लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक काम उनके भाई के खिलाफ शिकायत होने पर भी किसी और को नहीं सौंपे जा सकते: झारखंड हाईकोर्ट

Shahadat

11 Jun 2026 9:10 PM IST

  • लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक काम उनके भाई के खिलाफ शिकायत होने पर भी किसी और को नहीं सौंपे जा सकते: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने लोकायुक्त के अपने ही भाई के खिलाफ आरोपों से जुड़ी कार्यवाही में लोकायुक्त द्वारा पारित एक आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि 'ज़रूरत का सिद्धांत' (doctrine of necessity) तब लागू होता है, जब लोकायुक्त का पद एक-सदस्यीय संस्था हो और झारखंड लोकायुक्त अधिनियम, 2001 के तहत पद के मुख्य न्यायिक काम किसी और को नहीं सौंपे जा सकते हों।

    जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में झारखंड के लोकायुक्त द्वारा 30.04.2012 को पारित आदेश रद्द करने की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की भी मांग की थी कि लोकायुक्त ने झारखंड लोकायुक्त अधिनियम, 2001 की धारा 3(2) और अनुसूची I के तहत पद की शपथ का उल्लंघन किया। आरोप है कि उन्होंने अधिनियम की धारा 19 के तहत मामले को किसी और को सौंपने के बजाय प्रतिवादी नंबर 3 (जो कथित तौर पर उनका अपना भाई है) से जुड़ी शिकायत पर खुद फैसला किया।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्होंने पहले 2003 में चांसलर द्वारा जारी आदेश के तहत रांची विश्वविद्यालय में ऑडिट ऑफिसर के तौर पर काम किया। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन प्रो-वाइस-चांसलर द्वारा परेशान किए जाने और अपमानित किए जाने के कारण नौकरी से इस्तीफा देने के बाद हाईकोर्ट में बार-बार कानूनी लड़ाई लड़ने के बावजूद उनका बकाया भुगतान नहीं किया गया।

    याचिकाकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि इस दौरान रांची विश्वविद्यालय में UGC फंड के बड़े पैमाने पर गबन की खबरें सामने आईं। कोतवाली पुलिस स्टेशन केस नंबर 364/2010 में FIR और ज़ब्ती सूची की कॉपी मिलने के बाद उन्हें पता चला कि प्रतिवादी नंबर 3 कथित तौर पर इन वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने लोकायुक्त से संपर्क किया और कथित गबन तथा प्रतिवादी नंबर 3 की भूमिका की जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) या अकाउंटेंट जनरल से कराने की मांग की।

    हालांकि, 30.04.2012 के आदेश से लोकायुक्त ने शिकायत खारिज की। उन्होंने कहा कि मामला पहले से ही पुलिस जांच के दायरे में है और लोकायुक्त के पास CBI या अकाउंटेंट जनरल जैसी केंद्रीय एजेंसियों को जांच का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक्ट की धारा 19 और धारा 13(3)(ii) के तहत लोकायुक्त को शक्तियां सौंपने (डेलिगेट करने) का अधिकार है। इसलिए, इस मामले को किसी और को सौंपा जाना चाहिए, क्योंकि प्रतिवादी नंबर 3 लोकायुक्त का अपना भाई है। यह भी तर्क दिया गया कि शक्तियां सौंपने से इनकार करना पक्षपात को दर्शाता है और पद की वैधानिक शपथ का उल्लंघन है।

    याचिका का विरोध करते हुए लोकायुक्त की ओर से पेश वकील ने कहा कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसमें केवल यह कहा गया कि लोकायुक्त के पास केंद्रीय एजेंसियों को जांच का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है और इससे प्रतिवादी नंबर 3 को कोई लाभ नहीं मिलता। यह भी तर्क दिया गया कि एक्ट की धारा 13(3) के तहत लोकायुक्त जांच के लिए केवल राज्य सरकार के अधिकारियों या एजेंसियों का उपयोग कर सकते हैं, और वह भी राज्य सरकार की सहमति से।

    कोर्ट ने गौर किया कि कथित धोखाधड़ी की जांच पहले से ही राज्य पुलिस कर रही थी और इन्हीं आरोपों से जुड़ी अलग PIL (जनहित याचिका) का निपटारा पहले ही किया जा चुका है, जब राज्य ने कोर्ट को सूचित किया कि जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है। एक्ट की धाराओं 13 और 19 की जांच करते हुए कोर्ट ने माना कि धारा 19 के तहत शक्तियां सौंपने का अधिकार सीमित प्रकृति का है और यह लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक कार्यों तक नहीं फैला है।

    कोर्ट ने कहा:

    “इस प्रकार, यह केवल प्रशासनिक उद्देश्यों और लोकायुक्त के कार्यभार को कम करने के लिए शक्तियां सौंपने तक ही सीमित है। एक्ट की धारा 19 के प्रावधानों को देखते हुए लोकायुक्त किसी पूरी हो चुकी जांच या छानबीन रिपोर्ट पर कोई निष्कर्ष देने या अंतिम मूल्यांकन करने और उस पर अपना दिमाग लगाने (विचार करने) की अपनी मुख्य शक्ति को किसी और को नहीं सौंप सकते।”

    'डेलीगेटस नॉन पोटेस्ट डेलीगारे' (delegatus non potest delegare) के सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने फिर से कहा कि कानूनी शक्तियों को आम तौर पर आगे किसी और को नहीं सौंपा जा सकता (sub-delegated), जब तक कि कानून में इसकी साफ़ तौर पर इजाज़त न दी गई हो।

    बेंच ने आगे कहा कि चूंकि इस कानून के तहत लोकायुक्त का पद एक-सदस्यीय संस्था है, इसलिए ऐसी स्थितियों में 'ज़रूरत का सिद्धांत' (doctrine of necessity) लागू होगा।

    कोर्ट ने कहा:

    “जब याचिकाकर्ता ने लोकायुक्त के सामने ऐसी याचिका दायर की और उस याचिका पर अंतिम फ़ैसला लेने के लिए कोई दूसरा सदस्य नहीं है तो 'ज़रूरत के सिद्धांत' को लागू करते हुए लोकायुक्त के पास मना करने का कोई विकल्प नहीं है और उचित आदेश पारित करना उनका कर्तव्य है...”

    कोर्ट ने आगे कहा कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसमें केवल जांच एजेंसियों पर अधिकार-क्षेत्र से जुड़े कानूनी प्रावधानों को लागू किया गया और इससे प्रतिवादी नंबर 3 के पक्ष में कोई व्यक्तिगत पक्षपात नहीं झलकता।

    बेंच ने कहा कि आदेश प्रतिवादी नंबर 3 के पक्ष में नहीं है और उसमें केवल यह कहा गया कि लोकायुक्त के पास CBI या अकाउंटेंट जनरल जैसी केंद्रीय एजेंसियों को जांच का निर्देश देने का अधिकार-क्षेत्र नहीं है।

    यह मानते हुए कि कोई गैर-कानूनी काम या पक्षपात साबित नहीं हुआ, कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

    Case Title: Satyadeo Roy v. State of Jharkhand.

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