जांच एजेंसियों से भविष्य में मिलने वाले निर्देशों की आशंका में बैंक पूरा अकाउंट फ्रीज़ नहीं कर सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट
Shahadat
15 Jun 2026 6:12 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि कोई बैंक सिर्फ़ इस आशंका पर कि भविष्य में जांच एजेंसियों से अतिरिक्त रकम फ्रीज़ करने के निर्देश मिल सकते हैं, "पूरा बैंक अकाउंट" फ्रीज़ नहीं कर सकता।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की सिंगल जज बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,
"भविष्य की किसी घटना की संभावना या आशंका की तुलना कानूनी आदेश से नहीं की जा सकती। बैंक की शक्तियों का आधार कोई मौजूदा निर्देश या कानूनी अधिकार होना चाहिए, न कि भविष्य में होने वाली या न होने वाली काल्पनिक स्थितियां। अगर ऐसा तरीका अपनाया जाता है तो बैंक सीमित फ्रीज़िंग का अनुरोध मिलने पर भी पूरे अकाउंट फ्रीज़ कर सकेंगे, सिर्फ़ इस धारणा के आधार पर कि आगे और अनुरोध आ सकते हैं। ऐसा नज़रिया न सिर्फ़ कानून के खिलाफ़ होगा, बल्कि अकाउंट होल्डर्स के लिए बहुत ज़्यादा परेशानी का कारण भी बनेगा।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक सिर्फ़ अकाउंट का कस्टोडियन (रखवाला) होता है और उसका अधिकार जांच एजेंसी से मिले कानूनी निर्देशों को लागू करने तक ही सीमित होता है। कोर्ट की राय में अकाउंट फ्रीज़ करना बैंक की स्वतंत्र शक्ति नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"...प्रशासनिक सुविधा या पहले से की गई कार्रवाई किसी वैध कानूनी आदेश की जगह नहीं ले सकती। अगर और जब सक्षम अधिकारियों से अतिरिक्त निर्देश मिलते हैं तो प्रतिवादी नंबर 1 [बैंक] को निस्संदेह उनके अनुसार काम करना होगा। हालांकि, जब तक ऐसे निर्देश नहीं मिलते, प्रतिवादी नंबर 1 अपनी कार्रवाई को केवल उन निर्देशों तक सीमित रखने के लिए बाध्य है, जो उसे पहले ही मिल चुके हैं।"
कोर्ट ने आदेश में यह बात नोट की और स्पष्ट किया कि भविष्य के निर्देशों के बारे में सिर्फ़ आशंका मौजूदा निर्देशों में बताई गई रकम से ज़्यादा फंड फ्रीज़ करने का कानूनी आधार नहीं बन सकती।
हाईकोर्ट ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए सामान्य निर्देश भी जारी किए कि अकाउंट फ्रीज़ करने की कार्रवाई 'आनुपातिकता' (Proportionality) की कसौटी पर खरी उतरे।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"...जब भी फ्रीज़िंग के निर्देश में किसी खास रकम का ज़िक्र हो तो संबंधित बैंक को आम तौर पर बताई गई रकम तक के फंड को अलग रखना चाहिए या उस पर 'लियन' (lien) लगाना चाहिए और अकाउंट में बची हुई रकम के इस्तेमाल की इजाज़त देनी चाहिए, जब तक कि निर्देश में ही पूरा अकाउंट फ्रीज़ करने की बात न कही गई हो या इसके विपरीत कोई कानूनी आदेश न हो। कोई और तरीका अपनाने का मतलब होगा कि बैंक फ्रीज़िंग निर्देश का दायरा बढ़ा रहा है, जो कि मंज़ूर नहीं है..."
