) Act के अंतर्गत "deemed university" का दर्जा प्राप्त SRM University पर High Court का writ अधिकार (jurisdiction) लागू हो सकता है।इस मामले का मुख्य सवाल यह था कि क्या SRM University, जो एक deemed university है, Article 226 के तहत न्यायालय के writ के अधीन हो सकती है। इस फैसले का महत्व इस बात में है कि किस स्थिति में सार्वजनिक कार्य (public...
क्या मौजूदा कानूनी ढांचा एसिड हमले के पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास के लिए पर्याप्त है?
परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ (2015) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एसिड हमले के पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास की गंभीर समस्या पर चर्चा की।इस मामले ने भारत में कानूनी और प्रशासनिक ढांचे की कमियों को उजागर किया, जो एसिड हमले के पीड़ितों को पर्याप्त चिकित्सा उपचार (Medical Treatment), दीर्घकालिक देखभाल और वित्तीय सहायता प्रदान करने में असमर्थ है। अदालत ने लक्ष्मी बनाम भारत संघ (2013) जैसे पिछले महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए एसिड हमले के पीड़ितों के अधिकारों और राज्य की...
धार्मिक स्थलों की रक्षा और अपमानजनक कृत्यों पर रोक: भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत धारा 298 और 299
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) का स्थान लेती है और इसमें अपराधों के लिए नए प्रावधान लाए गए हैं।इसमें धार्मिक अपराधों (Religious Offenses) पर भी ध्यान दिया गया है, जिसमें धारा 298 और धारा 299 के अंतर्गत धार्मिक स्थानों, पवित्र वस्तुओं और धार्मिक भावनाओं (Religious Sentiments) की रक्षा के प्रावधान हैं। ये प्रावधान धार्मिक सद्भावना बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं ताकि किसी भी समूह की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों पर रोक...
सेशन न्यायालय में मुकदमे की प्रारंभिक प्रक्रिया : सेक्शन - 251 BNSS, 2023 के अंतर्गत आरोप तय करना
हमारी श्रृंखला के Part 1 में, हमने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) के तहत सेशन न्यायालय (Court of Session) में मुकदमे की प्रक्रिया के आरंभिक प्रावधानों को कवर किया था। इसमें सेक्शन 248, 249, और 250 शामिल थे, जो Public Prosecutor की भूमिका, अभियोजन पक्ष (Prosecution) के द्वारा केस शुरू करने की प्रक्रिया, और आरोपी (Accused) के लिए डिस्चार्ज (Discharge) का अधिकार प्रदान करते हैं यदि साक्ष्य (Evidence) अपर्याप्त हों। " target="_blank"इन सेक्शनों की...
क्या RBI को सार्वजनिक विश्वास का दावा करते हुए जानकारी देने से मना करने का अधिकार है?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाम जयंतीलाल एन. मिस्त्री (2015) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005, RTI Act) के दायरे और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India, RBI) की गोपनीयता (Confidentiality) की जिम्मेदारियों पर विचार किया।इस मामले में अदालत ने यह जांचा कि क्या आरबीआई और अन्य बैंकों को आर्थिक हित, वाणिज्यिक (Commercial) गोपनीयता और सार्वजनिक विश्वास (Public Confidence) का दावा करते हुए जानकारी देने से मना करने का अधिकार है। इस निर्णय में...
जानिए किसी भी क्रिमिनल केस में चार्ज का क्या मतलब है?
किसी भी क्रिमिनल केस में ट्रायल की शुरुआत चार्ज से ही होती है। चार्ज किसी ट्रायल की बुनियाद होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 18 में चार्ज के लिए चेप्टर दिया गया है जिसमें धारा 234 से लेकर 247 तक चार्ज संबंधित सभी प्रावधान डाल दिए गए हैं।चार्ज अभियोजन की प्रथम कड़ी होती है तथा चार्ज के बाद ही अभियोजन की अगली कार्यवाही की जाती है। चार्ज के अभाव में अभियोजन प्रारंभ नहीं हो सकता है, चार्ज अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की जानकारी का ऐसा लिखित कथन होता है जिसमें चार्ज के आधार के साथ साथ...
