हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

21 Jun 2026 9:30 AM IST

  • हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (15 जून, 2026 से 19 जून, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    केंद्र सरकार के पास पूरा प्लेटफॉर्म बंद करने का अधिकार, केवल सामग्री हटाने तक सीमित नहीं धारा 69ए: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने मैसेजिंग मंच टेलीग्राम की याचिका खारिज करते हुए कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69ए के तहत केंद्र सरकार के पास केवल किसी विशेष सामग्री को हटाने ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर पूरे मध्यस्थ मंच को अस्थायी रूप से अवरुद्ध करने की भी शक्ति है।

    जस्टिस तेजस करिया की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि अधिनियम में "सूचना" की परिभाषा बहुत व्यापक है, जिसमें कोड, कंप्यूटर प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर भी शामिल हैं। इसलिए किसी अनुप्रयोग या डिजिटल मंच को इस परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता।

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    बेहतर कब्जे का अधिकार साबित करने वाला व्यक्ति संपत्ति वापस पाने का हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर दूसरे पक्ष की तुलना में बेहतर कब्जे का अधिकार (Better Possessory Title) साबित कर देता है, तो वह उस संपत्ति का कब्जा वापस पाने का हकदार होगा, बशर्ते वर्तमान कब्जाधारी अपने कब्जे के लिए कोई वैध या बेहतर अधिकार साबित न कर सके।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने यह टिप्पणी एक संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने लैटिन सिद्धांत “Possessio contra omnes valet praeter eum cui ius sit possessionis” का हवाला देते हुए कहा कि कब्जा पूरी दुनिया के खिलाफ मान्य होता है, सिवाय उस व्यक्ति के जिसके पास बेहतर अधिकार हो।

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    एक बार खारिज होकर अंतिम रूप ले चुकी डिम्ड कन्वेयंस अर्जी दोबारा दाखिल नहीं की जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र ओनरशिप फ्लैट्स अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि डिम्ड कन्वेयंस के लिए दायर की गई पहली अर्जी खारिज हो चुकी हो और उस आदेश को चुनौती न दिए जाने के कारण वह अंतिम रूप ले चुका हो, तो उसी राहत के लिए दूसरी अर्जी दाखिल नहीं की जा सकती।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी के पास अपने ही आदेश की समीक्षा या पुनर्विचार करने की कोई अंतर्निहित शक्ति नहीं है। जब तक कानून में ऐसी शक्ति स्पष्ट रूप से प्रदान न की गई हो, तब तक पहले से तय हो चुके मुद्दे को दोबारा नहीं खोला जा सकता।

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    दिल्ली हाईकोर्ट ने NEET-UG परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर प्रतिबंध सही ठहराया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को टेलीग्राम की याचिका खारिज की, जिसमें 21 जून को होने वाली NEET-UG दोबारा परीक्षा से पहले पेपर लीक को रोकने के लिए 22 जून तक मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी गई थी।

    आदेश सुनाते हुए जस्टिस तेजस करिया ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्लेटफॉर्म तक पहुंच को सीमित करने के लिए इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट (IT Act) की धारा 69A के तहत अपनाई गई प्रक्रिया पर संतोष व्यक्त किया। बेंच ने कारण न बताए जाने के आधार पर दी गई चुनौती खारिज की।

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    ज्यूडिशियल रिमांड के बाद गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने पर भी 'हेबियस कॉर्पस' नहीं दिया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार ज्यूडिशियल रिमांड के आदेश जारी होने के बाद गिरफ्तारी को इस आधार पर चुनौती देने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए। ऐसा तब भी है जब नियमों का यह पालन न करना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत अनिवार्य संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हो। [2026 LiveLaw (Raj) 249]

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    महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के तहत मंज़ूरी रद्द करना सिर्फ़ धोखाधड़ी साबित होने पर ही मुमकिन: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की धारा 36(1) के तहत दी गई मंज़ूरी को धारा 36(2) के तहत तभी रद्द किया जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि मंज़ूरी धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या ज़रूरी तथ्यों को छिपाकर हासिल की गई।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 36(2) के तहत अधिकार क्षेत्र अपील वाला नहीं है और यह चैरिटी कमिश्नर को लेन-देन का नया मूल्यांकन करने या मूल मंज़ूरी की सही-गलत होने पर फिर से विचार करने की इजाज़त नहीं देता, सिर्फ़ इसलिए कि उसी जानकारी के आधार पर कोई दूसरा नज़रिया भी हो सकता है।