याचिकाकर्ता बेंगलुरु का रहने वाला है। वह इंडसइंड बैंक में एक बैंक अकाउंट रखता था। दो जांच एजेंसियों से निर्देश मिलने के बाद याचिकाकर्ता का पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर दिया गया। गुजरात की साइबर क्राइम पुलिस ने ₹15,000 के एक ट्रांज़ैक्शन पर सवाल उठाया, जबकि पश्चिम बंगाल की बैरकपुर पुलिस ने बैंक से ₹10,000 की रकम फ्रीज़ करने को कहा। हालांकि, अकाउंट में सिर्फ़ ₹25,000 फ्रीज़ करने के बजाय, बैंक ने याचिकाकर्ता को अकाउंट से कोई भी पैसा निकालने से रोक दिया, जिसमें उस अकाउंट में आई सैलरी भी शामिल थी।
हाईकोर्ट के सामने इंडसइंड बैंक ने तर्क दिया कि चूंकि उसे फ्रीज़ करने के कई निर्देश मिले थे, इसलिए यह आशंका होना वाजिब है कि याचिकाकर्ता के अकाउंट में मौजूद रकम के बारे में और भी निर्देश जारी किए जा सकते हैं। बैंक ने तर्क दिया कि पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज़ करना इसी दिशा में एक 'एहतियाती कदम' था।
हालांकि, बैंक के वकील की दलीलों से असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि अकाउंट फ्रीज़ करने में बैंक का काम पूरी तरह से प्रशासनिक या औपचारिक होता है:
"...बैंक न तो जांच करने वाली अथॉरिटी है और न ही फैसला करने वाली अथॉरिटी। उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सक्षम अथॉरिटी द्वारा कानूनी रूप से जारी निर्देशों का ईमानदारी से पालन करना है... बैंक न तो खुद ऐसी शक्तियां ले सकता है, जो उसे कानून से नहीं मिली हैं, और न ही अपनी मान्यताओं, आशंकाओं या प्रशासनिक विचारों के आधार पर मिले निर्देशों का दायरा बढ़ा सकता है..."
कोर्ट ने आगे कहा कि बैंक और उसके ग्राहक के बीच का रिश्ता कॉन्ट्रैक्ट और भरोसे पर आधारित होता है। ग्राहक के अकाउंट में मौजूद रकम अकाउंट होल्डर की ही संपत्ति होती है, बस सक्षम अधिकारियों द्वारा लगाई गई कानूनी पाबंदियां ही इस पर लागू होती हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर विवादित रकम के मुकाबले अकाउंट होल्डर को उसकी पूरी रकम से वंचित कर दिया जाता है तो उसे गंभीर सिविल और आर्थिक नतीजों का सामना करना पड़ सकता है।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए बैंक अकाउंट के संचालन पर लगाई गई कोई भी पाबंदी उस मकसद के अनुपात में होनी चाहिए, जिसे हासिल करना है और यह निर्देश जारी करने वाले सक्षम अधिकारी द्वारा तय की गई सीमाओं से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए... इसलिए अकाउंट फ्रीज़ करने के निर्देश को लागू करते समय अनुपात का ध्यान रखा जाना चाहिए। लगाई गई पाबंदी का दायरा मिले हुए निर्देश के दायरे के मुताबिक ही होना चाहिए।”
इसके अनुसार, कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि वह अकाउंट से पैसे निकालने (डेबिट) पर लगी रोक को शुरुआती तौर पर जांच अधिकारियों द्वारा बताए गए 25,000 रुपये तक ही सीमित रखे और इस आदेश को 4 दिनों के भीतर लागू करे। बैंक को याचिकाकर्ता को अकाउंट में बची हुई रकम का इस्तेमाल करने की इजाज़त देनी चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर बैंक को किसी खास रकम को फ्रीज़ करने के लिए कोई और सूचना या निर्देश मिलता है तो वह संबंधित जांच एजेंसी द्वारा बताई गई रकम के हिसाब से ही उस निर्देश पर सख्ती से अमल करने के लिए स्वतंत्र होगा।
Case Title: Sri. Madhu v. The IndusInd Bank Ltd. & Anr.

