जानिए हमारा कानून
किसी झूठे सिविल केस का बचाव कैसे करें? जानिए खास बातें
भारत के कानून में जनता पर सिविल और आपराधिक दो तरह के दायित्व सौंपे गए हैं। आपराधिक मामले में सीधे राज्य द्वारा कोई प्रकरण चलाया जाता है और सिविल मामलों में व्यथित व्यक्ति को अपना प्रकरण स्वयं ही चलाना होता है।कई मौके ऐसे होते हैं जहां पर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर झूठे आधारों पर सिविल प्रकरण अदालत में दर्ज़ करवा देता है जिससे प्रतिवादी को परेशान किया जा सके। भारत के कानून में यह ज़रूरी नहीं है कि कोई भी सिविल मुकदमा शुरू से लेकर अंत तक पक्षकारों को लड़ना ही पड़े। सिविल मुकदमे काफी जटिल और तार्किक...
धारा 156 (3) और 202 सीआरपीसी : सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व संज्ञान और संज्ञान को बाद के चरण में मजिस्ट्रेट की शक्ति का फर्क समझाया
हाल ही के एक फैसले (कैलाश विजयवर्गीय बनाम राजलक्ष्मी चौधरी और अन्य) में, सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 156 (3) के तहत प्राथमिकी दर्ज करने और अध्याय XV (मजिस्ट्रेट को शिकायत) के तहत संज्ञान लेने के बाद कार्यवाही और पूर्व-संज्ञान चरण में जांच करने के लिए एक मजिस्ट्रेट की शक्ति के बीच अंतर को स्पष्ट किया।सीआरपीसी की धारा 156(3) में कहा गया है कि एक मजिस्ट्रेट जिसे संहिता की धारा 190 के तहत संज्ञान लेने का अधिकार है, संज्ञेय अपराध के लिए जांच का आदेश दे सकता...
पुलिस चालान पेश करने में देरी करे तब अभियुक्त को मिल सकती है डिफॉल्ट जमानत
किसी गैर जमानती अपराध में पुलिस किसी आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है। ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तुत किए गए व्यक्ति के पास जमानत का अधिकार होता है। यदि अदालत इस बात पर प्रथम दृष्टया सहमत होती है कि आरोपी जमानत पर छोड़ा जा सकता है तो अभियुक्त को नियमित जमानत दे दी जाती है। जमानत भी अलग अलग तरह की होती हैं। नियमित जमानत,अंतरिम जमानत की तरह डिफॉल्ट जमानत भी है।भारत के कानून में डिफॉल्ट जमानत के प्रावधान क्रिमिनल प्रोसीज़र कोड, 1973 की धारा 167(2) में मिलतें...
ऐसे अपराध जिनमें अदालत सिर्फ़ नाममात्र का जुर्माना लगाकर छोड़ देती है
भारत में चलने वाले कानूनों में तरह तरह के अपराध हैं। छोटे बड़े सभी तरह के अपराध हैं। हर अपराध में सज़ा भी उस अपराध की गंभीरता को देखते हुए निर्धारित की गई है। फांसी की सज़ा से लेकर सौ रुपये के जुर्माना तक की सज़ा है। कुछ छोटे अपराध ऐसे हैं जहां अदालत के पास एक माह, छः माह तक के कारावास की सज़ा देने की शक्ति है। लेकिन अदालत उदारता के साथ ऐसे छोटे अपराधों में कारावास की सज़ा नहीं देकर नाममात्र का जुर्माना लगा देती है। क्योंकि भारत की जेलों में इतने अपराधी हो चुके हैं कि अपराधियों को रखने एवं उनकी देखरेख...
बेटा या बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर क्या अधिकार है
कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में अनेक संपत्तियां अर्जित करता है। ऐसी संपत्ति चल और अचल दोनों प्रकार की होतीं हैं। किसी व्यक्ति के पास अचल संपत्ति में बैंक खाता, एफडी, शेयर्स, वाहन, डिबेंचर, नक़दी, गोल्ड सिल्वर इत्यादि अनेक चीज़ें होती हैं। अचल संपत्ति में व्यक्ति के पास घर, प्लॉट, फ्लैट, कृषिभूमि इत्यादि होतें हैं। यह सभी संपत्ति व्यक्ति भिन्न भिन्न प्रकार से अर्जित करता है। मुख्य रूप से यह संपत्तियां व्यक्ति को तीन प्रकार से प्राप्त होतीं हैं।1 स्वयं अर्जित संपत्तिऐसी संपत्ति व्यक्ति स्वयं अर्जित...
एक हिस्सेदार दूसरे हिस्सेदार को संपत्ति बेचने से कैसे रोक सकता है
परिवारों में पैतृक संपत्ति विवाद का घर हो जाती है। अनेक परिवारों को संपत्ति के संबंध में लड़ते देखा जा सकता है। कभी कभी पैतृक संपत्ति का बंटवारा नहीं हो पाता है। यदि हिस्सेदारों में आपसी सहमति से संपत्ति का बंटवारा हो जाए तब सरलतापूर्वक संपत्ति का बंटवारा हो जाता है लेकिन यदि आपसी सहमति से संपत्ति का बंटवारा नहीं होता है तब स्थिति विवाद की बन जाती है। यदि आपसी सहमति से बंटवारा किया जाना है तब तो हिस्सेदार अपने अपने हिस्से के संबंध में विभाजन लेख बनाकर सब रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर्ड करवा सकते हैं।...