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    "TMC के बागी गुट के पास सबसे ज़्यादा संख्या बल": हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष के रूप में रिताब्रत बनर्जी की नियुक्ति को सही ठहराया

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को वरिष्ठ तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को अंतरिम राहत देने से इनकार किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर विरोधी गुट के नेता रिताब्रत बनर्जी की नियुक्ति को चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि रोक (इंजंक्शन) लगाने के लिए कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। (2026 LiveLaw (Cal) 251)

    जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) विधायक दल के बहुमत ने स्पीकर के सामने विरोधी दावेदार का समर्थन किया। साथ ही चट्टोपाध्याय जिस प्रस्ताव पर भरोसा कर रहे थे, उस पर ही जाली हस्ताक्षर के आरोपों के कारण संदेह था, जिनकी अभी पुलिस जांच चल रही है। कोर्ट ने माना कि इन हालात में याचिकाकर्ता अंतरिम सुरक्षा का हकदार नहीं है।

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    'पगड़ी' देने से किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली नहीं बन जाती, मकान-मालिक अब भी बेदखली की मांग कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार द्वारा 'पगड़ी' (लंबे समय तक किरायेदारी के अधिकार पाने के लिए एक बार में दी जाने वाली रकम) का भुगतान करने से किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली नहीं बन जाती और इससे मकान-मालिक और किरायेदार के बीच के बुनियादी रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आता।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा एक दुकान से जुड़े विवाद की सुनवाई कर रही थीं, जिसे 1 जनवरी, 2001 के किराये के समझौते के तहत अपीलकर्ता को किराये पर दिया गया।

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    कानूनी वारिस, मृतक ट्रस्टी द्वारा 'रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी' में दायर मुकदमे को आगे नहीं बढ़ा सकते; यह अधिकार जीवित ट्रस्टी के पास होता है: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक ट्रस्टी के कानूनी वारिसों को उस मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पक्षकार नहीं बनाया जा सकता, जिसे ट्रस्टी ने 'रिप्रेजेंटेटिव कैपेसिटी' (प्रतिनिधि के तौर पर) में दायर किया। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे मुकदमे को आगे बढ़ाने का अधिकार केवल जीवित या विधिवत नियुक्त ट्रस्टियों के पास होता है। [2026 LiveLaw (PH) 200]।

    जस्टिस विकास बहल ने रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें मृतक वादी के कानूनी वारिस को प्रतिस्थापित (substitution) करने से इनकार कर दिया गया।

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    जिलाधिकारी के हस्ताक्षर बिना राशन दुकान लाइसेंस रद्द करने का आदेश अमान्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि यदि उचित मूल्य दुकान (राशन दुकान) का लाइसेंस रद्द करने वाले आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं तो ऐसा आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अन्य अधिकारी द्वारा आदेश की सूचना भेज देने से उसे जिलाधिकारी का वैध आदेश नहीं माना जा सकता। जस्टिस पंकज पुरोहित की पीठ एक राशन दुकान संचालक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

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    किरायेदारी पाने के लिए मृत किरायेदार के साथ रहना जरूरी नहीं, वारिस को मिलेगा अधिकार: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मृत किरायेदार की किरायेदारी विरासत में पाने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वारिस उसकी मृत्यु के समय उसके साथ रह रहा हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ कोई पारिवारिक सदस्य निवास नहीं कर रहा था तो उसके किसी भी वैध वारिस को किरायेदार के रूप में मान्यता दी जा सकती है। जस्टिस एम. एम. साठये ने यह फैसला पारसी पंचायत फंड्स एंड प्रॉपर्टीज, बॉम्बे द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।

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    POSH Act | एम्प्लॉयर द्वारा उपलब्ध नहीं कराए गए ट्रांसपोर्ट में हुई यौन उत्पीड़न की शिकायत पर ICC सुनवाई नहीं कर सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अगर यौन उत्पीड़न का कोई कथित मामला ऐसे ट्रांसपोर्ट में होता है, जो आरोपी या पीड़ित के एम्प्लॉयर (नियोक्ता) ने उपलब्ध नहीं कराया है, तो उस पर 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम' (POSH Act) के प्रावधानों के तहत विचार नहीं किया जा सकता। [साइटेशन: 2026 LiveLaw (Bom) 290] इसलिए कोर्ट ने एक बैंकर के खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द की, जिस पर ऑफिस जाते समय एक शेयर्ड ऑटो-रिक्शा में एक महिला को गलत तरीके से छूने का आरोप था।

