'पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की

Shahadat

12 Jun 2026 10:15 AM IST

  • पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की धारा 498A के तहत सज़ा रद्द की

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि पति ने 13 दिनों तक अपनी पत्नी से बात करने से इनकार किया, इसे किसी भी तरह से क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना आम बात है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है।

    इसके बाद जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत पति की सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की। कोर्ट ने उसका पासपोर्ट उसे वापस करने का आदेश भी दिया।

    कोर्ट ने कहा:

    "इसलिए किसी ठोस सबूत के बिना मरने वाली पत्नी से तेरह दिनों तक बातचीत न करने को इस मामले के तथ्यों के आधार पर किसी भी तरह से क्रूरता के दायरे में नहीं रखा जा सकता। वैवाहिक जीवन में मतभेद होना स्वाभाविक है और ऐसे मतभेदों के कारण बातचीत बंद हो सकती है, लेकिन यह ऐसा मामला भी नहीं है, जहां अपीलकर्ता और मरने वाली पत्नी के बीच कोई झगड़ा हुआ हो, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया हो।"

    संक्षेप में मामला

    अभियोजन पक्ष का आरोप था कि ओमान में रहने वाले पति के 13 दिनों तक पत्नी से बात न करने के कारण उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आरोप था कि पति को पत्नी का अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध अपने माता-पिता के घर जाना पसंद नहीं था। इसके कारण अपने माता-पिता के घर रह रही पत्नी को भारी मानसिक पीड़ा हुई और उसे यह कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    इन आरोपों के आधार पर 2015 में पति और उसके परिवार के खिलाफ धारा 498A और 304B के तहत मामला दर्ज किया गया। ट्रायल के दौरान, सभी को आरोपों से बरी किया गया, क्योंकि दहेज की मांग और उत्पीड़न के आरोप साबित नहीं हो सके। हालांकि, कोर्ट ने पति को क्रूरता के अपराध के लिए यह मानते हुए दोषी ठहराया कि उसका जानबूझकर किया गया व्यवहार ऐसा था, जिसने पत्नी को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। मद्रास हाईकोर्ट द्वारा उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट आर बसंत (पति की ओर से) ने ज़ोर देकर कहा कि पति को दोषी ठहराना सही नहीं है, क्योंकि उसे सिर्फ़ इसलिए दोषी ठहराया गया, क्योंकि उसने मरने वाली महिला से बात करने से इनकार किया। इसके विपरीत, सीनियर एडवोकेट बालाजी सुब्रमण्यम ने तर्क दिया कि पति के इसी व्यवहार के कारण पत्नी को गंभीर मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

    मानसिक प्रताड़ना क्या है, इस पर अलग-अलग फैसलों को देखने के बाद बेंच ने कहा कि यह हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। बेंच ने कहा कि मानसिक प्रताड़ना क्या है, यह तय करने का कोई तय नियम नहीं है, क्योंकि जो झगड़ा किसी के लिए मामूली हो सकता है, वही किसी दूसरे के लिए गंभीर मानसिक पीड़ा का कारण बन सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायत दर्ज कराने के कुछ समय पहले लगातार परेशान करना एक अहम बात हो सकती है।

    इस मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि पति और मृतक पत्नी के बीच बातचीत न होने के आरोप के कारण ही उसकी मौत हुई।

    कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने सिर्फ़ मृतक महिला के माता-पिता के ज़ुबानी बयान पर भरोसा किया कि पति उससे बात नहीं करता। उन्होंने इस तर्क को साबित करने के लिए व्हाट्सएप चैट का भी सहारा लिया कि अपीलकर्ता ने मृतक महिला को कोई मैसेज नहीं भेजा, इसलिए उनके बीच कोई बातचीत नहीं हुई।

    इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

    "अभियोजन पक्ष ने व्हाट्सएप चैट के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि अपीलकर्ता ने मृतक महिला को कोई मैसेज नहीं भेजा, इसलिए कोई बातचीत नहीं हुई। हालांकि, हमारी राय में व्हाट्सएप पर मैसेज न भेजना ही काफी नहीं है, क्योंकि बातचीत सामान्य फ़ोन कॉल के ज़रिए भी हो सकती थी।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया।

    Case Details: JAYESH KANNA v THE ASSISTANT COMMISSIONER LAW AND ORDER (WEST) ETC|CRIMINAL APPEAL NOS. 2382 - 2383 OF 2026

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