प्राइवेट स्कूल में कर्मचारी को शिक्षा निदेशक की मंज़ूरी के बिना नौकरी से हटाने का आदेश अमान्य: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

17 Jun 2026 11:42 AM IST

  • प्राइवेट स्कूल में कर्मचारी को शिक्षा निदेशक की मंज़ूरी के बिना नौकरी से हटाने का आदेश अमान्य: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला डिवीज़न बेंच ने कहा कि नौकरी से हटाने का आदेश अमान्य है, क्योंकि इसने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 8(2) का उल्लंघन किया। इस धारा के तहत प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूल के किसी कर्मचारी को नौकरी से हटाने की सज़ा देने से पहले शिक्षा निदेशक की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है।

    पृष्ठभूमि की जानकारी

    अपीलकर्ता 'साई मेमोरियल गर्ल्स स्कूल' (एक प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाला स्कूल) में असिस्टेंट टीचर के तौर पर काम कर रही थी। उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई। एक चार्जशीट जारी की गई, जिसमें काम ठीक से न करने, सहकर्मियों के साथ बुरा बर्ताव करने और अंग्रेज़ी की बुनियादी जानकारी न होने के आरोप लगाए गए।

    एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसने आरोपों के आर्टिकल I से III को साबित माना और आर्टिकल IV को आंशिक रूप से साबित माना। स्कूल के मैनेजर ने अपीलकर्ता को नौकरी से हटाने की सज़ा का आदेश जारी किया। अपीलकर्ता ने दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल में अपील की, जिसने उसकी अपील खारिज कर दी। इससे नाराज़ होकर उसने रिट याचिका दायर की, जिसे सिंगल जज ने खारिज किया।

    इससे नाराज़ होकर उसने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने 'लेटर्स पेटेंट अपील' दायर की।

    अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि नौकरी से हटाने का आदेश शिक्षा निदेशक से लिखित मंज़ूरी लिए बिना नहीं दिया जा सकता, जो DSE Act, 1973 की धारा 8(2) के तहत ज़रूरी है। यह भी कहा गया कि स्कूल के प्रिंसिपल और वाइस-प्रिंसिपल, जो खुद उसके खिलाफ शिकायतकर्ता थे, जांच में गवाह के तौर पर पेश हुए और अनुशासनात्मक प्राधिकरण का भी हिस्सा है।

    दूसरी ओर, स्कूल ने तर्क दिया कि जांच रिपोर्ट विस्तृत और तर्कपूर्ण है। साथ ही अनुशासनात्मक प्राधिकरण जांच अधिकारी की बात से सहमत है और उसे कोई और विस्तृत आदेश जारी करने की ज़रूरत नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता को अपने समर्थन में दस्तावेज़ जमा करने का पर्याप्त मौका दिया गया, जिसका उसने इस्तेमाल नहीं किया। यह भी कहा गया कि अभिभावकों की शिकायतों से यह साबित हुआ कि अपीलकर्ता पढ़ाने में अच्छी नहीं थी।

    कोर्ट की बातें और निष्कर्ष

    कोर्ट ने पाया कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट, 1973 की धारा 8(2) के तहत किसी प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूल के कर्मचारी पर कोई बड़ी सज़ा लगाने से पहले शिक्षा निदेशक (Director of Education) की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है।

    कोर्ट ने यह भी देखा कि प्रिंसिपल और वाइस-प्रिंसिपल अनुशासनात्मक प्राधिकरण (Disciplinary Authority) का हिस्सा नहीं हो सकते, क्योंकि उन्होंने अपील करने वाले के ख़िलाफ़ गवाही दी और आरोपों में उनके साथ दुर्व्यवहार की बात भी शामिल हैं।

    कोर्ट ने माना कि सज़ा देने का आदेश पूरी तरह से बिना किसी ठोस कारण के दिया गया, क्योंकि इसमें अपील करने वाले द्वारा 'कारण बताओ नोटिस' (show cause notice) के जवाब में उठाए गए बिंदुओं पर विचार नहीं किया गया। इसलिए डिवीज़न बेंच ने मामले की नए सिरे से कार्यवाही (de novo proceedings) का निर्देश दिया और कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या अपील करने वाले पर लगा दुर्व्यवहार का आरोप इतना गंभीर था कि उसे नौकरी से निकाला जाए।

    डिवीज़न बेंच ने यह भी माना कि अपील करने वाले को नौकरी से निकालने का आदेश शिक्षा निदेशालय की मंज़ूरी के बिना जारी किया गया, इसलिए यह DSE Act की धारा 8(2) का उल्लंघन है। इसलिए डिवीज़न बेंच ने उस आदेश को रद्द कर दिया। डिवीज़न बेंच ने निर्देश दिया कि अपील करने वाले को नौकरी की निरंतरता (continuity of service) और 50% बकाया वेतन के साथ बहाल किया जाए, जो कि नए सिरे से होने वाली जांच कार्यवाही के नतीजे पर निर्भर करेगा।

    इन बातों के साथ डिवीज़न बेंच ने अपील करने वाले टीचर की अपील का निपटारा किया।

    Case Name : Rekha Sabharwal v. Management of Saai Memorial Girls School & Ors.

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