वसीयत के प्रमाणीकरण रद्द कराने की याचिका पर तीन वर्ष की सीमा लागू होगी, उत्तराधिकार कानून में अलग प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Amir Ahmad

12 Jun 2026 2:05 PM IST

  • वसीयत के प्रमाणीकरण रद्द कराने की याचिका पर तीन वर्ष की सीमा लागू होगी, उत्तराधिकार कानून में अलग प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में वसीयत के प्रमाणीकरण (प्रोबेट) रद्द कराने के लिए कोई अलग समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई। ऐसे मामलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 के तहत तीन वर्ष की समय-सीमा लागू होगी।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए धीरज दत्ता की अपील स्वीकार की और वर्ष 1995 में दिए गए प्रोबेट को रद्द कराने के लिए वर्ष 2022 में दायर आवेदन को समय-सीमा से परे बताया।

    अदालत ने कहा,

    "भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में न तो प्रोबेट प्रदान करने के लिए और न ही उसे रद्द कराने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित है। इसलिए ऐसे मामलों में परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 137 का सहारा लिया जाएगा।"

    मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा था। गौरीप्रोवा सेन को अपने पति से कुछ संपत्तियां विरासत में मिली थीं। उनकी मृत्यु से पहले 9 जुलाई 1989 को उन्होंने एक वसीयत बनाई, जिसमें अपने भतीजे धीरज दत्ता को एकमात्र निष्पादक और लाभार्थी नियुक्त किया। इस वसीयत का प्रोबेट सितंबर 1995 में प्रदान कर दिया गया।

    इसके बाद धीरज दत्ता ने राजस्व अभिलेखों में नामांतरण की कार्यवाही शुरू की। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया से संबंधित नोटिस वर्ष 2013 में प्रतिवादियों के पूर्वजों को भेजे गए।

    दूसरी ओर प्रतिवादियों का दावा था कि उन्हें प्रोबेट की जानकारी पहली बार वर्ष 2019 में मिली।

    इसके बाद उन्होंने संपत्ति को लेकर मुकदमा दायर किया और वर्ष 2022 में प्रोबेट रद्द कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।

    एकल पीठ ने इस आवेदन को समय-सीमा से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया था लेकिन खंडपीठ ने उसे स्वीकार कर लिया। इसके खिलाफ धीरज दत्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ का फैसला निरस्त करते हुए कहा कि प्रतिवादी यह नहीं कह सकते कि उन्हें वर्षों तक मामले की जानकारी नहीं थी, जबकि नामांतरण कार्यवाही के संबंध में उन्हें नोटिस मिल चुका था।

    अदालत ने कहा,

    "यदि किसी व्यक्ति को अदालत की ओर से नोटिस भेजा जाता है तो उससे कम से कम यह अपेक्षा की जाती है कि वह यह जानने का प्रयास करे कि नोटिस क्यों भेजा गया और उसे आगे क्या करना है।"

    पीठ ने माना कि नामांतरण कार्यवाही का नोटिस प्रतिवादियों के लिए रचनात्मक सूचना था। ऐसे में उन्हें यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए था कि नामांतरण किस आधार पर कराया जा रहा है और इसके पीछे प्रोबेट का आदेश है, या नहीं।

    अदालत ने कहा कि परिसीमा की गणना वर्ष 2019 से नहीं बल्कि उस समय से मानी जाएगी जब प्रतिवादियों को नामांतरण कार्यवाही की जानकारी मिली थी। इसलिए वर्ष 2022 में दायर प्रोबेट रद्द करने का आवेदन स्पष्ट रूप से समय-सीमा से बाहर है।

    निर्णय में कहा गया,

    "नामांतरण कार्यवाही का नोटिस रचनात्मक सूचना माना जाएगा। प्रतिवादियों को यह जानने का प्रयास करना चाहिए था कि यह कार्यवाही किस आधार पर शुरू हुई। किसी भी स्थिति में वर्ष 2022 में दायर आवेदन को वर्ष 2019 से समय-सीमा के भीतर नहीं माना जा सकता। प्रोबेट रद्द करने का आवेदन पूरी तरह समय-सीमा से परे है।"

    इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ का आदेश बहाल किया और प्रोबेट रद्द कराने की याचिका समय-सीमा से बाहर मानते हुए खारिज की।

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