केशवानंद भारती मामले से जुड़े 50 रोचक तथ्य
Kesavananda Bharati case- केशवानंद भारती श्रीपादगलवरु एंड अन्य बनाम केरल राज्य एंड अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इतिहास की एक ऐसी घटना है जो कल्पना से परे है। ऐसा कहा जाता है कि इस निर्णय ने भारत के संविधान की रक्षा की और भारत में अधिनायकवादी शासन या एक दलीय सरकार के शासन को आने से रोका। 13 जजों की बेंच के 7 जजों के बहुमत के फैसले ने गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में 11 जजों की बेंच के फैसले को पलट दिया, जिसमें 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधन की वैधता को बरकरार रखा था,...
गिरफ्तारी का वारंट कब जारी किया जाता है
आमतौर पर गिरफ्तारी वारंट का नाम सुनकर किसी भी व्यक्ति में भय पैदा हो जाता है। इस भय का लाभ उठाकर कई लोग छल कपट भी कर लेते हैं। गिरफ्तारी वारंट जारी करने और उसके एक्जीक्यूशन के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1908 में व्यवस्थित प्रक्रिया दी गई है। दंड प्रक्रिया संहिता ही वह कानून है जिसके ज़रिए भारत में गिरफ्तारी वारंट की उत्त्पति हुई है। संहिता की धारा 70 से 80 तक गिरफ्तारी वारंट के संबंध में प्रावधान है।किसके द्वारा जारी किया जाता हैगिरफ्तारी का वारंट सदैव किसी अदालत या फिर सेमी ज्यूडिशियल कोर्ट जैसे...
जानिए घरेलू हिंसा का केस किसे कहते हैं
पति पत्नी के बीच विवादों के अधिक बढ़ जाने पर घरेलू हिंसा के केस अत्यंत चर्चित होते हैं। दो लोग साथ रहकर गृहस्थी बनाते हैं लेकिन आपसी मतभेद बड़े विवादों को जन्म देते हैं और फिर मामला अदालत तक जा पहुंचता है। ऐसे में महिलाओं द्वारा पति और उसके रिश्तेदारों पर घरेलू हिंसा कानून में कार्यवाही की जाती है।क्या है घरेलू हिंसा कानूनभारत में महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा की रोकथाम के उद्देश्य से बनाया गया चर्चित अधिनियम 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' है। वर्ष 2005 में भारत की संसद...
किसी पार्टी को कैसे मिलता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा ?
चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी (AAP) को नेशनल पार्टी का दर्जा दे दिया है। साथ ही चुनाव आयोग ने NCP, CPI और TMC से नेशनल पार्टी का दर्जा वापस ले लिया है। अब हमारे देश में कुल छह राष्ट्रीय पार्टियां हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) और आम आदमी पार्टी (AAP)। इसके साथ ही राष्ट्रीय लोक दल से राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा वापस ले लिया गया है।कोई भी पार्टी नेशनल पार्टी तब बनती है, जब उसे लोकसभा या...
स्टॉकिंग: अगर कोई पीछा करे तो कहां करें शिकायत?
What to do if you are being stalked- केस रूपन देओल बजाज बनाम केपीएस गिल। पहले दोनों जन का परिचय जान लीजिए। 1980 के दशक के अंतिम दौर में सुपरकॉप के नाम से जाने जानेवाले पुलिस अधिकारी केपीएस गिल की तूती बोलती थी। वहीं, रूपन देओल बजाज एक सीनियर महिला आईएएस अधिकारी थी।तारीख आती है 18 जुलाई 1988। उस समय गिल पंजाब के पुलिस महानिदेशक थे। रूपन देओल बजाज पंजाब के फाइनेंस डिपार्टमेंट में विशेष सचिव के पद पर कार्यरत थीं। गृह सचिव की मेज़बानी में एक पार्टी का आयोजन होता है। पार्टी में रुपन देओल भी गई थीं। ...
चेक बाउंस केस में सज़ा होने पर क्या किया जाए
चेक बाउंस के केस दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। अदालतों में चेक बाउंस केस की अधिकता हो गई है। चेक बाउंस का प्रकरण परिवादी के परिवाद पर निगोशिएबल इंट्रूमेंट एक्ट,1881 की धारा 138 के अंतर्गत दर्ज करवाया जाता है। इस केस में अदालत यह उपधारणा लेकर चलती है कि अभियुक्त ने चेक किसी आर्थिक जिम्मेदारी के बदले ही दिया होगा। इस कारण चेक बाउंस के अधिकतर प्रकरणों में राजीनामा नहीं होने पर अदालत द्वारा अभियुक्त को सज़ा दे दी जाती है। चेक बाउंस के बहुत कम प्रकरण ऐसे होते है जिनमे अभियुक्त बरी किए जाते है।कितनी...
