POSH Act | एम्प्लॉयर द्वारा उपलब्ध नहीं कराए गए ट्रांसपोर्ट में हुई यौन उत्पीड़न की शिकायत पर ICC सुनवाई नहीं कर सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
18 Jun 2026 9:32 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अगर यौन उत्पीड़न का कोई कथित मामला ऐसे ट्रांसपोर्ट में होता है, जो आरोपी या पीड़ित के एम्प्लॉयर (नियोक्ता) ने उपलब्ध नहीं कराया है, तो उस पर 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम' (POSH Act) के प्रावधानों के तहत विचार नहीं किया जा सकता। [साइटेशन: 2026 LiveLaw (Bom) 290]
इसलिए कोर्ट ने एक बैंकर के खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द की, जिस पर ऑफिस जाते समय एक शेयर्ड ऑटो-रिक्शा में एक महिला को गलत तरीके से छूने का आरोप था।
जस्टिस सुमन श्याम और जस्टिस फिरदोस पूनीवाला की डिवीजन बेंच ने गौर किया कि कथित घटना के दिन शिकायतकर्ता महिला और आरोपी-याचिकाकर्ता मुंबई के उपनगरीय कुर्ला रेलवे स्टेशन से पॉश BKC इलाके तक एक 'शेयर्ड' ऑटो-रिक्शा में यात्रा कर रहे थे।
इस यात्रा के दौरान, आरोप है कि याचिकाकर्ता का हाथ महिला के उस बैग से छू गया, जिसे उसने कंधे पर लटका रखा था। कथित तौर पर उसने इस पर आपत्ति जताई और सड़क पर चिल्लाने लगी, हालांकि रिक्शा चालक ने उन्हें उनके ऑफिस के पास BKC में उतार दिया। इसके बाद उसने अपनी कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (ICC) को घटना की सूचना दी, जिसने इसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ICC को भेज दिया, जहां याचिकाकर्ता काम करता था।
SBI की ICC ने जांच के बाद याचिकाकर्ता को यौन उत्पीड़न का दोषी पाया और सिफारिश की कि कंपनी को सर्विस रूल्स के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। हालांकि, उसने रिट याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट में इसके खिलाफ अपील की और अंतरिम आदेश पारित किया गया, जिसमें संबंधित अधिकारियों को SBI की ICC की सिफारिश पर अंतिम निर्णय न लेने का निर्देश दिया गया।
अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उक्त ऑटो-रिक्शा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का एक साधन था, और किसी भी तरह से इसे एम्प्लॉयर द्वारा उपलब्ध कराया गया ट्रांसपोर्ट नहीं कहा जा सकता, जैसा कि POSH Act की धारा 2(O)(v) के तहत अनिवार्य है। इस धारा में कहा गया है कि एम्प्लॉई द्वारा नौकरी के दौरान या नौकरी से संबंधित किसी भी जगह का दौरा - जिसमें उक्त यात्रा के लिए एम्प्लॉयर द्वारा उपलब्ध कराया गया ट्रांसपोर्ट भी शामिल है - "कार्यस्थल" की परिभाषा में शामिल होगा।
बेंच ने अपने 16 जून के आदेश में बताया कि धारा 2(o)(v) के तहत "वर्कप्लेस" (काम की जगह) के दायरे में एम्प्लॉयर द्वारा दी गई ट्रांसपोर्ट सुविधा भी आती है, जिसका इस्तेमाल एम्प्लॉयर के काम के सिलसिले में या नौकरी के दौरान किसी जगह जाने के लिए किया जाता है।
इसलिए बेंच ने साफ़ किया कि "वर्कप्लेस" की परिभाषा में आने के लिए ट्रांसपोर्ट सुविधा एम्प्लॉयर द्वारा ही दी जानी चाहिए।
बेंच ने कहा,
"इस मामले में याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता एक और यात्री के साथ कुर्ला रेलवे स्टेशन से बांद्रा में BKC तक ऑटो-रिक्शा शेयर कर रहे थे। हालांकि याचिकाकर्ता अपने ऑफिस जा रहा था, लेकिन वह ट्रांसपोर्ट सुविधा न तो उसके एम्प्लॉयर ने और न ही शिकायतकर्ता के एम्प्लॉयर ने दी थी। ऐसी स्थिति में हमारी राय में इस तरह का ट्रांसपोर्ट धारा 2(o)(v) के तहत 'वर्कप्लेस' की परिभाषा में नहीं आएगा। इसी वजह से हमारी राय में कथित घटना किसी वर्कप्लेस पर नहीं हुई।"
इसके अलावा, जजों ने कहा कि अगर कथित यौन उत्पीड़न 'वर्कप्लेस' पर नहीं हुआ तो SBI की ICC यौन उत्पीड़न की शिकार महिला की शिकायत पर विचार नहीं कर सकती।
जजों ने कहा,
"इसी वजह से हमारी राय में ICC (SBI की) के पास महिला की शिकायत पर विचार करने और 29 अगस्त, 2023 का आदेश पारित करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। इसलिए हमारी राय में ICC का वह आदेश कानून की नज़र में टिकने लायक नहीं है। इसलिए उसे रद्द किया जाना चाहिए।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करने वाले ICC का आदेश रद्द कर दिया।
Case Title: Siddesh Pradeep Satpute vs State Bank of India (Writ Petition 1213 of 2024)

