सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
19 April 2026 12:15 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (13 अप्रैल, 2026 से 17 अप्रैल, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
बिना भर्ती विज्ञापन या इंटरव्यू के नियुक्त एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला आंशिक रूप से रद्द किया। इस फैसले में हरियाणा सरकार की उन नीतियों के एक समूह को रद्द कर दिया गया था, जिनका मकसद कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एड-हॉक और दिहाड़ी मज़दूरी वाले कर्मचारियों को पक्का करना था। कोर्ट ने 16 जून, 2014 और 18 जून, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन 7 जुलाई, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन रद्द किए।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने पाया कि जुलाई 2014 के नोटिफिकेशन उन एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का करने की कोशिश कर रहे थे, जिनकी नियुक्ति किसी सार्वजनिक विज्ञापन के ज़रिए शुरू की गई उचित भर्ती प्रक्रिया के तहत नहीं हुई। इस तरह ये नोटिफिकेशन 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी (2006)' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे थे।
Case Title – Madan Singh and Ors. v. State of Haryana and Ors.
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ज़मानत की शर्त के तौर पर आरोपी की संपत्ति बेचने का आदेश नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत की शर्तें दंडात्मक या निर्णायक प्रकृति की नहीं होनी चाहिए, और वे किसी आरोपी को ज़मानत की शर्त के तौर पर उसकी संपत्ति बेचने की मांग करके, उसकी संपत्ति का इस्तेमाल करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकतीं।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। उस आदेश में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के मामले में ज़मानत देने की शर्त के तौर पर आरोपी की अचल संपत्तियों को बेचने की शर्त रखी गई।
Cause Title: FEROZE BASHA & ANR. VERSUS STATE OF TAMIL NADU
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मकान मालिक की वास्तविक ज़रूरत का आकलन बेदखली याचिका दायर करने की तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बेदखली याचिकाओं में, मकान मालिक की वास्तविक ज़रूरत का फैसला आम तौर पर उस तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए, जिस तारीख को बेदखली का मुकदमा दायर किया गया; बशर्ते कि बाद में हुई किसी घटना से राहत के आधार में कोई बड़ा बदलाव न आ जाए। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने 31 साल पुराने बेदखली के एक विवाद को नए सिरे से विचार करने के लिए ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें मकान मालिक की रिट याचिका खारिज की गई थी। बेंच ने यह माना कि हाईकोर्ट इस बात पर ठीक से विचार करने में नाकाम रहा कि किरायेदार द्वारा जिन बाद की घटनाओं का हवाला दिया गया, उनका मकान मालिक के बेदखली के अधिकार पर कोई बड़ा असर पड़ा या नहीं।
Cause Title: MARIA MARTINS VERSUS NOEL ZUZARTE AND OTHERS
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CPC के Order II Rule 2 के तहत वर्जित होने के आधार पर Order VII Rule 11 के तहत वाद-पत्र खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के संबंध में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी वाद-पत्र को CPC के Order VII Rule 11 के तहत इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह वाद CPC के Order II Rule 2 के तहत वर्जित है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि वाद-पत्र खारिज करने के आवेदन पर निर्णय लेते समय जांच सख्ती से केवल वाद-पत्र में किए गए कथनों तक ही सीमित होनी चाहिए। इस चरण पर अदालतों के लिए यह अनुमेय नहीं है कि वे अभिवचनों (Pleadings) की विस्तृत तुलना करें या यह जांचें कि क्या कोई बाद का वाद Order II Rule 2 के तहत वर्जित है, क्योंकि ऐसे निर्धारण के लिए साक्ष्य की आवश्यकता होती है और इसका निर्णय प्रारंभिक चरण में नहीं किया जा सकता।
Cause Title: S. VALLIAMMAI & OTHERS VERSUS S. RAMANATHAN & ANOTHER
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पति के खिलाफ दहेज लेने की शिकायत के आधार पर पत्नी और उसके परिवार पर 'दहेज देने' के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि किसी महिला या उसके परिवार के सदस्यों पर 'दहेज लेने वालों' के खिलाफ अपनी शिकायत में किए गए दावों के आधार पर 'दहेज देने' के लिए दहेज निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की थी।
Cause Title: Rahul Gupta versus Station House Officer and others
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Air Force Act | एक ही आरोप पर आपराधिक मुकदमे में बरी हुए अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 अप्रैल) को कहा कि एक बार जब रक्षा बलों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के बजाय आपराधिक कार्रवाई को जारी रखने का फैसला कर लिया हो तो आपराधिक कार्रवाई में बरी होने के बाद उस रक्षा कर्मी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने पूर्व-वायु सेना कर्मी का सम्मान बहाल किया। उन्हें लगभग तीन दशक बाद सेवा से जुड़े सभी लाभ दिए गए; उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई में बरी होने के बाद भी अनुशासनात्मक जांच की गई थी।
Cause Title: EX. SQN. LDR. R. SOOD VS. UNION OF INDIA & ORS.