क्या उम्रकैद की सजा 14 साल की होती है?
Episode 2- पिछले एपिसोड में हमने भारत में कितनी तरह की जेलें हैं? उस पर बात की थी। इस एपिसोड में हम उम्रकैद की सजा पर बात करेंगे। आम तौर पर लोगों के बीच ये धारणा है कि उम्रकैद की सजा 14 साल की होती है। यानी 14 साल के बाद आरोपी जेल से छूट जाएगा। उनमें से एक ये भी है कि जेल में दिन और रात अलग-अलग गिने जाते हैं.किसी आरोपी का जुर्म तय हो जाने के बाद कोर्ट उसके गुनाहों के आधार पर सजा देता है। गुनाह जितना बड़ा होगा सजा उतनी ज्यादा होगी। इसमें कुछ साल की जेल, फांसी, उम्रकैद जैसी सजा आते हैं। फांसी की...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 37: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत चीज़,जानकारी मांगने एवं परीक्षा लेने की शक्ति
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 67 धारा 42 के अंतर्गत राज्य एवं केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को यह शक्ति देती है कि वह इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति से जानकारी मांग सकता है, उसकी परीक्षा कर सकता है एवं चीज़े मांग सकता है जो किसी प्रकरण में आवश्यक है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 67 पर विवेचना प्रस्तुत की जा रही है।यह इस अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 67. जानकारी आदि मांगने की शक्ति-धारा 42 में निर्दिष्ट कोई ऐसा...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 36: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत अवैध औषधियों, पदार्थों, पौधों, वस्तुओं और प्रवहणों का ज़ब्त किया जाना
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 60 अवैध दवाईयों, पदार्थों, पौधों,वस्तुओं और प्रवहणों के ज़ब्त किये जाने के संबंध में उल्लेख करती है। एनडीपीएस एक्ट अत्यंत विस्तृत अधिनियम है, इस अधिनियम के अंतर्गत निकाली गई अधिसूचना के अधीन अनेक पदार्थ,औषधि, पौधों को प्रतिबंधित किया गया है। धारा 60 इन प्रतिबंधित प्रदार्थो को सीज करने का अधिकार पुलिस एवं अन्य अधिकारियों को देती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 60 पर विवेचना प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 35: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी और सीज़िंग की रिपोर्ट देना
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 57 इस अधिनियम की महत्वपूर्ण आज्ञापक प्रावधान करती धारा है। इस धारा के प्रावधान यह स्पष्ट करते हैं कि गिरफ्तारी करने वाले किसी भी अधिकारी को ऐसी गिरफ्तारी या अभिग्रहण की रिपोर्ट अपने वरिष्ठ अधिकारी को करेगा। यह धारा अभियुक्त पर असत्य आधारों पर प्रकरण बनाए से रोक लगाती है। यह आलेख के अंतर्गत धारा 57 पर न्याय दृष्टांत सहित विवेचना प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 57गिरफ्तारी और...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 34: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत गांजा ज़ब्ती का मामला
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 55 पुलिस को जप्त की गई वस्तु को अपने भार साधन में लेने का अधिकार देती है। इस धारा पर विस्तृत टिप्पणी पिछले आलेख में प्रस्तुत की गई है। इस आलेख के अंतर्गत गांजा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रकरण का उल्लेख किया जा रहा है।शिव कुमार बनाम स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़, 2006 (2) क्राइम्स 323 छत्तीसगढ़ के मामले में गाँजा जब्ती का मामला था। अधिनियम की धारा 55 के प्रावधानों का पूरी तौर पर अपालन होना पाया गया। दोषमुक्ति किए जाने का अभिमत दिया...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 33: एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत अभिगृहीत वस्तुओं का पुलिस द्वारा अपने भार साधन में लेना
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 55 प्रक्रिया के संबंध में प्रावधान करती है। इस धारा के अनुसार पुलिस इस अधिनियम के अंतर्गत अभिगृहीत की गई वस्तुओं का कब्ज़ा या भार साधन अपने हाथ में ले सकती है। इस प्रावधान का उद्देश्य वस्तुओं की सुरक्षा है एवं उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी निर्दिष्ट व्यक्ति को दी जानी है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 55 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत मूल धारा हैधारा 55अभिगृहीत और परिदत्त वस्तुओं का पुलिस द्वारा...
क्या होता है फ्लोर टेस्ट, सदन में कैसे साबित होता है बहुमत?
बात महाराष्ट्र की। तारीख 29 जून 2022। महाराष्ट्र में राजननीतिक संकट चरम पर पहुंच गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ठाकरे की नेतृत्व वाली 31 महीने पुरानी महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार का फ्लोर टेस्ट यानी बुहमत परीक्षण कराने के राज्यपाल के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं करने का फैसला किया और मुख्यमंत्री पद से इस्पीफा दिया। इसकी के चलते जुलाई 2022 में महाराष्ट्र में सरकार बदल गई। और एकनाथ शिंदे की सरकार बनी, जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं।दोनों...




















