झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि 'शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस' (मुख्य अपराध) से जुड़ी कार्यवाही में तय की गई रकम और 'प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002' (PMLA) के तहत अपराध से हुई कमाई (प्रोसीड्स ऑफ़ क्राइम) मानी जाने वाली संपत्ति की कीमत के बीच "गणितीय मेल" होना ज़रूरी नहीं है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की सिंगल जज बेंच झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा की ओर से CrPC की धारा 482 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में रांची में PMLA मामलों के स्पेशल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उनके खिलाफ तय आरोपों में बदलाव या संशोधन करने से इनकार किया गया।

याचिकाकर्ता पर PMLA की धारा 3 और 4 के तहत मुकदमा चल रहा है। उन्होंने CrPC की धारा 216 के तहत आरोपों में बदलाव की मांग की। उनका तर्क था कि PMLA कार्यवाही में शामिल बताई गई रकम, मुख्य अपराधों से जुड़ी कार्यवाही में दिखाई गई रकम से काफी ज़्यादा है।

रिकॉर्ड से पता चला कि विजिलेंस ने शुरू में 2010 में लगभग ₹1.40 करोड़ से जुड़े कथित अपराधों के लिए चार्जशीट दाखिल की। बाद में CBI ने जांच अपने हाथ में ले ली और अपनी चार्जशीट में अलग-अलग रकम का ज़िक्र किया, जिसमें ₹13 करोड़ की कथित अवैध रिश्वत और लगभग ₹8.42 करोड़ की आय से अधिक संपत्ति शामिल है।

हालांकि, PMLA कार्यवाही में अपराध से हुई कमाई लगभग ₹3,549.72 करोड़ और US$24,29,990 बताई गई। बाद में इस रकम को बदलकर लगभग ₹3,554.65 करोड़ कर दिया गया, जबकि डॉलर की रकम वही रही। इसलिए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि PMLA आरोप का आधार बनने वाली रकम का मुख्य अपराध में कोई मेल नहीं खाता है और उन्होंने आरोप में बदलाव की मांग की।

स्पेशल जज ने उस चरण पर आरोप में बदलाव करने से इनकार किया और कहा कि किसी भी बदलाव या संशोधन पर मुकदमे के सही चरण पर विचार किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 216 की स्कीम की जांच की, जो कोर्ट को फ़ैसले से पहले किसी भी समय किसी भी आरोप में बदलाव करने या नया आरोप जोड़ने का अधिकार देती है। कोर्ट ने देखा कि यह प्रावधान आरोपी को आरोप में बदलाव की मांग करने का अधिकार नहीं देता है।

कोर्ट ने PMLA की धारा 2(1)(u) के तहत "अपराध से हुई कमाई" (Proceeds of Crime) की परिभाषा और धारा 3 के तहत मनी-लॉन्ड्रिंग के अपराध पर भी विचार किया। इस तर्क को खारिज करते हुए कि PMLA की रकम का आंकड़ा 'शेड्यूल्ड-ऑफ़ेंस' (अनुसूचित अपराध) की चार्ज-शीट में बताई गई रकम से मेल खाना चाहिए।

कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा:

"उक्त फ़ैसले के पैराग्राफ़ या पूरे फ़ैसले में ऐसी कोई बात नहीं है, जो 'शेड्यूल्ड-ऑफ़ेंस' से जुड़ी चार्ज-शीट में बताई गई रकम और PMLA की धारा 45 के तहत शिकायत में मनी-लॉन्ड्रिंग में शामिल बताई गई संपत्ति की कीमत के बीच गणितीय समानता की मांग करती हो।"

कोर्ट ने आगे कहा कि अपराध से हुई कमाई के तौर पर बताई गई रकम की सही-गलत जांच करने के लिए उन संपत्तियों, लेन-देन और सबूतों की जांच करनी होगी, जो उन्हें 'शेड्यूल्ड-ऑफ़ेंस' से जोड़ते हैं। ऐसे सवाल ट्रायल के दौरान तय किए जाने वाले मामले थे और आरोप में बदलाव की अर्ज़ी के चरण में उन्हें अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी देखा कि 'शेड्यूल्ड-ऑफ़ेंस' की कार्यवाही अभी भी चल रही है और याचिकाकर्ता को उन कार्यवाहियों में न तो आरोपमुक्त किया गया और न ही बरी किया गया। उसे ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिससे यह माना जा सके कि PMLA का आरोप केवल उसी रकम तक सीमित होना चाहिए, जो 'प्रेडिकेट-ऑफ़ेंस' (मूल अपराध) की चार्ज-शीट में बताई गई रकम से मेल खाती हो।

इसके अनुसार, कोर्ट को CrPC की धारा 482 के तहत दखल देने लायक कोई स्पष्ट गैर-कानूनी बात, प्रक्रिया का दुरुपयोग या न्याय में गड़बड़ी नहीं मिली। उसने याचिका खारिज की और अपराध से हुई कमाई के आरोपों से जुड़े सबूतों के सवालों को ट्रायल के दौरान विचार करने के लिए छोड़ दिया।

Case Title : Madhu Kora @ Madhu Koda v. Enforcement Directorate

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