हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
15 Feb 2026 8:30 AM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (09 फरवरी, 2026 से 13 फरवरी, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
फूड सेफ्टी ऑफिसर पद के लिए BDS डिग्री 'मेडिसिन' के समकक्ष नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने खाद्य सुरक्षा अधिकारी (Food Safety Officer) पद के लिए आवेदन करने वाले एक अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) डिग्री को “मेडिसिन” की डिग्री के समकक्ष मानने का प्रश्न पहले ही विशेषज्ञ समिति द्वारा नकारात्मक रूप से तय किया जा चुका है, ऐसे में न्यायालय के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय को किसी पद के लिए निर्धारित पात्रता मानदंडों में संशोधन या विस्तार करने का अधिकार नहीं है, विशेषकर जब वे मानदंड राज्य सरकार द्वारा एक नियोक्ता (Recruiting Authority) के रूप में निर्धारित किए गए हों।
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पैतृक संपत्ति और जन्मसिद्ध अधिकार की अवधारणा मुस्लिम कानून में मान्य नहीं: गुजरात हाइकोर्ट ने महिला की हिस्सेदारी की मांग ठुकराई
गुजरात हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार संपत्ति पैतृक संपत्ति और जन्म से अधिकार जैसी अवधारणाएं जैसा कि हिंदू कानून में समझी जाती हैं, मुस्लिम कानून के अंतर्गत लागू नहीं होतीं। अदालत ने एक मुस्लिम महिला द्वारा अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग संबंधी याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया।
जस्टिस जे. सी. दोशी एक लंबे समय से लंबित पारिवारिक विवाद से जुड़े दीवानी पुनरीक्षण आवेदनों और अपीलों पर सुनवाई कर रहे थे। मामला वडोदरा स्थित कई अचल संपत्तियों को लेकर भाई-बहनों के बीच विवाद से संबंधित था।
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क्या अरेस्ट मेमो में रेफरेंस न होने पर अलग पेपर पर आधार देना वैलिड है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हेबियस कॉर्पस रिट के लिए याचिका में यह देखते हुए राहत दी कि आरोपी को अलग पेपर पर अरेस्ट के आधार देना तब इनवैलिड है, जब उसका रेफरेंस अरेस्ट मेमो में न हो और उसमें विटनेस अटेस्टेशन न हो।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने कहा: "BNSS, 2023 की धारा 36 के अनुसार, जिसके तहत अरेस्ट मेमो जारी किया जाना है, यह साफ तौर पर प्रोविजन किया गया कि अरेस्ट मेमो को कम-से-कम विटनेस द्वारा अटेस्टेड किया जाएगा, जो अरेस्ट किए गए व्यक्ति के परिवार का मेंबर हो या उस इलाके का कोई इज्ज़तदार मेंबर हो जहां अरेस्ट किया गया और जिस पर अरेस्ट किए गए व्यक्ति ने ड्यूली काउंटरसाइन किया हो।"
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एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल पंचायत का कबूलनामा, सह-आरोपी के खिलाफ तब तक कोई सबूत नहीं, जब तक उसे सख्ती से साबित और पक्का न किया जाए: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के इस मुख्य सिद्धांत को मज़बूत करते हुए कि मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड नहीं किया गया कबूलनामा कोई ठोस सबूत नहीं होता और अपने आप में किसी सह-आरोपी को दोषी ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने बरी किए जाने के खिलाफ क्रिमिनल अपील यह कहते हुए खारिज की कि कथित पंचायत का कबूलनामा, जो बरी करने वाला, बिना साबित और बिना पुष्टि वाला है, दोषसिद्धि को बनाए नहीं रख सकता है।
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केंद्र धोखाधड़ी से मिले एम्प्लॉयमेंट वीज़ा पर रह रहे विदेशी नागरिक को 'लीव इंडिया नोटिस' जारी कर सकता है: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऑस्ट्रेलियाई नागरिक को जारी 'लीव इंडिया' नोटिस को सही ठहराया, जो एम्प्लॉयमेंट वीज़ा पर रह रहा था। कोर्ट ने कहा कि वीज़ा गलत जानकारी देकर हासिल किया गया था, क्योंकि पोस्ट के लिए लोकल टैलेंट को भर्ती करने का कोई प्रोसेस नहीं किया गया।
कोर्ट ने माना कि लीव इंडिया नोटिस नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं है और याचिकाकर्ता गलत जानकारी देकर मिले कॉन्ट्रैक्ट वाले वीज़ा पर रह रहा एक विदेशी नागरिक है। उसे नागरिकता चाहने वाले नागरिक या लंबे समय से रहने वाले नागरिक जैसा प्रोसेस से जुड़ा प्रोटेक्शन नहीं मिलता है।
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Indian Succession Act | पत्नी और बच्चों के जीवित रहने पर मां को विरासत में हिस्सा नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि कोई पुत्र बिना वसीयत (इंटेस्टेट) के मृत्यु को प्राप्त होता है और उसके पीछे पत्नी व बच्चे (प्रत्यक्ष वंशज) जीवित हैं, तो उसकी मां को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा।
