सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
14 Jun 2026 10:00 AM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (08 जून, 2026 से 12 जून, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
सक्सेशन एक्ट में कोई समय-सीमा न बताए जाने के कारण प्रोबेट रद्द करने का मामला लिमिटेशन एक्ट के आर्टिकल 137 के तहत आएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 में वसीयत के प्रोबेट के लिए या पहले से जारी प्रोबेट को रद्द करने की अर्ज़ी दाखिल करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई, इसलिए ऐसी कार्यवाही लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 137 के तहत आएगी। यह आर्टिकल उन अर्जियों के लिए तीन साल की समय-सीमा तय करता है, जिनके लिए कोई खास समय-सीमा नहीं बताई गई।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने धीरज दत्ता की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह बात कही। उन्होंने माना कि 1995 में जारी प्रोबेट रद्द करने के लिए 2022 में दी गई अर्ज़ी समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण मान्य नहीं थी।
Cause Title: DHIRAJ DUTTA VERSUS ANIRBAN SEN & ORS.
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वसीयत के प्रमाणीकरण रद्द कराने की याचिका पर तीन वर्ष की सीमा लागू होगी, उत्तराधिकार कानून में अलग प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में वसीयत के प्रमाणीकरण (प्रोबेट) रद्द कराने के लिए कोई अलग समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई। ऐसे मामलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 के तहत तीन वर्ष की समय-सीमा लागू होगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए धीरज दत्ता की अपील स्वीकार की और वर्ष 1995 में दिए गए प्रोबेट को रद्द कराने के लिए वर्ष 2022 में दायर आवेदन को समय-सीमा से परे बताया।
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खड़ी गाड़ी पर पेड़ गिरने से लगी चोट 'मोटर दुर्घटना' नहीं; MACT क्लेम नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारी बारिश के दौरान सड़क किनारे खड़े ऑटो-रिक्शा पर पेड़ की टहनी गिरने से लगी चोटें, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत क्लेम के मकसद से "मोटर वाहन के इस्तेमाल" से हुई दुर्घटना नहीं मानी जाएंगी। फिर भी पीड़ित को लगी गंभीर चोटों को देखते हुए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उसे मिलने वाले मुआवज़े को ₹17.10 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया।
Case: The Commissioner, Bruhat Bangalore Mahanagara Palike v. K.K. Umesh Kumar & Ors.
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'पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि पति ने 13 दिनों तक अपनी पत्नी से बात करने से इनकार किया, इसे किसी भी तरह से क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना आम बात है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है।
इसके बाद जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत पति की सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की। कोर्ट ने उसका पासपोर्ट उसे वापस करने का आदेश भी दिया।
Case Details: JAYESH KANNA v THE ASSISTANT COMMISSIONER LAW AND ORDER (WEST) ETC|CRIMINAL APPEAL NOS. 2382 - 2383 OF 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी विवादों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए सिद्धांत तय किए
सुप्रीम कोर्ट ने आज कस्टडी, मुलाक़ात और माता-पिता के संपर्क से जुड़े विवादों में बच्चों के मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी मूल्यांकन के अनुरोधों से निपटने वाली अदालतों के लिए कुछ व्यापक सिद्धांत तय किए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की ज़िंदगी में "कम-से-कम दखल" ही नियम होना चाहिए और अदालतों को दोबारा सदमा लगने (री-ट्रॉमेटाइज़ेशन) के जोखिम के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कस्टडी विवाद से जुड़े मामले में ये बातें कहीं, जिसमें बच्चा कथित तौर पर यौन शोषण का शिकार भी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का मकसद हर मामले में यांत्रिक रूप से लागू होने वाले संपूर्ण या कठोर दिशानिर्देश देना नहीं है। इसके बजाय, इनका मकसद बच्चों की मनोवैज्ञानिक भलाई से जुड़े ऐसे विवादों से निपटने वाली अदालतों की मदद करना है।
Case Title – Sheetal Vasant Thakur v. Chirag Arora
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'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आर्टिकल 226(1) के तहत रिट अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार करने का शायद ही कभी आधार बनता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत आमतौर पर तब लागू नहीं होगा, जब कोई वादी संविधान के आर्टिकल 226(1) के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करता है। यह आर्टिकल उस हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकारियों के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है।
'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत किसी ऐसी अदालत को, जिसके पास विवाद पर सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है, मामले की सुनवाई से इनकार करने की अनुमति देता है यदि किसी अन्य अदालत को मामले के निपटारे के लिए अधिक उपयुक्त या सुविधाजनक माना जाता है।
Case: Baksish Ahmad v. Union of India & Anr.