फाइनल पुलिस रिपोर्ट का मतलब
किसी भी क्रिमिनल केस में पुलिस द्वारा जो चालान अभियुक्त के विरुद्ध अदालत में पेश किया जाता है उसे ही फाइनल पुलिस रिपोर्ट कहा जाता है।पुलिस अपने अन्वेषण में अलग-अलग स्तर पर रिपोर्ट प्रेषित करती है। पुलिस अन्वेषण के चरणों में तीन प्रकार की रिपोर्ट भेजती है, धारा 176 के अधीन पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी मामले की प्रारंभिक रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को प्रेषित करता है।दूसरी रिपोर्ट उसे कहा जाता है जो इस संहिता की धारा 188 में यह अपेक्षित है कि अधीनस्थ पुलिस अधिकारी द्वारा अपराध के मामले की रिपोर्ट संबंधित...
जानिए कब और कौन करता है गिरफ्तारी?
किसी भी मुजरिम की गिरफ्तारी से ही कोई भी क्रिमिनल केस में कार्यवाही को आगे बढ़ाया जा सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(1) (2) के अंतर्गत यह बताया गया है की गिरफ्तारी किस समय की जा सकती है। इस धारा के अंतर्गत किसी पुलिस अधिकारी को बगैर वारंट के गिरफ्तार करने संबंधी अधिकार दिए गए है। इस धारा के अंतर्गत पुलिस अधिकारी बिना किसी प्राधिकृत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना व्यक्तियों को गिरफ्तार कर सकता है।इस धारा के अंतर्गत कुछ कारण दिए गए हैं कुछ शर्ते रखी गई हैं जिन कारणों के विद्यमान होने...
जानिए वारंट क्या होते हैं?
वारंट अदालत का पॉवर है जो किसी भी व्यक्ति को अदालत में हाज़िर किये जाने हेतु इस्तेमाल किया जाता है। वारंट कोर्ट को प्राप्त ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को गिरफ्तार कर कोर्ट के समक्ष लाए जाने का प्रावधान करती है। सर्वप्रथम तो कोर्ट जिस व्यक्ति को हाजिर करवाना चाहती है उस व्यक्ति को समन जारी किया जाता है। समन के माध्यम से कोर्ट में हाजिर करवाने का प्रयास किया जाता है लेकिन यदि व्यक्ति समन से बच रहा है और समन तामील होने के बाद भी कोर्ट के समक्ष हाजिर नहीं होता है ऐसी परिस्थिति में कोर्ट को गिरफ्तार करके...
धारा 295, 296 और 297 भारतीय न्याय संहिता, 2023: अश्लीलता और अनधिकृत लॉटरी के प्रावधान
भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने भारतीय दंड संहिता को बदलते हुए नए कानूनी प्रावधान पेश किए हैं, जिसमें अश्लीलता और अवैध (Unauthorized) लॉटरी से जुड़े अपराधों के लिए दंड शामिल हैं। धारा 295, 296 और 297 में इन विशेष कार्यों को गैरकानूनी (Illegal) घोषित किया गया है।हर धारा में अपराध की परिभाषा (Definition), प्रतिबंधित (Prohibited) कार्यों का विवरण और उन पर लगाए जाने वाले दंड का वर्णन (Description) है। यहां इन धाराओं को सरल शब्दों में समझाने के लिए उदाहरण (Example) भी दिए गए हैं, ताकि हर पहलू आसानी से...
क्या पंचायती चुनाव में उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता और व्यक्तिगत आवश्यकताएं होनी चाहिए?
राजबाला व अन्य बनाम हरियाणा राज्य के महत्वपूर्ण फैसले में हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 में किए गए संशोधन, विशेषकर शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualifications) और कुछ व्यक्तिगत आवश्यकताओं (Personal Requirements) को चुनाव में खड़े होने के लिए जरूरी बनाने की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया था।याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये संशोधन भारतीय संविधान (Constitution of India) के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लंघन करते हैं, खासकर कमजोर वर्ग के लोगों को चुनाव में...
भारत में चुनाव और संविधान पर प्रमुख फैसले : मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की व्याख्या करके चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। राजबाला मामले में चर्चा किए गए महत्वपूर्ण फैसले चुनावी अधिकारों और विधायी शक्तियों पर मूल्यवान दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। इस लेख में उन प्रमुख फैसलों पर चर्चा की गई है, जिन्होंने चुनावों और संवैधानिक कानून को प्रभावित किया है।1. मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Vote and Contest Elections) अनुच्छेद 326 के तहत मतदान का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन...