जस्टिस ज्योति एम ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मृतक की पत्नी और बच्चों द्वारा दायर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि मृतक की मां भी कानूनी उत्तराधिकारी है।
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'सीनियरिटी-कम-मेरिट के तहत प्रमोशन कैडर में सीनियरिटी के आधार पर होना चाहिए, न कि शुरुआती अपॉइंटमेंट की तारीख के आधार पर': बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि जहां प्रमोशन “सीनियरिटी-कम-मेरिट” के सिद्धांत से होते हैं, वहां सीनियरिटी को फीडर कैडर में गिना जाना चाहिए, न कि सर्विस में शुरुआती अपॉइंटमेंट की तारीख के आधार पर। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई कर्मचारी प्रमोशनल पोस्ट के लिए तय मिनिमम एलिजिबिलिटी और मेरिट की ज़रूरतों को पूरा कर लेता है तो तुरंत निचले कैडर में सीनियरिटी तय करने वाली हो जाती है, और एम्प्लॉयर प्रमोशनल हायरार्की को बदलने के लिए सर्विस में आने की तारीख पर वापस नहीं जा सकता।
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कामकाजी मां का बच्ची को अपने माता-पिता के पास छोड़ना अवैध नहीं, हैबियस कॉर्पस से कस्टडी विवाद नहीं सुलझाया जा सकता: गुजरात हाइकोर्ट
गुजरात हाइकोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसले में कहा कि किसी कामकाजी मां द्वारा अपनी नाबालिग बेटी की देखभाल के लिए उसे अपने माता-पिता के पास छोड़ना न तो अवैध कस्टडी है और न ही इसे हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक बच्चे की कस्टडी को लेकर कोई आदेश या कार्यवाही लंबित नहीं है, तब तक ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस का सहारा नहीं लिया जा सकता।
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घर से भागे जोड़ों के लिए सेफ़ हाउस समेत सुरक्षा उपायों पर 2019 के GO को मानना अधिकारियों का फ़र्ज़: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी करने वाले जोड़ों की जान और आज़ादी की रक्षा करने की राज्य की ज़िम्मेदारी को दोहराया। कोर्ट ने यूपी सरकार के 2019 के ऑर्डर का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया, जिसमें ऐसे जोड़ों के लिए ज़रूरी बचाव और सुधार के उपाय बताए गए।
एक जोड़े की सुरक्षा याचिका का निपटारा करते हुए जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि पुलिस अधिकारी हर मामले में खतरे का अंदाज़ा लगाने और स्थिति की गंभीरता के आधार पर सुरक्षित रहने की जगह और सुरक्षा सहित ज़रूरी सुरक्षा देने के लिए ज़िम्मेदार हैं।
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जन्म से तय होने वाली जाति, धर्म बदलने या इंटर-कास्ट मैरिज के बावजूद नहीं बदलती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की जन्म के समय तय की गई जाति वही रहती है, भले ही वह अपना धर्म बदल ले। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक महिला की शादी से भी उसकी जाति नहीं बदलती।
इस तरह जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने दिनेश और 8 अन्य लोगों की क्रिमिनल अपील खारिज की, जिसमें स्पेशल जज, SC/ST Act, अलीगढ़ के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उन्हें IPC की धारा 323, 506, 452 और 354 और SC/ST Act की धारा 3(1)(R) के तहत अपराधों के लिए ट्रायल का सामना करने के लिए बुलाया गया था।
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Right To Travel Abroad | सिर्फ़ FIR या जांच का पेंडिंग होना LOC के लंबे ऑपरेशन को सही नहीं ठहरा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ जांच का पेंडिंग होना या क्रिमिनल केस का रजिस्ट्रेशन होना किसी आरोपी के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (LOC) के लंबे ऑपरेशन को सही नहीं ठहरा सकता। 22.5 करोड़ रुपये के रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट विवाद में महिला आरोपी के खिलाफ जारी LOC रद्द करते हुए जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि सिर्फ़ जांच का पेंडिंग होना संविधान के आर्टिकल 21 के तहत विदेश यात्रा के मौलिक अधिकार में लंबे समय तक कटौती को सही नहीं ठहरा सकता।
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एम्प्लॉयर के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को ट्वीट करना सर्विस रूल्स के तहत मिसकंडक्ट माना जा सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि किसी के एम्प्लॉयर के खिलाफ करप्शन के आरोपों को ट्वीट करना या पब्लिक में फैलाना लागू सर्विस रूल्स के तहत मिसकंडक्ट माना जा सकता है। जस्टिस संजीव नरूला ने कहा, “याचिकाकर्ता ने ट्वीट्स और री-ट्वीट्स के ज़रिए ऑर्गनाइज़ेशन के खिलाफ आरोपों को पब्लिक में बढ़ाया, इंटरनल फ्रेमवर्क से बाहर रिप्रेजेंटेशन दिए, और पाया गया कि उसने बाहरी दबाव बनाने की कोशिश की। ऐसा कंडक्ट कंडक्ट, डिसिप्लिन और अपील रूल्स, 1976 के तहत डिसिप्लिनरी कार्रवाई का कारण बन सकता है। इसके लिए सीरियस एक्शन की ज़रूरत है।”
