सुप्रीम कोर्ट में जुलाई, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। जुलाई महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
ओरांव जनजाति की परंपरा के तहत चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के तौर पर नहीं अपना सकते: सुप्रीम कोर्ट
ओरांव आदिवासी समुदाय में विरासत से जुड़ी पारंपरिक प्रथाओं के मामले में अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जुलाई) को कहा कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' (घर में रहने वाला दामाद) के तौर पर शामिल नहीं कर सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, "प्रचलित पारंपरिक कानून में ऐसी कोई बात साबित नहीं हुई है कि कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को अपना घर-दामाद बना सके।"
Cause Title: BEJLA ORAON VERSUS KALI DAS ORAON & ORS.
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बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकता IBA, वकीलों की ब्लैकलिस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) केवल धोखाधड़ी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर किसी पैनल वकील का नाम 'कौशन लिस्ट' में डालकर उसे प्रभावी रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई से अधिवक्ता के पेशे और प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह फैसला उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनाया, जिसमें एक अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था।
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टाउन पंचायत के नॉमिनेटेड सदस्य लेजिस्लेटिव काउंसिल चुनाव में वोट नहीं डाल सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टाउन पंचायतों के नॉमिनेटेड सदस्य कर्नाटक लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए लोकल अथॉरिटीज़ निर्वाचन क्षेत्रों से होने वाले चुनावों में वोट नहीं डाल सकते। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट में उन्हें शामिल करना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेशों को चुनौती देने वाली कई अपीलों को खारिज किया। हाईकोर्ट ने कहा था कि नॉमिनेटेड सदस्य चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकते और वोटों की दोबारा गिनती में उनके वोटों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
Case : Pranesh M.K. v. A.V. Gayathri & Ors.
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SIR | वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता जाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फिर से कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रोसेस के बाद वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब अपने आप नागरिकता का दर्जा खोना नहीं है। कोर्ट ने बताया कि उसने बिहार SIR फैसले में यह साफ कर दिया था कि नागरिकता तय करने का आखिरी अधिकार भारत के चुनाव आयोग (ECI) के पास नहीं है, और वोटर लिस्ट से नाम हटने से ही किसी की नागरिकता नहीं छीनी जा सकती।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच प्रसेनजीत बोस की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में SIR से बाहर किए गए लोगों की अपील सुनने के लिए बने अपीलीय ट्रिब्यूनल में सुनवाई की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए कई राहतें मांगी गईं।
Case Title: PRASENJIT BOSE v. ELECTION COMMISSION OF INDIA AND ORS. W.P.(C) No. 819/2026
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मूल विक्रेता की सहमति के बिना रेक्टिफिकेशन डीड से संपत्ति नहीं बदली जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेक्टिफिकेशन डीड (Rectification Deed) का इस्तेमाल किसी बिक्री विलेख (Sale Deed) में केवल त्रुटि सुधारने के लिए किया जा सकता है, न कि संपत्ति की पहचान ही बदलने के लिए। अदालत ने कहा कि यदि मूल विक्रेता (Original Transferor) इसकी प्रक्रिया में शामिल नहीं है, तो रेक्टिफिकेशन डीड के जरिए दूसरी संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालतें ऐसे आधार पर फैसला नहीं दे सकतीं, जो पक्षकारों ने कभी अपने तर्कों में उठाए ही न हों।
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Hindu Succession Act | धारा 22 के तहत क्लास-I उत्तराधिकारियों का प्राथमिकता वाला अधिकार कृषि भूमि पर भी लागू होती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 जुलाई) को फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22, जो क्लास-I उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह-उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति को खरीदने का प्राथमिकता वाला अधिकार देता है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के कृषि भूमि पर लागू होने को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने 'बाबू राम बनाम संतोख सिंह' (2019) 14 SCC 162 मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 22 के तहत प्राथमिकता वाला अधिकार कृषि भूमि पर भी लागू होती है।
Cause Title: MAHINDER & ORS. VERSUS PURAN SINGH
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तमिलनाडु में जारी रहेगी गो-हत्या: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें बकरीद या किसी भी अन्य दिन तमिलनाडु राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े की हत्या पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु राज्य द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। राज्य ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राज्य में गायों और बछड़ों की हत्या पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।
Case : The Secretary to the Government v. K Surya alias K Surya Prasanth | Diary No.36054/2026
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JJ Act- हत्या 'गंभीर अपराध', न कि सिर्फ़ 'सीरियस ऑफ़ेंस'; IPC की धारा 302 का मतलब है कम-से-कम उम्रकैद की सज़ा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1)) के तहत सज़ा-योग्य हत्या का अपराध, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) के तहत एक "जघन्य अपराध" (Heinous Offence) है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उम्रकैद इसकी कम से कम सज़ा मानी जाएगी, भले ही इस प्रावधान में स्पष्ट रूप से कम से कम सज़ा का ज़िक्र न हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने बिहार के एक हत्या के मामले में आरोपी किशोर की अपील खारिज की। उन्होंने पटना हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि उस पर चिल्ड्रन कोर्ट में एक बालिग की तरह मुक़दमा चलाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि, JJ Act की धारा 101(2) के तहत अपीलीय अदालत को मनोवैज्ञानिकों या विशेषज्ञों से मदद लेने का अधिकार है, लेकिन ऐसी मदद लेना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह अदालत की मर्ज़ी पर निर्भर करता है।
Case Title: X v. State of Bihar & Anr.
