ओरांव जनजाति की परंपरा के तहत चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के तौर पर नहीं अपना सकते: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
9 July 2026 3:49 PM IST

ओरांव आदिवासी समुदाय में विरासत से जुड़ी पारंपरिक प्रथाओं के मामले में अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जुलाई) को कहा कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' (घर में रहने वाला दामाद) के तौर पर शामिल नहीं कर सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,
"प्रचलित पारंपरिक कानून में ऐसी कोई बात साबित नहीं हुई है कि कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को अपना घर-दामाद बना सके।"
बेंच ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को सही ठहराया गया था।
यह विवाद सुखू ओरांव की पुश्तैनी संपत्ति को लेकर शुरू हुआ, जिनके तीन बेटे हैं - धुंगरू, लेदुरा और भौला। लेदुरा की मौत बिना किसी संतान के हो गई, जबकि भौला की मौत के समय उनकी एक बेटी बुधैन है। वादी बेजला ओरांव (धुंगरू का बेटा) ने दावा किया कि सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार होने के नाते, लेदुरा और भौला की मौत के बाद संपत्ति उसे विरासत में मिली।
वहीं, प्रतिवादियों का तर्क था कि बुधैन के पति पुनाई को लेदुरा ने घर-दामाद के तौर पर रखा था, इसलिए संपत्ति पर उनका अधिकार बनता है। उन्होंने 27 फरवरी 1975 के एक दस्तावेज़ का भी हवाला दिया, जिसे कार्यवाही के दौरान बंटवारे का दस्तावेज़ (पार्टीशन डीड) बताया गया।
ट्रायल कोर्ट ने घर-दामाद वाली व्यवस्था की वैधता के बारे में प्रतिवादियों की दलील को मानते हुए मुकदमा खारिज कर दिया। पहली अपीलीय अदालत ने इस फैसले को बरकरार रखा, जबकि झारखंड हाईकोर्ट ने दूसरी अपील भी खारिज की। हालांकि उसने कानून का एक अहम सवाल तय किया था कि क्या ओरांव पारंपरिक कानून के तहत चाचा-ससुर को घर-दामाद रखने का अधिकार है। इसके बाद वादी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने वादी ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने गलत फैसला सुनाया है, क्योंकि रिकॉर्ड में ऐसी कोई पारंपरिक प्रथा नहीं है जो चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को मंज़ूरी देती हो। उन्होंने तर्क दिया कि लेडुरा और भौला की मृत्यु के बाद संपत्ति का उत्तराधिकार पाने का हकदार केवल सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार (एग्नेट) यानी वे खुद ही हैं।
अपीलकर्ता-वादी के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस करोल के फैसले में कहा गया कि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि कथित 'घर-दामाद' व्यवस्था लागू रीति-रिवाज की शर्तों को पूरा करती थी। हालांकि ओरांव प्रथागत कानून में 'घर-दामाद' की व्यवस्था के अस्तित्व पर कोई विवाद नहीं था, लेकिन कोर्ट ने जोर दिया कि मौजूदा मामला उस रीति-रिवाज के दायरे में नहीं आता है।
एस.सी. रॉय की प्रमाणिक पुस्तक 'द ओरांव ऑफ छोटानागपुर' का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक घर-दामाद को उत्तराधिकार के अधिकार तभी मिल सकते हैं, जब उसे परिवार के आखिरी पुरुष मालिक या उसकी विधवा ने परिवार में गोद लिया हो। मौजूदा मामले में पुनाई (घर-दामाद) को कथित तौर पर लेडुरा ने शामिल किया था, जो बुधैन (लेडुरा की भतीजी) के केवल चाचा थे, पिता नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"...घर-दामाद या ज़मीन के मालिक से सीधे तौर पर जुड़े किसी अन्य पुरुष वारिस (यानी परिवार के पुरुष सदस्यों) की अनुपस्थिति में संपत्ति पर सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार का अधिकार होगा। इसलिए निचली अदालतों के फैसले रद्द किए जाते हैं। वादी का मुकदमा मंजूर किया जाता है।"
अपील स्वीकार कर ली गई।
Cause Title: BEJLA ORAON VERSUS KALI DAS ORAON & ORS.