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राज्य ग्रेच्युटी अथॉरिटीज़ के पास उस जगह अधिकार नहीं, जहां कंपनी की कई राज्यों में ब्रांच हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत राज्य द्वारा नियुक्त अथॉरिटीज़ के पास ग्रेच्युटी के दावों पर फैसला करने का अधिकार नहीं है, जहां कंपनी की एक से ज़्यादा राज्यों में ब्रांच हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में केंद्र सरकार एक्ट के तहत “सही सरकार” है। जस्टिस शैल जैन ने कहा, “इस मामले में सही सरकार केंद्र सरकार होगी क्योंकि पिटीशनर-कंपनी की एक से ज़्यादा राज्यों में ब्रांच हैं, न कि राज्य सरकार…”
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वकील का क्लर्क वसीयत का वैलिड अटेस्टिंग विटनेस हो सकता है: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने माना कि सिर्फ़ इस बात से कि वसीयत का अटेस्टिंग विटनेस उस मामले में पेश होने वाले वकील के साथ क्लर्क के तौर पर काम करता है, वह गवाह भरोसे के लायक नहीं हो सकता या वसीयत को शक के दायरे में नहीं लाया जा सकता, खासकर तब जब ऐसे गवाह से उसी पार्टी ने पूछताछ की हो, जो वसीयत को चुनौती देना चाहती है।
जस्टिस जे.सी. दोशी महेश नटूभाई गामित और दूसरों की तरफ़ से रेस्पोंडेंट-डिफेंडेंट छगनभाई रेशियाभाई के ख़िलाफ़, उनके वारिसों और कानूनी प्रतिनिधियों के ज़रिए, दायर की गई अपील पर सुनवाई कर रहे थे। यह अपील एक रजिस्टर्ड वसीयत की वैलिडिटी और बंटवारे के दावे से जुड़े पारिवारिक झगड़े से पैदा हुई।
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हथियार रखने का कोई मौलिक अधिकार नहीं, आर्म्स लाइसेंस देना कार्यपालिका का विवेकाधीन अधिकार: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने साफ़ किया कि भारतीय संविधान के तहत किसी व्यक्ति को हथियार रखने का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आर्म्स लाइसेंस देना पूरी तरह से आर्म्स एक्ट 1959 और आर्म्स रूल्स 2016 के तहत कार्यपालिका के विवेकाधीन क्षेत्र में आता है। इसमें अदालत अपने विचार कार्यपालिका के स्थान पर नहीं थोप सकती।
जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें आर्म्स लाइसेंस के लिए दिए गए आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
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DV Act के तहत पुराने घर में दोबारा प्रवेश का स्वतः अधिकार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का अधिनियम, 2005 (DV Act) किसी पीड़ित महिला को यह अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं देता कि वह उस वैवाहिक घर में दोबारा रहने की ज़िद करे, जिसे वह पहले स्वयं छोड़ चुकी हो खासकर तब जब उसके पास समान स्तर का वैकल्पिक आवास उपलब्ध हो।
जस्टिस रविंदर दुडेजा ने कहा कि ऐसे मामलों में जबरन पुनः कब्ज़ा दिलाना वर्तमान निवासियों के स्थापित अधिकारों को बाधित करेगा और एक संरक्षणकारी कानून को किसी भी पुराने निवास में दोबारा प्रवेश का साधन बना देगा, जो विधायी मंशा से परे होगा।
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सीनियर सिटीजन की संपत्ति ट्रांसफर पर अहम फैसला: गिफ्ट डीड में 'भरण-पोषण' की स्पष्ट शर्त होना ज़रूरी नहीं- कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 की धारा 23 की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति बच्चों या परिजनों के पक्ष में गिफ्ट डीड के माध्यम से ट्रांसफर करता है, तो उस गिफ्ट डीड में भरण-पोषण (maintenance) की स्पष्ट शर्त लिखी होना अनिवार्य नहीं है, ताकि बाद में उस ट्रांसफर को धारा 23 के तहत शून्य (void) घोषित किया जा सके।
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अविवाहित महिलाओं को 24 हफ़्ते तक गर्भपात का अधिकार, सुनिश्चित करें कि किसी को कोर्ट न जाना पड़े: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में महाराष्ट्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के X बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, NCT दिल्ली सरकार मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का व्यापक प्रचार करने का आदेश दिया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी महिला, खासकर अविवाहित महिला को 'अनचाही' प्रेग्नेंसी जारी रखने के लिए मजबूर न किया जाए।
उल्लेखनीय है कि 29 सितंबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उपरोक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अविवाहित महिलाएं भी आपसी सहमति से बने रिश्ते से होने वाली 20-24 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने के लिए गर्भपात करवा सकती हैं। यह फैसला सुनाया गया कि लिव-इन रिलेशनशिप से गर्भवती होने वाली अविवाहित महिलाओं को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) नियमों से बाहर रखना असंवैधानिक है।