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S. 125 CrPC | पति शुरुआती में ही पत्नी का एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर साबित कर दे तो पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है, अगर पति शुरुआती स्तर पर ही पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (व्यभिचार) को साबित कर देता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा, "...हमारा मानना है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी दाखिल करता है और पहली ही बार में सबूतों के ज़रिए आरोप को साबित कर देता है, तभी अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने पर रोक लगाई जा सकती है।"
Cause Title: HIMANSHU CHORDIA VERSUS STATE OF RAJASTHAN & ANR.
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विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की नीति में केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियों को पात्र मानकर अन्य विवाहित बेटियों को बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी और बेटे के बीच इस प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति की संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द किया।
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Indian Succession Act | पत्नी की मौत के बाद उसकी संपत्ति का मालिकाना हक किसे मिलता है? सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई उत्तराधिकार कानून समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (30 जुलाई) को साफ़ किया कि ईसाई उत्तराधिकार कानून के तहत पति द्वारा अपनी पत्नी के नाम पर खरीदी गई संपत्ति पत्नी की ही संपत्ति मानी जाती है। इसलिए उसकी मौत के बाद ऐसी संपत्ति का उत्तराधिकार उसकी अपनी मिल्कियत के आधार पर तय किया जाना चाहिए। इसे इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 33 लागू करने के मकसद से पति की संपत्ति नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की। उस फैसले में मृतक पत्नी के नाम पर मौजूद संपत्ति को उसके पति की संपत्ति का हिस्सा माना गया और इंडियन सक्सेशन एक्ट की धारा 33 लागू की गई।
Cause Title: SHAKUNTALA & ORS. VERSUS ROBERT ANTHONY & ORS.
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बिना छूट के पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा संवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा को संवैधानिक माना। कोर्ट ने उन कई याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें ऐसी सज़ाओं को असंवैधानिक और सज़ा में छूट के कानूनी नियमों के खिलाफ बताया गया।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने चार समूहों के दोषियों की याचिकाओं को खारिज किया। इनमें वे कैदी भी शामिल थे जिन्हें मौत की सज़ा मिली थी, लेकिन संवैधानिक अधिकारियों ने उसे बदलकर या अदालतों ने उसे बदलकर पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा में बदल दिया था।
Cause Title: RAMASREY @ FAKKAD VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH (with connected matters)
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EWS आरक्षण के लिए 8 लाख रुपये की आय सीमा प्रथमदृष्टया उचित: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण के लिए निर्धारित 8 लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा को प्रथमदृष्टया उचित बताया है। हालांकि, अदालत ने इस मानदंड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम फैसला फिलहाल सुरक्षित रखते हुए सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित की।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ 2021 में दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसके तहत मेडिकल पाठ्यक्रमों की अखिल भारतीय कोटा सीटों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत और EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।
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नए क्रिमिनल लॉ के तहत शुरुआती 15 दिनों के बाद भी पुलिस कस्टडी मिल सकती है: सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 187(2) समझाई
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 जुलाई) को कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस कस्टडी सिर्फ़ रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं है और इसे कानूनी समय-सीमा के भीतर अलग-अलग हिस्सों में भी मांगा जा सकता है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की उस शर्त को रद्द किया, जिसमें आरोपी की पुलिस कस्टडी को रिमांड के शुरुआती 15 दिनों से आगे बढ़ाने पर रोक लगाई गई।
Cause Title: THE STATE OF ANDHRA PRADESH VERSUS SUDA SURESH VEERA VENKATA NAGA RAJU
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Art. 311(2) | पक्की नौकरी वाले सरकारी कर्मचारी को बिना जांच के गैर-कानूनी नियुक्ति के आरोप पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिस सरकारी कर्मचारी की नौकरी पक्की (कन्फर्म) हो चुकी है, उसे सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसकी नियुक्ति में कथित तौर पर कोई गड़बड़ी थी। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच किए बिना नौकरी से निकालना संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन होगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "नौकरी पक्की होना कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी को एक ठोस दर्जा देता है, जिससे उसे नौकरी की बेहतर सुरक्षा और सिविल सेवक को मिलने वाले संवैधानिक सुरक्षा उपाय मिलते हैं। एक बार जब अपील करने वाले कर्मचारी पक्के कर्मचारी का दर्जा पा लेते हैं तो उनकी नियुक्ति की वैधता से जुड़े आरोपों के आधार पर सिर्फ़ प्रशासनिक आदेश से उनकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती थी। क्या नियुक्ति में कोई गड़बड़ी थी, क्या इसमें अपील करने वालों की कोई भूमिका थी और क्या ऐसी गड़बड़ी के लिए नौकरी से निकालना सही था - ये सभी मामले अनुच्छेद 311(2) में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार तय किए जाने चाहिए।"
Cause Title: DEBASHISH MOHAPATRA & ORS. VS. DISTRICT AND SESSION JUDGE, JAGATSINGHPUR & ORS.