अदालतें अवमानना ​​क्षेत्राधिकार में पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला नहीं दे सकतीं, सिर्फ़ पालन की जांच कर सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

13 April 2026 4:15 PM IST

  • अदालतें अवमानना ​​क्षेत्राधिकार में पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला नहीं दे सकतीं, सिर्फ़ पालन की जांच कर सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना ​​क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते समय संबंधित अदालतों के लिए यह गलत है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर उन मुद्दों पर दोबारा फैसला दें, जो मूल कार्यवाही में पहले ही तय हो चुके हैं। उन्हें खुद को सिर्फ़ बाध्यकारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने तक ही सीमित रखना चाहिए।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,

    "अवमानना ​​कार्यवाही में क्षेत्राधिकार सिर्फ़ जारी किए गए निर्देशों के पालन की जांच करने तक ही सीमित है। यह उन मुद्दों पर दोबारा फैसला देने तक नहीं फैलता जो पहले ही तय हो चुके हैं।"

    बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता-कर्मचारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अनुकूल आदेश मिलने के बावजूद—जिसमें उसे निलंबन अवधि के लिए पूरा वेतन और भत्ते देने का निर्देश था—उसे उसके रिटायरमेंट के बकाए का भुगतान नहीं किया गया, जिससे उसे हाईकोर्ट में अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों के पालन को सुनिश्चित करने तक अपनी जांच को सीमित रखने के बजाय मुद्दों पर दोबारा फैसला देते हुए और अपीलकर्ता को रिटायरमेंट लाभों के लिए अयोग्य ठहराते हुए अवमानना ​​याचिका खारिज की।

    वास्तव में, हाईकोर्ट ने अवमानना ​​क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए अपीलकर्ता को वेतन और रिटायरमेंट लाभ देने वाले अपने ही पहले का फैसला पलट दिया।

    हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हु, कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    विवादित आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि अवमानना ​​क्षेत्राधिकार का दायरा सिर्फ़ पहले के निर्देशों के पालन की जांच करने तक ही सीमित है। फिर यह पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला देने की अनुमति नहीं देता है।

    कोर्ट ने कहा कि जब पहले के आदेश में पात्रता, समायोजन या योग्यताओं से जुड़े सवालों की जांच की जा चुकी थी, तो अवमानना ​​क्षेत्राधिकार में उन पर दोबारा फैसला देना गलत था।

    कोर्ट ने कहा,

    "...हाईकोर्ट के लिए यह गलत था कि वह अवमानना ​​क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए अपीलकर्ता के क्लास-III पद पर नियमितीकरण या समायोजन से जुड़े मुद्दों की दोबारा जांच करके जांच के दायरे को बढ़ाए।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "इसलिए हाईकोर्ट ने ऐसे सवालों में पड़कर गलती की; उसे इसके बजाय अपने उन निर्देशों को लागू करना चाहिए था, जिनमें प्रतिवादी-बैंक को अपीलकर्ता को उसके रिटायरमेंट की तारीख तक का बकाया वेतन और भत्ते, साथ ही कोऑपरेटिव सुपरवाइजर या समकक्ष पद से जुड़े रिटायरमेंट के बाद के सभी बकाए और लाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।"

    तदनुसार, अपील स्वीकार की गई। लाभों को बहाल करने के अलावा, न्यायालय ने अपीलकर्ता को प्रतिवादी-बैंक द्वारा की गई लंबी और अनावश्यक मुकदमेबाजी के लिए मुआवज़े के तौर पर 1 लाख रुपये देने का भी आदेश दिया।

    Cause Title: JALIM SINGH VERSUS NAND KISHORE & ORS.

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