CAPF कर्मी सर्विस से जुड़े विवादों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट जा सकते हैं, भले ही मामला दिल्ली के बाहर का हो: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
10 Jun 2026 3:22 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (CAPF) - जिसमें बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) भी शामिल है - के सदस्य सर्विस से जुड़े मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा तब भी किया जा सकता है, जब मामले की वजह दिल्ली के बाहर पैदा हुई हो, क्योंकि भारत सरकार और संबंधित फोर्स के हेडक्वार्टर राष्ट्रीय राजधानी में स्थित हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने BSF कॉन्स्टेबल बख्शीश अहमद की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह फैसला सुनाया। अहमद ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने "फोरम नॉन कन्वेनियंस" (यानी मामला सुनने के लिए सही जगह न होना) के आधार पर खारिज कर दिया था।
कोर्ट ने कहा:
"हमारा मानना है कि अगर CAPF (जिसमें BSF भी शामिल है) का कोई सदस्य सक्षम अधिकारी द्वारा जारी अपनी सर्विस खत्म करने के किसी प्रशासनिक आदेश से परेशान है तो भले ही मामले की वजह दिल्ली के बाहर पैदा हुई हो... फिर भी दिल्ली हाईकोर्ट के पास टेरिटोरियल अधिकार क्षेत्र (क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र) होगा, क्योंकि भारत सरकार और डायरेक्टर जनरल के ऑफिस वहीं स्थित हैं।"
अपीलकर्ता 2010 में BSF कॉन्स्टेबल के तौर पर भर्ती हुआ था। उसको अक्टूबर 2022 में सर्विस से बर्खास्त कर दिया गया। स्टाफ कोर्ट ऑफ़ इंक्वायरी में पाया गया कि उसने अपनी पहली शादी के रहते हुए और सक्षम अधिकारी से ज़रूरी इजाज़त लिए बिना दूसरी शादी की थी। बर्खास्तगी के खिलाफ उसकी कानूनी याचिका को बाद में इंस्पेक्टर जनरल, BSF, जम्मू ने खारिज कर दिया।
दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए अहमद दिल्ली हाईकोर्ट गए। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। कोर्ट का कहना था कि संबंधित घटनाएं पश्चिम बंगाल (जहां उसे बर्खास्त किया गया) और जम्मू-कश्मीर (जहां उसकी कानूनी याचिका खारिज की गई) में हुई थीं। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली सही जगह नहीं है और उसे उन जगहों पर अधिकार क्षेत्र रखने वाले कोर्ट में जाने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि संविधान के आर्टिकल 226(1) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र है, क्योंकि डायरेक्टर जनरल, BSF और गृह मंत्रालय के ऑफिस दिल्ली में स्थित हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 'अबरार अली बनाम CISF' मामले के पुराने फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें सर्विस से जुड़े ऐसे ही एक मामले को दिल्ली हाईकोर्ट में वापस भेजा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास इस मामले में अधिकार-क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) है। अबरार अली मामले का ज़िक्र करते हुए, बेंच ने कहा कि भारत सरकार और BSF के डायरेक्टर जनरल इस कार्यवाही में ज़रूरी पक्ष हैं और दोनों ही दिल्ली में स्थित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि BSF नियमों के तहत जारी हर बर्खास्तगी के आदेश की जानकारी डायरेक्टर जनरल को देना ज़रूरी है।
यह मानते हुए कि अपील करने वाला व्यक्ति 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमे की वजह) के अलग-अलग हिस्सों के आधार पर कलकत्ता हाईकोर्ट, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट या इलाहाबाद हाईकोर्ट भी जा सकता था, कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 226(1) के तहत दिल्ली भी एक सही फोरम (अदालत) थी।
बेंच ने यह भी कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकार-क्षेत्र से इनकार करने के लिए 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' (असुविधाजनक अदालत) के सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत - जिसके तहत कोई अदालत किसी मामले की सुनवाई से इनकार कर सकती है अगर कोई दूसरी अदालत ज़्यादा सही हो - आर्टिकल 226 के तहत रिट कार्यवाही में बहुत कम लागू होता है, खासकर तब जब अधिकार-क्षेत्र प्रतिवादी अधिकारियों की लोकेशन पर आधारित हो।
कोर्ट ने कहा,
"जब संवैधानिक उपाय पाने का सवाल हो और रिट अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल आर्टिकल 226 के क्लॉज़ (1) के तहत किया जा रहा हो तो 'फोरम नॉन कन्वेनियंस' का सिद्धांत शायद ही कभी लागू होता है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि प्रतिवादियों के लिए सुविधाजनक अदालत चुनने के बावजूद किसी मुक़दमेबाज़ को दूसरी अदालत जाने के लिए कहना न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय न्याय तक पहुँच से वंचित कर सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अहमद की रिट याचिका को मेरिट के आधार पर सुनवाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में बहाल किया। प्रतिवादियों को अपना काउंटर-एफिडेविट (जवाब) दाखिल करने के लिए दो महीने का समय दिया गया, जबकि अपीलकर्ता उसके बाद एक महीने के भीतर रिजॉइंडर (जवाब का जवाब) दाखिल कर सकता है।
Case: Baksish Ahmad v. Union of India & Anr.

