मकान मालिक की वास्तविक ज़रूरत का आकलन बेदखली याचिका दायर करने की तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
17 April 2026 5:12 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बेदखली याचिकाओं में, मकान मालिक की वास्तविक ज़रूरत का फैसला आम तौर पर उस तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए, जिस तारीख को बेदखली का मुकदमा दायर किया गया; बशर्ते कि बाद में हुई किसी घटना से राहत के आधार में कोई बड़ा बदलाव न आ जाए। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने 31 साल पुराने बेदखली के एक विवाद को नए सिरे से विचार करने के लिए ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें मकान मालिक की रिट याचिका खारिज की गई थी। बेंच ने यह माना कि हाईकोर्ट इस बात पर ठीक से विचार करने में नाकाम रहा कि किरायेदार द्वारा जिन बाद की घटनाओं का हवाला दिया गया, उनका मकान मालिक के बेदखली के अधिकार पर कोई बड़ा असर पड़ा या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
बेदखली का यह मुकदमा 1994 में मकान मालिक के कानूनी वारिसों द्वारा दायर किया गया। इसमें मुंबई स्थित एक जगह से एक सब-किरायेदार (उप-किरायेदार) को बेदखल करने की मांग की गई, जिसका आधार 'वास्तविक ज़रूरत' बताया गया। ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालते हुए बेदखली का आदेश जारी कर दिया कि वह जगह मकान मालिक की बुज़ुर्ग विधवा की निजता और रहने की ज़रूरतों के लिए आवश्यक थी।
हालांकि, अपीलीय कोर्ट ने इस आदेश को पलट दिया। इसका मुख्य आधार यह था कि विधवा का बाद में निधन हो गया। इसलिए 'कथित वास्तविक ज़रूरत' अब बाकी नहीं रह गई। मकान मालिक ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।
रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान, सब-किरायेदारों ने एक हलफनामा दायर किया। इसमें उन्होंने कहा कि मकान मालिक के कब्ज़े में मौजूद एक अन्य कमरा किसी तीसरे पक्ष को किराये पर दे दिया गया। हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की। कोर्ट ने यह पाया कि मकान मालिक ने इस हलफनामे के जवाब में कोई प्रति-हलफनामा (Rejoinder) दायर नहीं किया था। साथ ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मकान मालिक को उस जगह की वास्तव में कोई ज़रूरत नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हालांकि अदालतों के पास बाद में हुई घटनाओं पर संज्ञान लेने का अधिकार होता है, लेकिन ऐसी घटनाओं पर तभी विचार किया जा सकता है, जब उनका स्वरूप और प्रभाव इतना बड़ा हो कि वे मांगी गई राहत पर कोई बड़ा असर डालें, या मकान मालिक की ज़रूरत की वास्तविकता पर ही सवाल खड़ा कर दें।
कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने केवल किरायेदार के हलफनामे के आधार पर रिट याचिका खारिज करके गलती की। कोर्ट को रिकॉर्ड पर मौजूद पूरी सामग्री की जाँच-पड़ताल करने के बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए था। अदालत ने माना कि हलफनामे को ही एकमात्र आधार बनाकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मकान मालिक को 'वास्तविक ज़रूरत' (bona fide need) नहीं थी; ऐसा निष्कर्ष निकालने से पहले यह आकलन करना ज़रूरी था कि क्या कथित बाद की घटना ने बेदखली के दावे में कोई महत्वपूर्ण बदलाव किया।
'मगनलाल बनाम किशनलाल गोधा' और 'नानासाहेब बनाम उधाओराव गाडेवार' मामले का हवाला देते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
"मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद से निपटते समय यह माना गया कि 'वास्तविक ज़रूरत' का फैसला उस तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए, जिस तारीख को बेदखली का मुकदमा दायर किया गया। बशर्ते कि कोई बाद की घटना राहत के आधार में कोई महत्वपूर्ण बदलाव न कर दे। इसके अलावा, यह भी माना गया कि बाद की घटनाओं को मकान मालिक की ज़रूरत की वास्तविकता पर भारी तभी माना जा सकता है, जब वे इस तरह की प्रकृति और दायरे की हों कि वे उस ज़रूरत के महत्व को पूरी तरह से खत्म कर दें।"
अदालत ने माना कि हाईकोर्ट यह विचार करने में विफल रहा कि क्या प्रतिवादियों द्वारा उठाई गई बाद की घटना का, वादियों द्वारा दावा किए गए अधिकार पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा था।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि हाईकोर्ट ने तकनीकी आधारों पर अपीलकर्ता की रिट याचिका खारिज करके गलती की है; ऐसा करते समय अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों का संदर्भ नहीं लिया, जबकि ट्रायल के दौरान अपीलकर्ताओं की 'वास्तविक ज़रूरत' पहले ही साबित हो चुकी थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
"...हमारा यह मत है कि रिट याचिका को केवल इस आधार पर खारिज करना उचित नहीं था कि मूल वादी, प्रतिवादियों के जवाब में दिए गए हलफनामे पर कोई 'जवाबी हलफनामा' (Rejoinder) दायर करने में विफल रहे... रिट याचिका पर फैसला सुनाते समय, दोनों पक्षों द्वारा रिकॉर्ड पर लाई गई सभी प्रासंगिक सामग्रियों की जांच की जानी चाहिए थी।"
हाईकोर्ट द्वारा रिकॉर्ड पर उपलब्ध संपूर्ण सामग्री को ध्यान में न रखने के संबंध में अदालत ने टिप्पणी की कि "ऐसा न करके हाईकोर्ट ने बेदखली के आदेश (Decree) को पलटने की चुनौती पर फैसला सुनाते समय, अपने निहित क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में चूक की।"
अदालत ने कहा,
"इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक है।"
तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और मामले को 'लघु वाद न्यायालय' (Small Causes Court) में वापस भेज दिया गया ताकि उस पर नए सिरे से फैसला सुनाया जा सके। साथ ही पक्षकारों को अपने लिखित कथनों (Pleadings) में संशोधन करने और अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति भी दी गई।
न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह पक्षों के उपस्थित होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर वाद का निर्णय करने का प्रयास करे। साथ ही यह स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है, तथा सभी मुद्दों को विधि के अनुसार निर्धारण के लिए खुला रखा है।
Cause Title: MARIA MARTINS VERSUS NOEL ZUZARTE AND OTHERS