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'होममेकर देश निर्माता हैं': सुप्रीम कोर्ट ने होममेकर के योगदान को ₹30,000 प्रति माह आंका
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों में होममेकर (घर संभालने वाली महिला) द्वारा दी जाने वाली घरेलू देखभाल का नुकसान हर्जाने का एक अलग और मुआवजा-योग्य आधार है। कोर्ट ने ऐसी घरेलू सेवाओं का मूल्य कम-से-कम ₹30,000 प्रति माह तय किया।
मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने कहा कि होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए।
Case : SHISHUPAL @ SHISH RAM AND ORS. SURJEET AND ORS. v. SURJEET AND ORS | SLP(C) No. 33915/2025
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'पति-पत्नी की तरह साथ रहने की आज़ादी': दोषी और पीड़िता की शादी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत मिली सज़ा रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO Act), 2012 के तहत मिली सज़ा रद्द की। यह फ़ैसला तब लिया गया, जब आरोपी और पीड़िता ने शादी करके समझौता कर लिया और आरोपी ने पीड़िता को मुआवज़ा देने की पेशकश की।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंडुरकर की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सज़ा रद्द की। कोर्ट ने मामले की खास परिस्थितियों पर ध्यान दिया कि पीड़िता के बालिग होने के बाद आरोपी और पीड़िता ने शादी कर ली थी। कोर्ट ने आरोपी को पीड़िता को मुआवज़े के तौर पर 10,00,000 रुपये देने का भी आदेश दिया।
Case Details: MARUTHUPANDI v STATE REPRESENTED BY THE INSPECTOR OF POLICE & ANR|CRIMINAL APPEAL NO. OF 2026
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CAPF कर्मी सर्विस से जुड़े विवादों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट जा सकते हैं, भले ही मामला दिल्ली के बाहर का हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (CAPF) - जिसमें बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) भी शामिल है - के सदस्य सर्विस से जुड़े मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा तब भी किया जा सकता है, जब मामले की वजह दिल्ली के बाहर पैदा हुई हो, क्योंकि भारत सरकार और संबंधित फोर्स के हेडक्वार्टर राष्ट्रीय राजधानी में स्थित हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने BSF कॉन्स्टेबल बख्शीश अहमद की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह फैसला सुनाया। अहमद ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने "फोरम नॉन कन्वेनियंस" (यानी मामला सुनने के लिए सही जगह न होना) के आधार पर खारिज कर दिया था।
Case: Baksish Ahmad v. Union of India & Anr.
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एक ही मामले में सिविल और क्रिमिनल कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं, लेकिन उनके बीच बहुत ज़्यादा समय का अंतर नहीं होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक ही घटना या हालात पर सिविल केस शुरू होने के बाद FIR दर्ज करने में बेमतलब और बहुत ज़्यादा देरी होने पर क्रिमिनल केस को रद्द किया जा सकता है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, "...यह बताना ज़रूरी है कि अब यह कोई नया मुद्दा नहीं है कि एक ही वजह और एक ही घटना या हालात के आधार पर सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह की कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, अगर पीड़ित व्यक्ति सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह की कानूनी कार्रवाई करना चाहता है तो दोनों के शुरू होने के बीच बेमतलब या बहुत ज़्यादा समय का अंतर नहीं होना चाहिए।"
Cause Title: NAZIBUL RAHIM KHAN & ORS. VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH & ANR.
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आपसी सहमति से शादी से पहले बने शारीरिक संबंध को अकेले खराब चरित्र का सबूत नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस में नियुक्ति की मंज़ूरी दी
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को ऐसे उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश दिया, जिसे पुलिस कॉन्स्टेबल के तौर पर चुने जाने के बाद भी इसलिए हटा दिया गया, क्योंकि वह एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले में शामिल था। कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित बालिगों के बीच आपसी सहमति से शादी से पहले बने संबंधों को अकेले खराब नैतिक चरित्र का सबूत नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने गजुल थिरुपति की अपील को मंज़ूरी दी और तेलंगाना हाईकोर्ट के सिंगल जज का आदेश बहाल किया, जिसमें स्टिपेंडियरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कॉन्स्टेबल (SCTPC) के पद पर उनकी नियुक्ति पर फिर से विचार करने को कहा गया था।
Case Title: Gajula Thirupathi v. Telangana State Level Police Recruitment Board & Ors
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S. 138 NI Act | NGO की तरफ़ से चेक पर साइन करने वाले अधिकृत व्यक्ति को 'ड्रॉअर' माना जाएगा, बाउंस होने पर वही ज़िम्मेदार होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई कंपनी किसी व्यक्ति को अपनी तरफ़ से चेक जारी करने और उन पर साइन करने (जिसमें पेमेंट करने की ज़िम्मेदारी भी शामिल है) के लिए अधिकृत करती है तो ऐसे व्यक्ति को 'ड्रॉअर' माना जाएगा और उस पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत ज़िम्मेदारी लागू होगी।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने NGO के ट्रेज़रर की सज़ा बरकरार रखा। उन्हें NGO का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) नियुक्त किया गया था ताकि वह चेक जारी कर सकें, उन पर साइन कर सकें और MoU (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) के तहत संबंधित कंपनी को पेमेंट कर सकें। इसके अलावा, यह देखते हुए कि MoU में अपीलकर्ता के अलावा किसी अन्य पदाधिकारी पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं डाली गई, कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ही वह एकमात्र व्यक्ति है जो इसके सभी परिणामों के लिए ज़िम्मेदार होगा।
Cause Title: K RANGANAYAKULU VERSUS STATE OF TELANGANA & ORS.