सेशन कोर्ट में मुकदमे की प्रारंभिक प्रक्रिया : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अंतर्गत सेक्शन 248 – 250
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) ने दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) को बदलते हुए एक नई कानूनी प्रक्रिया स्थापित की है। इसके Chapter XIX में सेशन न्यायालय (Court of Session) में मुकदमों की प्रक्रिया को समझाया गया है।इसमें अभियोजन (Prosecution) की भूमिका, आरोपों (Charges) की जानकारी, और आरोपी (Accused) को डिस्चार्ज (Discharge) करने की संभावना पर विशेष जोर दिया गया है। इस लेख में हम BNSS के सेक्शन 248, 249 और 250 को सरल भाषा में समझाएंगे,...
BNSS, 2023 की धारा 247 के तहत आरोपों की वापसी और बरी होने की प्रक्रिया : आरोप प्रबंधन का पूरा ढांचा
धारा 247 का परिचय और इसका महत्व (Importance of Section 247)BNSS (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita), 2023 की धारा 247 चार्ज (Charge) से संबंधित अध्याय का अंतिम प्रावधान है। यह धारा उन स्थितियों पर लागू होती है, जहाँ किसी व्यक्ति पर एक से अधिक आरोप (Charges) लगाए गए हों और इनमें से एक या अधिक आरोपों पर दोष सिद्ध (Conviction) हो गया हो।इस प्रावधान के तहत, शिकायतकर्ता (Complainant) या अभियोजन (Prosecution) अधिकारी, न्यायालय (Court) की सहमति से शेष आरोपों को वापस ले सकते हैं या न्यायालय अपने विवेक...
मृत्युदंड पर भारत की न्यायिक व्याख्या: नियम, प्रावधान और ऐतिहासिक फैसले
भारत में मृत्युदंड कुछ विशेष अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत निर्धारित किया गया है। इनमें धारा 302 (हत्या), धारा 376A (दुष्कर्म जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु या स्थायी कोमा), और धारा 364A (फिरौती के लिए अपहरण आदि) प्रमुख हैं। धारा 364A को 1993 के आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम के तहत जोड़ा गया, ताकि उन अपराधों को कवर किया जा सके जहां फिरौती के लिए अपहरण किया जाता है और पीड़ित को जान से मारने या गंभीर नुकसान की धमकी दी जाती है। यह धारा विशेष रूप से बढ़ते अपहरण के मामलों को ध्यान में...
क्या धारा 364A IPC मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिरौती के लिए अपहरण पर मृत्युदंड का विश्लेषण
विक्रम सिंह @ विक्की बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code - IPC) की धारा 364A की संवैधानिकता पर विचार किया, जो फिरौती के लिए अपहरण या अगवा करने पर मृत्युदंड (Death Penalty) या आजीवन कारावास (Life Imprisonment) का प्रावधान करती है।इस मामले में, यह देखा गया कि क्या धारा 364A के तहत मृत्युदंड का प्रावधान संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से जीवन के अधिकार (Right to Life) के उल्लंघन का कारण बनता है। धारा 364A IPC का पृष्ठभूमि...
अश्लील सामग्री की परिभाषा और उससे जुड़े विक्रय, वितरण, और सार्वजनिक प्रदर्शन का अपराध : धारा 294, भारतीय न्याय संहिता 2023
भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) जैसे पुराने कानूनों को बदलते हुए नए कानूनी ढाँचे पेश किए हैं। इस संहिता की एक महत्वपूर्ण धारा, धारा 294, अश्लीलता (Obscenity) और इससे जुड़े अपराधों पर चर्चा करती है।यह धारा यह स्पष्ट करती है कि अश्लील सामग्री क्या होती है, ऐसे सामग्री के साथ जुड़े हुए अवैध कार्य कौन से हैं और कुछ विशेष मामलों में अपवाद (Exceptions) भी देती है। यहाँ धारा 294 के प्रावधानों का सरल हिंदी में विस्तार से विवरण दिया गया है ताकि इसे बेहतर ढंग से समझा जा...
दहेज के मामले में अननेचुरल डेथ का कड़ा कानून? जानिए
भारतीय संसद ने भी समय-समय पर दहेज विरोधी कानून बनाती रही है तथा समाज में दहेज समर्थक विचारों का अंत करने का प्रयास किया जाता रहा है। घरेलू हिंसा अधिनियम,दहेज प्रतिषेध अधिनियम इत्यादि अधिनियम को बनाकर भारत की संसद में दहेज जैसे अभिशाप से महिलाओं के संरक्षण के संपूर्ण प्रयास किए है। इस ही प्रकार भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 के अंतर्गत दहेज़ मृत्यु से संबंधित भी कड़े कानून बनाये गए हैं।दहेज संबंधी अपराधों में दहेज मृत्यु सबसे जघन्य अपराध है। दहेज मृत्यु दहेज की मांग के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होती...