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    EWS अभ्यर्थी 'आयु सीमा में छूट का दावा' अधिकार के रूप में नहीं कर सकते, नियमों में प्रावधान जरूरी: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अभ्यर्थी केवल संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर आयु सीमा में छूट का दावा अधिकार के रूप में नहीं कर सकते। यदि संबंधित भर्ती नियमों या सरकारी नीति में ऐसी छूट का प्रावधान नहीं है तो अदालत उसे प्रदान करने का निर्देश नहीं दे सकती।

    जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी पद की भर्ती में आयु सीमा में छूट की मांग करने वाले अभ्यर्थी की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

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    तलाकशुदा पत्नी को पति की मृत्यु के बाद भी मिल सकता है भरण-पोषण, लेकिन बढ़ोतरी की मांग नहीं कर सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी अपने पूर्व पति की मृत्यु के बाद भी उसके संपत्ति-उत्तराधिकारियों या संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार रह सकती है, यदि उसके पक्ष में पहले से भरण-पोषण का वैध आदेश या डिक्री मौजूद हो। हालांकि, पति की मृत्यु के बाद वह उस भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी की मांग नहीं कर सकती।

    जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला की याचिका पर सुनाते हुए दिया। महिला ने अपने पूर्व पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति से भरण-पोषण जारी रखने और वर्ष 1999 में पारिवारिक अदालत द्वारा निर्धारित 6,000 रुपये मासिक भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी की मांग की थी।

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    प्राइवेट स्कूल में कर्मचारी को शिक्षा निदेशक की मंज़ूरी के बिना नौकरी से हटाने का आदेश अमान्य: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला डिवीज़न बेंच ने कहा कि नौकरी से हटाने का आदेश अमान्य है, क्योंकि इसने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 8(2) का उल्लंघन किया। इस धारा के तहत प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूल के किसी कर्मचारी को नौकरी से हटाने की सज़ा देने से पहले शिक्षा निदेशक की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है।

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    पहली पत्नी की मृत्यु के बाद हुई शादी, फिर भी 'दूसरी पत्नी' बताकर आधी पेंशन नहीं रोकी जा सकती: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फैमिली पेंशन से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय केवल एक ही विधवा जीवित है और पहली पत्नी से कोई पात्र आश्रित मौजूद नहीं है, तो जीवित विधवा को पूरी यानी 100 प्रतिशत फैमिली पेंशन मिलेगी। केवल उसे दूसरी पत्नी बताकर पेंशन का आधा हिस्सा रोका नहीं जा सकता।

    जस्टिस नमित कुमार ने कहा कि पेंशन के बंटवारे का नियम तभी लागू होता है, जब एक ही समय में एक से अधिक पात्र दावेदार मौजूद हों। यदि केवल एक ही पात्र व्यक्ति है तो राज्य सरकार पेंशन का कोई हिस्सा अपने पास नहीं रख सकती।

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    जांच एजेंसियों से भविष्य में मिलने वाले निर्देशों की आशंका में बैंक पूरा अकाउंट फ्रीज़ नहीं कर सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि कोई बैंक सिर्फ़ इस आशंका पर कि भविष्य में जांच एजेंसियों से अतिरिक्त रकम फ्रीज़ करने के निर्देश मिल सकते हैं, "पूरा बैंक अकाउंट" फ्रीज़ नहीं कर सकता।

    जस्टिस सूरज गोविंदराज की सिंगल जज बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया, "भविष्य की किसी घटना की संभावना या आशंका की तुलना कानूनी आदेश से नहीं की जा सकती। बैंक की शक्तियों का आधार कोई मौजूदा निर्देश या कानूनी अधिकार होना चाहिए, न कि भविष्य में होने वाली या न होने वाली काल्पनिक स्थितियां। अगर ऐसा तरीका अपनाया जाता है तो बैंक सीमित फ्रीज़िंग का अनुरोध मिलने पर भी पूरे अकाउंट फ्रीज़ कर सकेंगे, सिर्फ़ इस धारणा के आधार पर कि आगे और अनुरोध आ सकते हैं। ऐसा नज़रिया न सिर्फ़ कानून के खिलाफ़ होगा, बल्कि अकाउंट होल्डर्स के लिए बहुत ज़्यादा परेशानी का कारण भी बनेगा।"

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