बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकता IBA, वकीलों की ब्लैकलिस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Praveen Mishra

7 July 2026 2:12 PM IST

  • बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकता IBA, वकीलों की ब्लैकलिस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) केवल धोखाधड़ी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर किसी पैनल वकील का नाम 'कौशन लिस्ट' में डालकर उसे प्रभावी रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई से अधिवक्ता के पेशे और प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह फैसला उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनाया, जिसमें एक अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था।

    मामले में सिंडिकेट बैंक (अब केनरा बैंक) ने आरोप लगाया था कि बैंक के पैनल अधिवक्ता ने एक संपत्ति की सर्च एवं टाइटल रिपोर्ट तैयार करते समय लापरवाही बरती और यह नहीं बताया कि संपत्ति का एक हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका था। बैंक का आरोप था कि इससे उधारकर्ता को धोखाधड़ी करने में मदद मिली और बैंक को वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा।

    इसके बाद अधिवक्ता का नाम 5 फरवरी 2020 को IBA द्वारा जारी कौशन लिस्ट में शामिल कर दिया गया। अधिवक्ता का कहना था कि उनका नाम बिना पूर्व नोटिस, बिना सुनवाई का अवसर दिए और बिना उचित जांच के सूची में डाल दिया गया, जिसके कारण कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने उन्हें अपने पैनल से हटा दिया। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को भी गंभीर क्षति पहुंची।

    सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता मनींदर सिंह ने दलील दी कि किसी अधिवक्ता के पेशेवर आचरण से जुड़े मामलों में कार्रवाई करने का अधिकार केवल बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और संबंधित राज्य बार काउंसिलों के पास है। BCI और केंद्र सरकार ने भी इस रुख का समर्थन किया।

    फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IBA किसी अधिवक्ता को 'कौशन लिस्ट' में डालकर प्रभावी रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता। साथ ही अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी की तर्ज पर अधिवक्ताओं के लिए नेशनल लीगल अकादमी स्थापित करने पर कदम उठाए, ताकि अधिवक्ताओं के लिए निरंतर कानूनी शिक्षा (Continuing Legal Education) की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जा सके।

    अदालत के विस्तृत फैसले का इंतजार है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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