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जिन दोषियों को सिर्फ़ जुर्माने की सज़ा मिली, वे भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम' के फ़ायदे के हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जिन अपराधियों को सिर्फ़ जुर्माना भरने की सज़ा दी गई, उन्हें भी 'अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958' की धारा 4 के तहत परिवीक्षा (प्रोबेशन) का फ़ायदा दिया जा सकता है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उन दोषियों को रिहा करने का आदेश दिया, जिन्हें मारपीट के आरोप में IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 323 और 324 के तहत दोषी ठहराया गया। साथ ही उन्हें बिना किसी ठोस सज़ा के, सिर्फ़ 500 से 2,000 रुपये का जुर्माना भरने की सज़ा दी गई।
Cause Title: MILIND S/O ASHRUBA DHANVE AND ORS. VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA
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आपसी सहमति से तलाक के लिए समझौते के बाद सहमति वापस नहीं ले सकता जीवनसाथी : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई।
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S.156(3) CrPC/S.175(3) BNSS | आरोपी के बचाव पर भरोसा करके मजिस्ट्रेट के जांच का आदेश रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित पुलिस जांच को तब तक नहीं रोक सकते, जब तक कि शिकायत में पहली नज़र में कोई संज्ञेय अपराध सामने न आता हो।
कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर कोर्ट को शिकायत में लगाए गए आरोपों और शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री तक ही सीमित रहना चाहिए। साथ ही आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच करने के लिए उनसे आगे नहीं जाना चाहिए।
Cause Title : ACCAMMA SAM JACOB VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR. ETC.
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West Bengal SIR | जिन लोगों की अपीलें पेंडिंग, उन्हें 2026 के चुनावों में वोट देने की इजाज़त नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस बात पर हिचकिचाहट ज़ाहिर की कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए , उन्हें आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वोट देने की इजाज़त दी जाए, जबकि उनकी अपीलें अभी अपीलीय ट्रिब्यूनलों के सामने पेंडिंग हैं। पिछले हफ़्ते भी कोर्ट ने कुछ ऐसी ही राय ज़ाहिर की थी।
हालांकि, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह उस अर्ज़ी पर विचार कर सकता है, जिसमें सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी करने की इजाज़त मांगी गई ताकि उन लोगों को शामिल किया जा सके, जिनकी अपीलें विधानसभा चुनावों से पहले मंज़ूर हो जाती हैं। ये चुनाव 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होने हैं।
Case Title – Mostari Banu v. Election Commission of India and Ors and connected cases.
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अदालतें अवमानना क्षेत्राधिकार में पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला नहीं दे सकतीं, सिर्फ़ पालन की जांच कर सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते समय संबंधित अदालतों के लिए यह गलत है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर उन मुद्दों पर दोबारा फैसला दें, जो मूल कार्यवाही में पहले ही तय हो चुके हैं। उन्हें खुद को सिर्फ़ बाध्यकारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने तक ही सीमित रखना चाहिए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "अवमानना कार्यवाही में क्षेत्राधिकार सिर्फ़ जारी किए गए निर्देशों के पालन की जांच करने तक ही सीमित है। यह उन मुद्दों पर दोबारा फैसला देने तक नहीं फैलता जो पहले ही तय हो चुके हैं।"
Cause Title: JALIM SINGH VERSUS NAND KISHORE & ORS.
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वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर दोहराया कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन है, जैसे कि योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतों के मामले में।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने राजस्थान में ज़िला दुग्ध संघों से जुड़े एक चुनावी विवाद पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

