खड़ी गाड़ी पर पेड़ गिरने से लगी चोट 'मोटर दुर्घटना' नहीं; MACT क्लेम नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
12 Jun 2026 10:43 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारी बारिश के दौरान सड़क किनारे खड़े ऑटो-रिक्शा पर पेड़ की टहनी गिरने से लगी चोटें, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत क्लेम के मकसद से "मोटर वाहन के इस्तेमाल" से हुई दुर्घटना नहीं मानी जाएंगी। फिर भी पीड़ित को लगी गंभीर चोटों को देखते हुए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उसे मिलने वाले मुआवज़े को ₹17.10 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें मुआवज़े की ज़िम्मेदारी नगर निगम, ऑटो-रिक्शा की बीमा कंपनी और राज्य बागवानी विभाग के बीच बांटी गई।
यह मामला जून 2007 की एक घटना से जुड़ा है, जब प्रतिवादी के.के. उमेश कुमार बेंगलुरु में क्वींस रोड से चिन्नास्वामी स्टेडियम तक ऑटो-रिक्शा में जा रहे थे। भारी बारिश के कारण गाड़ी सड़क किनारे रोक दी गई। जब गाड़ी एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ी थी तो पेड़ की एक टहनी टूटकर ऑटो-रिक्शा पर गिर गई, जिससे यात्री गंभीर रूप से घायल हो गया।
कोर्ट ने "दैवीय घटना" (Act of God) के सिद्धांत की जांच की और अंग्रेजी, अमेरिकी और भारतीय कानूनी फैसलों का अध्ययन किया। कोर्ट ने माना कि नगर निगम अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे सड़क किनारे लगे पेड़ों की देखभाल करें और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों से यह उम्मीद करना अव्यावहारिक होगा कि वे शहर के हर पेड़ पर लगातार नज़र रखें या सभी संभावित रूप से कमज़ोर टहनियों को हटा दें।
बेंच ने कहा,
"यह एक सच्चाई है कि भारत में लगातार हो रहे पलायन के कारण शहरों का दायरा बढ़ रहा है, इसलिए समय के साथ निगम द्वारा सेवा पाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। यह उम्मीद करना अव्यावहारिक होगा कि निगम के अधिकारी हर पेड़/झाड़ी पर लगातार नज़र रख सकें। इसी तरह हालांकि यह सोचना बिल्कुल सही है कि किसी पुराने पेड़ की पुरानी टहनी कभी भी टूटकर गिर सकती है, लेकिन समझदारी भरा कदम यह नहीं हो सकता कि आरी से सभी टहनियों को काट दिया जाए।"
बेंच ने कहा कि न तो पीड़ित का पेड़ के नीचे शरण लेने का फ़ैसला और न ही टहनी का गिरना, ऐसी बातें थीं, जिनका अंदाज़ा अधिकारी या ऑटो-रिक्शा ड्राइवर पहले से लगा सकते थे। इसलिए बेंच ने माना कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को ज़िम्मेदार ठहराना गलत होगा।
मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 165 और 166 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही पहले के फ़ैसलों में "मोटर वाहन के इस्तेमाल से होने वाली" बात का मतलब व्यापक रूप से निकाला गया हो, फिर भी दुर्घटना और मोटर वाहन के बीच कोई सीधा संबंध होना चाहिए। इस मामले में वाहन सिर्फ़ वह जगह थी जहाँ पीड़ित मौजूद था जब टहनी गिरी। अगर पीड़ित पैदल यात्री के तौर पर पेड़ के नीचे खड़ा होता, तब भी यह दुर्घटना हो सकती थी।
बेंच ने आगे कहा,
"इस शब्द की व्यापक व्याख्या को देखते हुए क्या ऑटो-रिक्शा में रेस्पॉन्डेंट की मौजूदगी को 'इस्तेमाल' माना जा सकता है? आम हालात में, शायद ऐसा माना जाता। लेकिन एक ऐसी स्थिति के बारे में सोचिए जहाँ रेस्पॉन्डेंट पैदल यात्री हो और तेज़ बारिश से बचने के लिए पेड़ के पास या नीचे खड़ा हो और तभी उस पर टहनी गिर जाए। यह पूरी तरह से मुमकिन स्थिति है। दूसरे शब्दों में दुर्घटना में मोटर वाहन की कोई सक्रिय भूमिका नहीं है। यह दुर्घटना के मुख्य कारणों में से एक नहीं है। इसलिए खास तौर पर धारा 166 के तहत दावा करना सही नहीं हो सकता है।"
दावा करने वाले के ख़िलाफ़ कानूनी मुद्दे का फ़ैसला होने के बावजूद, बेंच ने चिंता जताई कि पीड़ित, जिसे "जीवन बदलने वाली गंभीर चोटें" आई थीं, उसे एक और कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने नोट किया कि मेडिकल सबूतों से पता चला है कि दोनों निचले अंगों में पूरी तरह से पैराप्लेजिया (लकवा) हो गया। साथ ही ब्लैडर और बॉवेल पर नियंत्रण भी नहीं रहा।
यह देखते हुए कि हाई कोर्ट द्वारा दिया गया मुआवज़ा काफ़ी नहीं था, कोर्ट ने कुल मुआवज़े की रक़म बढ़ाकर ₹25 लाख की, जिसमें दावा याचिका दायर करने की तारीख़ से ब्याज भी शामिल है। ऐसा करते हुए कोर्ट ने BBMP, बीमा कंपनी और बागवानी विभाग के बीच ज़िम्मेदारी के बंटवारे पर हाई कोर्ट के फ़ैसले में कोई बदलाव नहीं किया। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को चार हफ़्ते के अंदर रक़म जमा करने का निर्देश दिया।
Case: The Commissioner, Bruhat Bangalore Mahanagara Palike v. K.K. Umesh Kumar & Ors.

