बिना छूट के पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा संवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

30 July 2026 10:50 AM IST

  • बिना छूट के पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा संवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा को संवैधानिक माना। कोर्ट ने उन कई याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें ऐसी सज़ाओं को असंवैधानिक और सज़ा में छूट के कानूनी नियमों के खिलाफ बताया गया।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने चार समूहों के दोषियों की याचिकाओं को खारिज किया। इनमें वे कैदी भी शामिल थे जिन्हें मौत की सज़ा मिली थी, लेकिन संवैधानिक अधिकारियों ने उसे बदलकर या अदालतों ने उसे बदलकर पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा में बदल दिया था।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत हत्या के लिए केवल दो सज़ाओं का प्रावधान है - मौत की सज़ा और आजीवन कारावास - और इसमें बिना छूट के पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ऐसी सज़ाएं दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 के तहत मिलने वाली सज़ा में छूट की कानूनी शक्तियों को खत्म करती हैं।

    इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन (2016)' मामले में संविधान पीठ के फैसले से यह मुद्दा पूरी तरह से तय हो चुका है, इसलिए इन याचिकाओं को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना गया।

    बेंच ने कहा,

    "पांच जजों की बेंच ने कहा कि पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा वैध है। दो जजों की बेंच के सामने यह तर्क देने की गुंजाइश ही कहां है कि ऐसी सज़ाएं अवैध/असंवैधानिक हैं या CrPC की धारा 432 के तहत कानूनी रूप से मिले अधिकारों का उल्लंघन करती हैं? हम बस इतना ही कह सकते हैं कि ऐसी कोशिश कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।"

    बेंच ने उन दोषियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जो सभी अपनी पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा काट रहे थे - कुछ मामलों में बिना किसी छूट या पैरोल के।

    कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या दोषी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा, बिना किसी छूट के, संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने 'वी. श्रीहरन' मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले ने 'स्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य' (2008) 13 SCC 767 मामले में तय की गई सज़ा की "खास श्रेणी" (Special Category) को मंज़ूरी दी थी। यह श्रेणी कोर्ट को सही मामलों में मौत की सज़ा देने के बजाय दोषी की बाकी बची पूरी ज़िंदगी के लिए जेल की सज़ा सुनाने की इजाज़त देती है। इसका मतलब है कि संवैधानिक कोर्ट यह आदेश दे सकते हैं कि ऐसी सज़ाएं आम सज़ा में छूट (Remission) के नियमों के दायरे से बाहर रहें।

    इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि जब सज़ा उम्रकैद की होती है और उसमें 'बिना छूट के' (Without Remission) जैसी कोई शर्त नहीं जोड़ी जाती, तो CrPC की धारा 432 के तहत संबंधित सरकार की शक्तियां प्रभावित नहीं होतीं। सरकार दोषी व्यक्ति की सज़ा को सस्पेंड करने या उसमें छूट देने के लिए इन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "...जब सज़ा उम्रकैद की हो और उसमें साफ तौर पर 'बिना छूट के' (Without Remission) जैसी कोई शर्त न जोड़ी गई हो, तो CrPC की धारा 432 के तहत राज्य की शक्ति प्रभावित नहीं होती और ऐसी अर्ज़ी पर विचार किया जा सकता है।"

    अनुच्छेद 32 कोई शॉर्टकट नहीं

    कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भले ही अनुच्छेद 32 संविधान की "आत्मा" है, लेकिन इसका इस्तेमाल उन कानूनी या संवैधानिक उपायों को नज़रअंदाज़ करने के लिए नहीं किया जा सकता, जो संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत याचिकाकर्ताओं के लिए पहले से उपलब्ध हैं।

    कुछ याचिकाकर्ताओं के मामले में कोर्ट ने पाया कि उन्होंने सज़ा में छूट या दया याचिका जैसे उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र (Extraordinary Jurisdiction) का इस्तेमाल करने का कोई औचित्य नहीं था। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक प्रमुखों, यानी राज्यपाल और राष्ट्रपति, की कार्यकारी शक्तियां संविधान के किसी अन्य प्रावधान से प्रभावित या बाधित नहीं होती हैं; इसलिए किसी दोषी की सज़ा में छूट या दया याचिका पर उनके द्वारा लिए गए फैसले में कोर्ट आम तौर पर दखल नहीं दे सकते।

    कोर्ट ने कहा,

    “ज़ाहिर है, किसी कैदी के इस कोर्ट में आने के अधिकार को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल दूसरी प्रक्रियाओं से बचने या कोर्ट के सामने अपनी शिकायतें रखने के लिए शॉर्टकट के तौर पर नहीं किया जा सकता... राष्ट्रपति या गवर्नर को मिली शक्तियां संविधान के किसी दूसरे प्रावधान से प्रभावित या बाधित नहीं होती हैं। अगर याचिकाकर्ता के सीनियर वकील की दलील मान ली जाए तो हम एग्जीक्यूटिव पावर (कार्यकारी शक्ति) के इस्तेमाल पर अपील (जुडिशियल रिव्यू नहीं) सुन रहे होंगे, जो कि जायज़ नहीं है।”

    Cause Title: RAMASREY @ FAKKAD VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH (with connected matters)

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