DV Act के तहत पुराने घर में दोबारा प्रवेश का स्वतः अधिकार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
Amir Ahmad
11 Feb 2026 1:51 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का अधिनियम, 2005 (DV Act) किसी पीड़ित महिला को यह अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं देता कि वह उस वैवाहिक घर में दोबारा रहने की ज़िद करे, जिसे वह पहले स्वयं छोड़ चुकी हो खासकर तब जब उसके पास समान स्तर का वैकल्पिक आवास उपलब्ध हो।
जस्टिस रविंदर दुडेजा ने कहा कि ऐसे मामलों में जबरन पुनः कब्ज़ा दिलाना वर्तमान निवासियों के स्थापित अधिकारों को बाधित करेगा और एक संरक्षणकारी कानून को किसी भी पुराने निवास में दोबारा प्रवेश का साधन बना देगा, जो विधायी मंशा से परे होगा।
हाइकोर्ट ने 81 वर्षीय महिला की याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने अपने वैवाहिक घर में दोबारा कब्ज़ा दिलाने की मांग की थी। कोर्ट ने माना कि महिला अपनी इच्छा से पति की ही एक अन्य संपत्ति में शिफ्ट हुई थीं और वह बेघर नहीं हुईं।
महिला ने ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी, जिनमें DV Act की धारा 19 और 23 के तहत उनके पक्ष में निवास आदेश पारित करने से इनकार कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने करीब छह दशक तक अपने वैवाहिक घर में निवास किया और अप्रैल, 2023 में केवल इलाज के उद्देश्य से अस्थायी रूप से अपनी बेटी के घर चली गईं। उन्होंने दावा किया कि जुलाई 2023 में लौटने पर उन्हें उस घर में प्रवेश नहीं करने दिया गया।
हालांकि, जस्टिस दुडेजा ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि महिला वैवाहिक घर से वैकल्पिक आवास में गईं और यह कदम किसी हिंसा या ज़बरदस्ती का नतीजा नहीं था। स्वयं महिला ने अपनी शिकायत में कहा था कि वह इलाज के लिए वहां गईं।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,
“धारा 19 के तहत राहत विवेकाधीन और न्यायसंगत है। DV Act पीड़ित महिला के अधिकारों के साथ-साथ अन्य निवासियों और मालिकों के अधिकारों का भी संतुलन बनाता है। वर्तमान मामले में पुनः कब्ज़ा दिलाना, मौजूदा निवासियों के स्थापित कब्ज़े को बाधित करेगा और एक संरक्षणकारी क़ानून को किसी भी पुराने निवास में दोबारा प्रवेश का नियम बना देगा, जो विधायी उद्देश्य से आगे बढ़ना होगा।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“समान स्तर के उपयुक्त वैकल्पिक आवास की उपलब्धता और धारा 19 के तहत राहत की विवेकाधीन व संरक्षणकारी प्रकृति को देखते हुए याचिकाकर्ता ग्रीन पार्क स्थित संपत्ति में पुनः कब्ज़ा या दोबारा प्रवेश के लिए निवास आदेश पाने की हकदार नहीं हैं।”
इसी आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की।

