S.294 CrPC | आरोपी चार्जशीट का हिस्सा बन चुके दस्तावेज़ों को बिना हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत के भी पेश कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-08 06:25 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब कोई आरोपी बचाव पक्ष की ओर से कुछ ऐसे दस्तावेज़ पेश करना चाहता है, जो पहले से ही चार्जशीट और अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, तो उन्हें औपचारिक रूप से साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे दस्तावेज़ों को उन पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर साबित किए बिना भी सबूत के तौर पर पढ़ा जा सकता है।

कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 294(3) का हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, यदि किसी दस्तावेज़ की प्रामाणिकता पर कोई विवाद नहीं है तो उसे सबूत के तौर पर स्वीकार करने के लिए उस पर किए गए हस्ताक्षर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता।

कोर्ट ने कहा,

"यदि ऐसे किसी दस्तावेज़ पर कोई विवाद नहीं है तो उसे CrPC के तहत होने वाली किसी भी जांच, ट्रायल या अन्य कार्यवाही के दौरान, उस पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर साबित किए बिना ही पढ़ा जा सकता है।"

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में CrPC की धारा 294 के तहत कुछ दस्तावेज़ों को 'एग्ज़िबिट' (सबूत के तौर पर चिह्नित) के रूप में स्वीकार करने की अनुमति देने से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उन दस्तावेज़ों पर किए गए हस्ताक्षरों का कोई औपचारिक सबूत पेश नहीं किया गया, जबकि वे दस्तावेज़ पहले से ही अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड का हिस्सा थे।

यह मामला आपराधिक अपील से जुड़ा है, जो एडिशनल सेशन जज के समक्ष लंबित थी। अपील के लंबित रहने के दौरान, आरोपी ने CrPC की धारा 294 के तहत आवेदन दायर किया। इस आवेदन में उसने कुछ दस्तावेज़ों—जैसे कि खाता खोलने के फ़ॉर्म, बैंक प्रमाणपत्र, आयकर रिटर्न (IT returns) की प्रतियां, रिस्क रेटिंग और प्राइसिंग स्कोर शीट आदि को बिना किसी औपचारिक सबूत की ज़िद किए 'एग्ज़िबिट' के तौर पर चिह्नित करने की अनुमति मांगी थी। आरोपी ने यह तर्क दिया था कि ये दस्तावेज़ पहले से ही अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड और चार्जशीट की सामग्री का हिस्सा हैं।

ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को ख़ारिज कर दिया। इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने मद्रास हाईकोर्ट में 'आपराधिक पुनरीक्षण याचिका' (Criminal Revision Petition) दायर की। हालाँकि, हाईकोर्ट ने भी उक्त पुनरीक्षण याचिका ख़ारिज की, जिसके बाद यह मामला 'विशेष अनुमति याचिका' (SLP) के रूप में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

हाईकोर्ट ने उन दस्तावेज़ों को 'एग्ज़िबिट' के तौर पर स्वीकार करने की अनुमति देने से इसलिए इनकार किया, क्योंकि उसने इन दस्तावेज़ों को 'औपचारिक प्रकृति' (Formal Character) का माना था। हाईकोर्ट का कहना था कि ऐसे दस्तावेज़ों को CrPC की धारा 296 के तहत हलफ़नामे (Affidavit) के माध्यम से ही साबित किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर आधारित था, जो 'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम नायब दीन, (2001) 8 SCC 578' मामले में आया था। यह फ़ैसला CrPC की धारा 296 से जुड़ा था, जो औपचारिक गवाहों की गवाही को हलफ़नामे के ज़रिए पेश करने की इजाज़त देती है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने यह दलील दी कि CrPC की धारा 294 और धारा 296 पूरी तरह से अलग-अलग प्रक्रियागत तंत्रों से संबंधित हैं। अपीलकर्ता ने कहा कि हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 294 के तहत दस्तावेज़ों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने से जुड़ी अर्ज़ी पर फ़ैसला सुनाते समय हलफ़नामे से जुड़ी गवाही के संबंध में दिए गए पिछले फ़ैसलों (Precedent) को ग़लत तरीके से लागू किया था।

