NI Act में अवैध रूप से किसी इंस्ट्रूमेंट को प्राप्त करने के परिणाम

Update: 2025-03-30 12:22 GMT
NI Act में अवैध रूप से किसी इंस्ट्रूमेंट को प्राप्त करने के परिणाम

NI Act में कुछ तरीके ऐसे बताये गए हैं जिनसे अवैध रूप से कोई इंस्ट्रूमेंट प्राप्त कर लिया जाता है।

इस प्रकार निम्नलिखित के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान किया गया है-

लिखत के खोने

लिखत के चोरी होने

लिखत को कपटपूर्ण तरीके से प्राप्त करने

लिखत को अवैध तरीकों से प्राप्त करने

ऐसा कब्जाधारी या पृष्ठांकिती जो लिखत को पाने वाले, चोरी करने वाले या कपटपूर्ण तरीके या अवैध प्रतिफल से प्राप्त करने वाले व्यक्ति से प्राप्त किया है, लिखत के रचयिता, प्रतिग्रहीता या धारक या किसी पूर्विक पक्षकार से धन का दावा नहीं कर सकता है। अपवाद- सम्यक् अनुक्रम धारक- एक सम्यक् अनुक्रम धारक या कोई व्यक्ति जो किसी सम्यक् अनुक्रम धारक के माध्यम से अपना अधिकार का दावा करता है, लिखत के अधीन धनराशि का दावा कर सकता है बावजूद कि लिखत को किसी पूर्विक पक्षकार ने विधि विरुद्ध साधनों से या विधिविरुद्ध प्रतिफल से अभिप्राप्त किया था।

धारा 8 का परन्तुक भी यहाँ पर संगत में है। जहाँ वचन पत्र, विनिमय पत्र या चेक खो जाता है या नष्ट हो जाता है या चोरी हो जाता है यहाँ, लिखत का धारक वही व्यक्ति होगा जो लिखत के खोने, चोरी होने के समय था न कि पाने वाला या चोर ऐसे लिखत का धारक नहीं होगा।

इस प्रकार लिखत को चुराने वाला या पाने वाला उस लिखत का धारक नहीं कहलाएगा।

खोए हुए लिखत के सम्बन्ध में प्रयोज्य विधि सिद्धान्त खोए हुए लिखत के सम्बन्ध में लिखत के स्वामी का अधिकार-

किसी वचन पत्र, विनिमय पत्र या चैक के खोने, चोरी होने दशा में निम्नलिखित विधि सिद्धान्त प्रयोग्य होते हैं जिसे खोए या चोरी हुए लिखत के स्वामी के अधिकार एवं कर्तव्य के रूप में भी स्पष्ट किया जा सकता है। ये हैं

लोबेल बनाम मार्टिन के मामले में यह धारित किया गया है कि जहाँ कोई लिखत खो जाता है वहाँ उसका पाने वाला लिखत के वास्तविक स्वामी के विरुद्ध स्वत्व प्राप्त नहीं कर सकता है और न तो वह लिखत के प्रतिग्रहीता या रचयिता के विरुद्ध इस पर संदाय का दावा कर सकता है। वास्तविक स्वामी का स्वत्व ऐसे खोने या चोरी होने से प्रभावित नहीं होता है और वह लिखत को पाने वाले से वापस लेने का हकदार होता है।

यदि लिखत का पाने वाला खोए हुए वचन पत्र या विनिमय पत्र पर भुगतान प्राप्त करता है, यह व्यक्ति जिसने सम्यक रूप से संदाय किया है इसके लिए विधिक रूप में उन्मोचन पा सकेगा। परन्तु यास्तविक स्वामी लिखत की धनराशि पाने वाले से क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त कर सकेगा।

यदि लिखत जो आदेश पर देय है, खो जाता है और पाने वाला पृष्ठांकन का कूटरचना कर एक प्रतिफलार्थ एवं सद्भावी अन्तरिती को अन्तरित कर देता है, ऐसा अन्तरिती लिखत पर स्वत्व नहीं प्राप्त कर सकता और प्रतिग्रहीता या अन्य दायी पक्षकार द्वारा किया गया संदाय यद्यपि कि ऐसा संदाय सद्भावना पूर्वक किया गया है उसे उन्मुक्त नहीं बनाएगा।

