ज्यूडिशियल रिमांड के बाद गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने पर भी 'हेबियस कॉर्पस' नहीं दिया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Shahadat

19 Jun 2026 9:47 AM IST

  • ज्यूडिशियल रिमांड के बाद गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने पर भी हेबियस कॉर्पस नहीं दिया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार ज्यूडिशियल रिमांड के आदेश जारी होने के बाद गिरफ्तारी को इस आधार पर चुनौती देने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए। ऐसा तब भी है जब नियमों का यह पालन न करना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत अनिवार्य संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हो। [2026 LiveLaw (Raj) 249]

    जस्टिस उमा शंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की डिवीजन बेंच ने राजस्थान के पूर्व मंत्री डॉ. महेश जोशी के बेटे द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' याचिका खारिज की। याचिकाकर्ता का आरोप था कि भ्रष्टाचार के एक मामले में गिरफ्तारी के समय एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) गिरफ्तार व्यक्ति या उसके परिवार को गिरफ्तारी के आधार बताने में विफल रहा था।

    हालांकि, कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी से जुड़े अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया गया, लेकिन उसने 'हेबियस कॉर्पस' के तहत राहत देने से इनकार किया, क्योंकि रिमांड आदेशों के कारण गिरफ्तार व्यक्ति पहले से ही ज्यूडिशियल कस्टडी (न्यायिक हिरासत) में है।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि हालांकि पहली रिमांड के समय स्पेशल जज के सामने गिरफ्तारी प्रक्रिया का पालन न करने के बारे में आपत्ति उठाई गई, लेकिन पुलिस कस्टडी दिए जाने के दौरान वह आवेदन अनिर्णित ही रह गया।

    राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार काफी हद तक बता दिए गए और एक बार जब स्पेशल जज ने रिमांड को मंजूरी दी और उसके बाद ज्यूडिशियल रिमांड के आदेश जारी हो गए तो 'हेबियस कॉर्पस' की याचिका स्वीकार्य नहीं थी।

    इसने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों जैसे 'स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम तस्नीम रिज़वान सिद्दीकी' और 'वी. सेंथिल बालाजी बनाम स्टेट का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ज्यूडिशियल रिमांड से मिली कस्टडी की वैधता की जांच 'हेबियस कॉर्पस' की कार्यवाही में नहीं की जा सकती।

    रिकॉर्ड की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ACB ऐसा कोई दस्तावेज पेश करने में विफल रही जिससे यह पता चले कि गिरफ्तारी के आधार कभी गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित रूप में बताए गए। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को केवल उन अपराधों के बारे में बताना जिनका उस पर आरोप है, "गिरफ्तारी के आधार" बताने के बराबर नहीं है; गिरफ्तारी के आधारों में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का आधार और कारण सार्थक रूप से स्पष्ट होने चाहिए।

    बेंच ने पंकज बंसल बनाम भारत संघ, प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (NCT दिल्ली), विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि गिरफ्तारी के आधार बताना अनुच्छेद 22(1) के तहत एक ज़रूरी संवैधानिक सुरक्षा उपाय है। कोर्ट ने कहा कि ये आधार आम तौर पर लिखित रूप में और उस भाषा में दिए जाने चाहिए, जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो, और ऐसा न करने पर गिरफ्तारी गैर-कानूनी हो जाती है।

    कोर्ट ने जांच एजेंसी के कामकाज पर भी गंभीर चिंता जताई और कहा कि ACB ने "गिरफ्तारी के आधार" (grounds of arrest) और "गिरफ्तारी के कारणों" (reasons for arrest) के बीच भ्रम पैदा किया। कोर्ट ने पाया कि ACB के शुरुआती और बाद के जवाबों में इस बात को लेकर विसंगतियां थीं कि क्या हिरासत में लिए गए व्यक्ति या उसके परिवार को गिरफ्तारी के आधार बताए गए; कोर्ट ने टिप्पणी की कि बाद वाले जवाब में ऐसी बातें शामिल थीं जो पहले वाले जवाब में नहीं थीं।

    बेंच ने स्पेशल जज की भी आलोचना की कि उन्होंने पुलिस रिमांड देने से पहले गिरफ्तारी से जुड़े ज़रूरी सुरक्षा उपायों का पालन न करने के बारे में उठाई गई आपत्ति पर कोई फैसला नहीं लिया। विहान कुमार मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट की यह ज़िम्मेदारी है कि वह रिमांड की मंज़ूरी देने से पहले अनुच्छेद 22(1) के पालन की जांच करे, क्योंकि गैर-कानूनी गिरफ्तारी वैध रिमांड आदेश का आधार नहीं बन सकती।

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इस मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए वह 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की रिट जारी नहीं कर सकता। कोर्ट ने गौर किया कि शुरुआती रिमांड के बाद कई न्यायिक रिमांड आदेश जारी किए जा चुके थे और गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती देने वाली अर्ज़ी पर स्पेशल जज पहले ही फैसला सुना चुके थे।

    कोर्ट ने कहा कि जब कस्टडी न्यायिक आदेशों के तहत हो तो 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का दायरा सीमित हो जाता है। इसलिए याचिकाकर्ता को यह छूट दी गई कि वह उचित कानूनी प्रक्रियाओं के ज़रिए स्पेशल जज के आदेश को चुनौती दे सके।

    मामले को समाप्त करते हुए बेंच ने कहा कि राजस्थान पुलिस और न्यायिक अधिकारियों दोनों को 'विहान कुमार' और 'मिहिर राजेश शाह' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बारे में ट्रेनिंग की ज़रूरत है ताकि गिरफ्तारी के शुरुआती चरण में ही संविधान के अनुच्छेद 22(1) का सही ढंग से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

    आगे कहा गया,

    "...इस मामले में न तो हिरासत में लिए गए व्यक्ति को और न ही उसके परिवार को गिरफ्तारी के आधार के बारे में बताया गया। हमें राजस्थान राज्य की पुलिस की समझ पर बहुत गंभीर संदेह है; खासकर उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि ACB को गिरफ्तारी के आधार से जुड़े बुनियादी नियमों की जानकारी नहीं है... 07.05.2026 को गिरफ्तारी की वैधता पर विचार करना जज की ज़िम्मेदारी थी, लेकिन स्पेशल जज (PC Act मामलों के लिए) के तौर पर नियुक्त सेशन जज ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया। हमें समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया, जबकि यह ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी..."

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसके फैसले की एक कॉपी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और राजस्थान सरकार के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) के सामने रखी जाए ताकि इसका पालन सुनिश्चित किया जा सके।

    Title: Rohit Joshi v State of Rajasthan & Ors.

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