अपीलकर्ता की दलील में दम पाते हुए कोर्ट ने CrPC की धारा 294 और 296 के बीच का अंतर समझाया। साथ ही कोर्ट ने 'नायब दीन' (ऊपर उल्लिखित) मामले में दिए गए फ़ैसले को भी अलग से स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 294 उन दस्तावेज़ों से संबंधित है, जो पहले से ही कोर्ट में जमा किए जा चुके होते हैं। इन मामलों में पक्षकारों से दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिए कहा जा सकता है। यदि दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता पर कोई विवाद नहीं होता तो उन दस्तावेज़ों को बिना हस्ताक्षरों के औपचारिक प्रमाण के ही गवाही के तौर पर पढ़ा जा सकता है।

इसके विपरीत, CrPC की धारा 296 उन गवाहों की गवाही से संबंधित है, जिनकी गवाही का स्वरूप केवल औपचारिक होता है। इस धारा के तहत ऐसे गवाह अपनी औपचारिक गवाही हलफ़नामे के ज़रिए दे सकते हैं।

संक्षेप में मामला

कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब अभियुक्त द्वारा जिस दस्तावेज़ पर भरोसा किया जा रहा हो, उसकी प्रामाणिकता पर कोई विवाद न हो तो ऐसे दस्तावेज़ों को बिना हस्ताक्षरों के औपचारिक प्रमाण की आवश्यकता के ही गवाही के तौर पर स्वीकार (Exhibit) कर लिया जाना चाहिए था।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"हमने हाईकोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों की आगे जांच की, जो 'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम नायब दीन' मामले में दिए गए फैसले पर आधारित हैं। यह फैसला CrPC की धारा 296 के प्रावधानों से संबंधित है, जो हलफनामे पर आधारित औपचारिक प्रकृति के सबूतों से जुड़ा है। इसका उस मामले से कोई लेना-देना नहीं है, जिसमें कुछ दस्तावेजों के लिए किसी औपचारिक सबूत की आवश्यकता नहीं होती। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि CrPC की धारा 294 दस्तावेजी सबूतों से संबंधित है, जबकि CrPC की धारा 296 उन सबूतों की औपचारिक प्रकृति से संबंधित है, जो हलफनामे पर आधारित होते हैं। इसलिए 'नायब दीन' (उपर्युक्त) मामले में दिए गए फैसले का सिद्धांत (Ratio) वास्तव में इस मामले में लागू नहीं होता; विशेष रूप से, CrPC की धारा 294 के तहत दायर आवेदन खारिज करते समय यह कोर्ट का कर्तव्य है कि वह उस प्रावधान की मूल भावना को बनाए रखे, खासकर उन दस्तावेजों के संबंध में जिनके लिए आवेदन दायर किया गया। 'आदेश तभी पारित किया जाना चाहिए, जब ऐसे दस्तावेजों की प्रामाणिकता की पुष्टि कर ली गई हो - चाहे वह स्वीकारोक्ति या अस्वीकृति के माध्यम से हो, या यदि आवश्यक हो, तो सबूतों के माध्यम से हो।'"

कानून को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि चूंकि अपीलकर्ता जिन दस्तावेजों पर भरोसा करना चाहता है, वे अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड का हिस्सा थे। इसलिए हाईकोर्ट ने उन्हें 'प्रदर्शन' (Exhibit) के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति न देकर गलती की। हालांकि, राज्य को उन दस्तावेजों की प्रामाणिकता को स्वीकार करने या अस्वीकार करने की अनुमति दी जा सकती है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"वर्तमान मामले के तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जिन दस्तावेजों को अपीलकर्ता 'प्रदर्श' के रूप में अंकित करवाना चाहता है, वे आरोप-पत्र (Chargesheet) का हिस्सा हैं और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में शामिल हैं। अपीलकर्ता ने अपने आवेदन में किए गए कथनों के माध्यम से यह तर्क दिया कि ये दस्तावेज अभियोजन पक्ष के दस्तावेजों की सूची में शामिल थे।"

उपर्युक्त बातों के आधार पर कोर्ट ने इस मामले को वापस हाई कोर्ट के पास भेज दिया ताकि CrPC की धारा 294 के तहत दायर आवेदन पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार किया जा सके। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि अभियोजन पक्ष ने यह विवाद उठाया था कि ये दस्तावेज रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं हैं।

खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि दस्तावेजों की स्वीकार्यता या प्रामाणिकता के संबंध में कानून के तहत उपलब्ध सभी आपत्तियां उठाने के लिए राज्य पूरी तरह से स्वतंत्र रहेगा।

Cause Title: R. GANESH VERSUS THE STATE OF TAMIL NADU

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