यदि वाहक को देय लिखत या निरंक पृष्ठांकित लिखत खो जाता है तो उसका पाने वाला किसी सद्भावी अन्तरितों को मूल्य से परक्रामित करता है, ऐसा अन्तरिती इसका विधिमान्य स्वत्व प्राप्त कर लेता है और वह सही स्वामों के विरुद्ध लिखत को प्रतिधारित करने एवं लिखत के अधीन दायी पक्षकारों से भुगतान माँगने, दोनों के लिए हकदार होगा।

यह सलाहकारी है कि खोए हुए लिखत के स्वामी द्वारा लिखत के अधीन दायी व्यक्ति को सूचित कर दिया जाय जिससे कि ऐसे लिखत का भुगतान बिना समुचित जाँच के न करें। लोक विज्ञापन भी लिखत की खोने की दी जा सकती है।

वह पक्षकार जिसने लिखत को खो दिया है, लिखत को देय होने के समय लेखोवाल को एक आवेदन करे और लिखत के अनादर की सूचना सभी दायी पक्षकारों को दे, अन्यथा वह लेखीवाल एवं पृष्ठांकितों के विरुद्ध अपने उपचार को खो देगा।

इस धारा के अधीन बिल को खोने वाला व्यक्ति खोए हुए बिल की दूसरी प्रति पाने के लिए धारा 45क के अधीन लेखोवाल से माँग कर सकता है। •परक्राम्य लिखत अधिनियम एवं संविदा के सामान्य विधि के अन्तर्गत खोए हुए लिखत के पाने वाले का अधिकार में अन्तर- परक्राम लिखत अधिनियम की धारा 8, 45 (क) एवं 58 खोए हुए लिखत से सम्बन्धित है। उक्त धाराएँ यह स्पष्ट करती हैं कि लिखत को पाने वाला लिखत का धारक नहीं कहा जा सकता है और ऐसे लिखत का स्वामित्व उस व्यक्ति की बनी रहती हैं जो लिखत को खोने अथवा नष्ट होने के समय हकदार था लिखत को पाने वाला व्यक्ति लिखत का अन्तरण नहीं कर सकता।

हालांकि एक प्रतिफलार्थ अन्तरिती एवं अन्तरक के स्वत्य सम्बन्धी दोष की जानकारी के बिना धारक के अधिकार को प्राप्त कर सकेगा। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 71, 168 एवं 169 खोए हुए माल से सम्बन्धित हैं। धारा 71 के अनुसार "वह व्यक्ति जो किसी अन्य का माल पड़ा पाता है और उसे अपनी अभिरक्षा में लेता है। उसी उत्तरदायित्व के अध्यधीन है, जिसके अध्यधीन उपनिहिती होता है। इस प्रकार संविदा विधि के अधीन माल के पान वाले को उपनिहिती के रूप में रखा गया है। परन्तु लिखत के पाने वाले को उपनिहिती नहीं माना गया है, क्योंकि धारा 71 माल के सम्बन्ध में लागू होती है न कि परक्राम्य लिखत, क्योंकि परक्राम्य लिखत वाद योग्य दावे होता है।

संविदा विधि की धारा 168 एवं 169 पुनः माल पड़ा पाने वाले को ऐसे माल को वापसी के लिए विनिर्दिष्ट पुरस्कार देने की प्रस्थापना की गयी है तो उसे पाने के लिए वाद लाने का अधिकार एवं संदाय होने तक माल को प्रतिधृत रखने का अधिकार होगा। इसके साथ ही साथ ऐसी वस्तु यदि सामान्यतया विक्रय होने वाली चीज है तो तधीन शर्तों के अनुसार माल को बेचने का भी अधिकार होता है। कामन लॉ के अन्तर्गत माल को पड़ा पाने वाले का अधिकार केवल सही स्वामी को छोड़कर सभी व्यक्तियों से बेहतर स्वत्य माना जाता है। विधि का यह सामान्य सिद्धान्त लिखत को पाने वाले के सम्बन्ध में लागू नहीं होता है।

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