महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के तहत मंज़ूरी रद्द करना सिर्फ़ धोखाधड़ी साबित होने पर ही मुमकिन: बॉम्बे हाईकोर्ट

Shahadat

19 Jun 2026 9:43 AM IST

  • महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के तहत मंज़ूरी रद्द करना सिर्फ़ धोखाधड़ी साबित होने पर ही मुमकिन: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की धारा 36(1) के तहत दी गई मंज़ूरी को धारा 36(2) के तहत तभी रद्द किया जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि मंज़ूरी धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या ज़रूरी तथ्यों को छिपाकर हासिल की गई। कोर्ट ने कहा कि धारा 36(2) के तहत अधिकार क्षेत्र अपील वाला नहीं है और यह चैरिटी कमिश्नर को लेन-देन का नया मूल्यांकन करने या मूल मंज़ूरी की सही-गलत होने पर फिर से विचार करने की इजाज़त नहीं देता, सिर्फ़ इसलिए कि उसी जानकारी के आधार पर कोई दूसरा नज़रिया भी हो सकता है।

    जस्टिस अमित बोरकर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें जॉइंट चैरिटी कमिश्नर के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत ट्रस्ट की संपत्ति के संबंध में याचिकाकर्ता को 24 मई 2018 को दी गई मंज़ूरी रद्द कर दी गई। मंज़ूरी के बाद सितंबर 2018 में लीज़ डीड (पट्टे का अनुबंध) निष्पादित किया गया और याचिकाकर्ता ने बाद में रिवर्जनरी अधिकार (संपत्ति पर भविष्य का अधिकार) खरीदने का विकल्प चुना, जिसके परिणामस्वरूप कन्वेयंस डीड (स्वामित्व हस्तांतरण का अनुबंध) निष्पादित किया गया। इसके बाद धारा 36(2) के तहत मंज़ूरी रद्द करने की कार्यवाही शुरू की गई, जिसका आधार यह था कि ज़रूरी तथ्यों को छिपाया गया और लेन-देन ट्रस्ट के हित में नहीं था। जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने कई आधारों पर मंज़ूरी रद्द की।

    कोर्ट ने धारा 36 की व्यवस्था की जांच की और पाया कि कानून में दो अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों की परिकल्पना की गई। धारा 36(1) के तहत मंज़ूरी देते समय चैरिटी कमिश्नर लेन-देन की वांछनीयता, प्रतिफल (कीमत) की पर्याप्तता और ट्रस्ट को होने वाले समग्र लाभ की जांच करता है। हालांकि, एक बार मंज़ूरी मिल जाने के बाद धारा 36(2) के तहत जांच इस बात का पता लगाने तक सीमित रहती है कि क्या मंज़ूरी धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या ज़रूरी तथ्यों को छिपाकर हासिल की गई। कोर्ट ने कहा कि मंज़ूरी रद्द करने की कार्यवाही को लेन-देन के गुण-दोष पर फिर से सुनवाई में नहीं बदला जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "चुनौती दिया गया आदेश कानूनी आधारों पर मंज़ूरी रद्द करने के बजाय मंज़ूरी आदेश का पुनर्मूल्यांकन करने जैसा है। कानून में ऐसा तरीका अपनाने की इजाज़त नहीं है। मंज़ूरी रद्द करने की शक्ति को अपील के अधिकार क्षेत्र में नहीं बदला जा सकता। अगर ऐसा करने की इजाज़त दी जाती है तो विधायिका द्वारा पूरे हो चुके लेन-देन को दी गई अंतिम मान्यता कमज़ोर पड़ जाएगी।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि जहां प्रॉपर्टी ट्रांसफर (conveyance) पहले ही हो चुका हो, वहां धारा 36(2) का प्रोविज़ो (शर्त) इसे रद्द करने पर और भी रोक लगाता है। उस स्टेज पर एकमात्र सवाल यह बचता है कि क्या मंज़ूरी मिलने से पहले चैरिटी कमिश्नर के साथ धोखाधड़ी की गई। ट्रांज़ैक्शन की ज़रूरत या दूसरी कथित अनियमितताओं के आरोप अपने आप में इसे रद्द करने का आधार नहीं बन सकते, जब तक कि उनसे धोखाधड़ी साबित न हो।

    धोखाधड़ी के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का अंदाज़ा आसानी से नहीं लगाया जा सकता और इसके लिए ठोस दलीलें और सबूत ज़रूरी हैं। कोर्ट ने पाया कि रद्द करने की अर्ज़ी में केवल सामान्य आरोप थे और ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह पता चले कि ट्रस्टियों ने चैरिटी कमिश्नर को गुमराह करने के इरादे से जानकारी छिपाई।

    पुराने लीज़-होल्डर को जारी किए गए टर्मिनेशन नोटिस को छिपाने के कथित मामले पर कोर्ट ने कहा कि किसी ज़रूरी तथ्य को न बताने और किसी अहम तथ्य को धोखाधड़ी से छिपाने के बीच फ़र्क होता है। मंज़ूरी का मूल आदेश ही यह दिखाता था कि चैरिटी कमिश्नर को प्रॉपर्टी से जुड़े विवादों, देनदारियों और पिछले ट्रांज़ैक्शन के बारे में जानकारी थी। ऐसे हालात में सिर्फ़ एक दस्तावेज़ पेश न करने से धोखाधड़ी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। ज़्यादा से ज़्यादा, इसे एक अनियमितता माना जा सकता है, लेकिन धारा 36(2) के तहत धोखाधड़ी नहीं।

    कोर्ट ने माना कि जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने उन मुद्दों पर फिर से विचार किया जिन पर मंज़ूरी देते समय विचार किया जाना चाहिए, बजाय इसके कि वे अपनी जांच को धारा 36(2) के तहत उपलब्ध सीमित आधारों तक ही सीमित रखते। चूंकि धोखाधड़ी, गलत जानकारी देना या अहम तथ्यों को छिपाना साबित नहीं हुआ, इसलिए मंज़ूरी रद्द करने का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसलिए कोर्ट ने रिट याचिका को मंज़ूरी दी और विवादित आदेश रद्द किया।

    Case Title: Bagasarwala Property LLP v. The Joint Charity Commissioner [Writ Petition No. 1736 of 2020]

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