हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
14 Jun 2026 9:00 AM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (08 जून, 2026 से 12 जून, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मी नियमित कर्मचारियों के समान तैनाती का दावा नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि दैनिक वेतनभोगी (Daily Wagers) या संविदा/समेकित वेतन (Consolidated Basis) पर नियुक्त कर्मचारी किसी सरकारी कंपनी के बंद होने के बाद अन्य सरकारी विभागों में तैनाती (Deployment) के लिए नियमित या स्थायी कर्मचारियों के समान अधिकार का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने यह फैसला जम्मू एंड कश्मीर सीमेंट लिमिटेड (JKCL) के एक कर्मचारी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने नियमितीकरण, नियमित वेतनमान, अन्य सरकारी विभाग में तैनाती और बकाया वेतन के भुगतान की मांग की थी।
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240 दिन की लगातार सर्विस वाले वर्कर को बिना नोटिस नौकरी से निकालना गैर-कानूनी: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की डिवीज़न बेंच ने कहा कि जिस वर्कर ने 240 दिन की लगातार सर्विस पूरी की है, उसे बिना अनुशासनात्मक कार्रवाई या नोटिस के नौकरी से निकालना गैर-कानूनी है। ऐसे मामले में यह नहीं माना जा सकता कि उसने खुद नौकरी छोड़ी है।
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राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश: आसाराम को जेल में पहले के आदेशों के तहत मिल रही मेडिकल सुविधाएं जारी रहेगी
राजस्थान हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि रेप के दोषी आसाराम को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों के तहत जो भी सुविधाएं, रहने की व्यवस्था, मंज़ूरियां और मेडिकल इंतज़ाम दिए गए, वे सभी उसकी सज़ा के ख़िलाफ़ अपील खारिज होने के बाद भी उसी तरह जारी रहेंगे।
आसाराम ने हाईकोर्ट में कुछ ऐसी सुविधाएं और रहने की व्यवस्थाएं फिर से शुरू करने की मांग की, जो उसे पहले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के तहत उसकी उम्र और मेडिकल स्थिति को देखते हुए दी गईं। साथ ही उसने कुछ अतिरिक्त सुविधाओं की भी मांग की। उसने दावा किया कि आपराधिक अपील पूरी होने के बाद - जिसमें हाईकोर्ट ने पिछले महीने 2013 में अपने जोधपुर आश्रम में एक नाबालिग के यौन उत्पीड़न और रेप के लिए उसकी सज़ा और उम्रकैद बरकरार रखी - ये सुविधाएं वापस ले ली गईं।
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लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक काम उनके भाई के खिलाफ शिकायत होने पर भी किसी और को नहीं सौंपे जा सकते: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने लोकायुक्त के अपने ही भाई के खिलाफ आरोपों से जुड़ी कार्यवाही में लोकायुक्त द्वारा पारित एक आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि 'ज़रूरत का सिद्धांत' (doctrine of necessity) तब लागू होता है, जब लोकायुक्त का पद एक-सदस्यीय संस्था हो और झारखंड लोकायुक्त अधिनियम, 2001 के तहत पद के मुख्य न्यायिक काम किसी और को नहीं सौंपे जा सकते हों।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में झारखंड के लोकायुक्त द्वारा 30.04.2012 को पारित आदेश रद्द करने की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की भी मांग की थी कि लोकायुक्त ने झारखंड लोकायुक्त अधिनियम, 2001 की धारा 3(2) और अनुसूची I के तहत पद की शपथ का उल्लंघन किया। आरोप है कि उन्होंने अधिनियम की धारा 19 के तहत मामले को किसी और को सौंपने के बजाय प्रतिवादी नंबर 3 (जो कथित तौर पर उनका अपना भाई है) से जुड़ी शिकायत पर खुद फैसला किया।
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RTI के तहत सरकारी कर्मचारी के वित्तीय मामलों का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं, जब तक कि कोई बड़ा जनहित न हो: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने RTI आवेदक की याचिका खारिज की। आवेदक ने राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के पूर्व डिप्टी कंट्रोलर (सरकारी कर्मचारी) की संपत्ति और देनदारियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि मांगी गई जानकारी निजी थी और उसका किसी जनहित से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए यह RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित है। कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक कार्यों, फैसलों, सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और लोक प्रशासन से सीधे जुड़े मामलों की स्थिति अलग होगी।
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'कानून का घोर दुरुपयोग': विदेशी फंडिंग मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ रद्द की FIR और ED केस
दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी फंडिंग के आरोपों पर न्यूज़ पोर्टल NewsClick और उसके एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ EOW की FIR और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ECIR रद्द की। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि अगर FIR में लगाए गए आरोपों को पूरी तरह मान भी लिया जाए तो भी IPC की धारा 406 और 420 के तहत अपराध के ज़रूरी तत्व नहीं बनते हैं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी कीं गाइडलाइंस: गैर-कानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारियों से वसूला जाएगा मुआवज़ा
एक अहम फ़ैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह उन नागरिकों को ₹25,000 प्रति दिन का मुआवज़ा दे, जिन्हें BNSS के तहत शांति भंग करने के आरोप में प्रिवेंटिव डिटेंशन के प्रावधानों के तहत 24 घंटे से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखा गया। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने आगे निर्देश दिया कि यह मुआवज़ा सीधे दोषी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाना चाहिए।
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अपराध में संलिप्तता साबित किए बिना बैंक खाता फ्रीज करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के बैंक खाते को डी-फ्रीज करने का आदेश देते हुए कहा कि जांच एजेंसियों को बैंक खाते फ्रीज करने का अधिकार है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग उचित, आनुपातिक और कानूनी तरीके से किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि संदिग्ध राशि का स्पष्ट निर्धारण किए बिना या खाताधारक की किसी आपराधिक गतिविधि में संलिप्तता स्थापित किए बिना पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।
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हर कब्र/दरगाह स्वयं वक्फ़ संपत्ति नहीं बन जाती, सिर्फ़ मुस्लिम धार्मिक कार्यों के लिए इस्तेमाल होने के कारण बोर्ड उस पर कब्ज़ा नहीं कर सकता: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 240 साल पुरानी दरगाह को वक्फ प्रॉपर्टी घोषित किया गया। जस्टिस गोविंदराजन थिलाकवथी ने कहा कि किसी प्रॉपर्टी को वक्फ प्रॉपर्टी घोषित करने के लिए वक्फ एक्ट में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार उसका सर्वे और नोटिफिकेशन होना ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा कि हर कब्र या दरगाह को वक्फ प्रॉपर्टी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए किसी बंदोबस्त (एंडोमेंट) का होना ज़रूरी है। कोर्ट ने आगे कहा कि वक्फ बोर्ड सिर्फ इसलिए अधिकार क्षेत्र का दावा नहीं कर सकता कि प्रॉपर्टी एक मुस्लिम धार्मिक संस्थान है।
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'संविधान के बजाय शासकों के प्रति वफादारी, कानून के शासन को परेशानी माना जाता है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी नौकरशाही की कड़ी आलोचना की
इस हफ़्ते जारी अपने तीसरे ऐसे आदेश में, जिसमें उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के हालात पर कड़ी टिप्पणियां की गईं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर राज्य के प्रशासनिक तंत्र की तीखी आलोचना की। अपने 31 पन्नों के आदेश में जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश ऐतिहासिक रूप से राजनेताओं और नौकरशाहों की "सामंती मानसिकता" से चलता रहा है। इसने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का साधन बना दिया है।
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'एनकाउंटर में हत्याएं, चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई': हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को टारगेटेड कार्रवाई के लिए फटकारा, गैंगस्टर एक्ट के गलत इस्तेमाल पर उठाए सवाल
एक सिविल विवाद को लेकर परिवार के 3 सदस्यों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश पुलिस को 'उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986' (UAPA) के टारगेटेड इस्तेमाल के लिए कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि कैसे एनकाउंटर में हत्याएं और 'असुविधाजनक' माने जाने वाले लोगों के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई समय-समय पर कोर्ट के ध्यान में आती रही हैं।
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दो साल बाद बिना किसी धोखाधड़ी सबूत के भवन निर्माण की अनुमति रद्द नहीं कर सकता निगम: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम द्वारा जारी भवन निर्माण अनुमति निरस्तीकरण और ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) नोटिस को रद्द करते हुए कहा कि एक बार सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से भवन निर्माण की अनुमति दिए जाने और उसके आधार पर निर्माण कार्य हो जाने के बाद, धोखाधड़ी या तथ्य छिपाने का कोई प्रमाण न होने पर अनुमति वापस नहीं ली जा सकती।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने कहा कि बिना किसी धोखाधड़ी के सबूत के, नागरिक द्वारा भारी निवेश कर निर्माण किए जाने के बाद अनुमति रद्द करना मनमाना, अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है।

